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कच्चे तेल में उबाल! सरकारी कंपनियों को पेट्रोल पर ₹5... डीजल पर ₹23 प्रति लीटर का नुकसान, फिर बढ़ेंगे दाम?

कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने एक बार फिर पेट्रोल-डीजल के दाम को लेकर चिंता बढ़ा दी है. ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है, जबकि भारत अपनी जरूरत का 88 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है.

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कच्चे तेल के दाम बढ़ने से सरकारी तेल कंपनियों को हर लीटर पीछे पेट्रोल पर ₹5 और डीजल पर ₹23 का नुकसान हो रहा है. (File Photo)
कच्चे तेल के दाम बढ़ने से सरकारी तेल कंपनियों को हर लीटर पीछे पेट्रोल पर ₹5 और डीजल पर ₹23 का नुकसान हो रहा है. (File Photo)

पेट्रोल-डीजल की कीमतें फिलहाल भले ही आपकी जेब पर कोई नया बोझ नहीं डाल रही हों, लेकिन कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दामों ने सरकारी तेल कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है. ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है और इसका सीधा असर भारतीय तेल कंपनियों के मार्जिन पर पड़ रहा है. अनुमान के मुताबिक, मौजूदा भाव पर सरकारी कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 5 रुपये और डीजल पर 23 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है.

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा बना रहता है तो सरकार और तेल कंपनियां इस बढ़ते दबाव से कैसे निपटेंगी? क्या इसका असर आगे चलकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है? फिलहाल कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर कुछ भी तय नहीं है, लेकिन तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे ने सरकार के सामने चुनौती जरूर बढ़ा दी है.

क्यों बढ़ा तेल कंपनियों पर दबाव?

अमेरिका और ईरान के बीच जंग एक बार फिर तेज होने के बाद पश्चिम एशिया में बढ़ी तनातनी के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. अमेरिका और ईरान के बीच ताजा जवाबी फायरिंग के बाद ब्रेंट क्रूड करीब 2.5 फीसदी चढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया. वहीं, अमेरिकी 'वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट' (कच्चे तेल का एक प्रकार) करीब 2 फीसदी बढ़कर 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया. भारत अपनी जरूरत का 88 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहने पर देश के आयात बिल, व्यापार संतुलन और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है.

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पेट्रोल पर ₹5, डीजल पर ₹23 का नुकसान

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी 'इंफेक्शन कंट्रोल एंड रिस्क असेसमेंट' (ICRA) के प्रशांत वशिष्ठ के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है. भारतीय कच्चे तेल का भाव भी काफी ऊंचा पहुंच चुका है. उनके मुताबिक, सितंबर में अब तक के औसत भाव के आधार पर पेट्रोल पर मार्केटिंग मार्जिन करीब 5 रुपये प्रति लीटर निगेटिव है. यानी मौजूदा लागत और बिक्री कीमत के हिसाब से कंपनियों को नुकसान हो रहा है. डीजल के मामले में यह नुकसान करीब 23 रुपये प्रति लीटर है. घरेलू LPG पर भी करीब 200 रुपये प्रति सिलेंडर की अंडर-रिकवरी बताई गई है.

रिफिलिंग पंप पर अभी कीमतें जस की तस

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने के बावजूद फिलहाल पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में कोई नया बदलाव नहीं हुआ है. देश में इनके दाम तीन महीने से ज्यादा समय से स्थिर हैं. आखिरी बार 25 मई को पेट्रोल 2.61 रुपये और डीजल 2.71 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ था. इससे पहले मई के दूसरे हिस्से में चार किस्तों में पेट्रोल की कीमत कुल 7.35 रुपये और डीजल की कीमत 7.53 रुपये प्रति लीटर बढ़ाई गई थी.

कितना बढ़ गया भारत का तेल आयात बिल?

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महंगे कच्चे तेल का असर भारत के आयात बिल (Import Bill) पर भी दिखाई देने लगा है. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से जुलाई के दौरान कच्चे तेल का आयात बिल 56 फीसदी से ज्यादा बढ़कर 63.4 अरब डॉलर हो गया. एक साल पहले इसी अवधि में यह करीब 40.5 अरब डॉलर था. खास बात यह है कि कीमत बढ़ने के बावजूद आयात की मात्रा में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ. चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों में भारत ने करीब 81.9 मिलियन टन कच्चा तेल खरीदा, जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा 81.5 मिलियन टन था.

भारतीय तेल टोकरी भी 100 डॉलर के पार

PPAC के मुताबिक, 8 सितंबर को भारतीय कच्चे तेल का औसत भाव 108.91 डॉलर प्रति बैरल रहा. सितंबर में अब तक इसका औसत 102.11 डॉलर है. यह अगस्त के 90.19 डॉलर और जुलाई के 82.04 डॉलर के औसत से काफी ज्यादा है. ब्रिकवर्क रेटिंग्स के राजीव शरण के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड का दोबारा 100 डॉलर के पार जाना मुख्य रूप से अमेरिका-ईरान तनाव और सप्लाई को लेकर चिंता से जुड़ा है. यह तेजी मजबूत मांग की वजह से नहीं आई है. उनके मुताबिक, OPEC+ (तेल निर्यातक देश) का उत्पादन फिलहाल स्थिर है, लेकिन अगले महीने भी कच्चे तेल की कीमतें ऊंची और उतार-चढ़ाव वाली रह सकती हैं.

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सरकार के सामने अब क्या विकल्प बचे हैं?

अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कच्चा तेल कितना महंगा हो रहा है, बल्कि यह भी है कि इस बढ़ी लागत का बोझ कौन उठाएगा. अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो सरकार के सामने कई विकल्प हो सकते हैं. एक विकल्प यह है कि सरकारी तेल कंपनियां कुछ समय तक अपने मार्जिन पर दबाव सहते हुए खुदरा कीमतों को स्थिर रखें. दूसरा रास्ता टैक्स या अन्य शुल्क के स्तर पर राहत देने का हो सकता है, ताकि कच्चे तेल की बढ़ी लागत का असर सीधे उपभोक्ताओं पर न पड़े.

हालांकि ऐसे किसी भी कदम का फैसला सरकार की नीति, राजस्व की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर निर्भर करेगा. तीसरा विकल्प यह हो सकता है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो बढ़ी लागत का कुछ हिस्सा धीरे-धीरे खुदरा कीमतों में शामिल किया जाए. लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ऐसा कदम उठाया ही जाएगा.

महंगा तेल सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं

कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता. एविएशन, पेंट, टायर, केमिकल, लॉजिस्टिक्स और FMCG जैसे कई सेक्टर की लागत बढ़ सकती है. इससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है और आगे चलकर महंगाई का जोखिम भी बढ़ सकता है. राजीव शरण के मुताबिक, महंगा तेल भारत के लिए महंगे आयात, बढ़ते व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव की स्थिति पैदा कर सकता है. ऐसे माहौल में रिजर्व बैंक की मोनेटरी पॉलिसी पर भी नजर रहेगी. 16 सितंबर को अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख और 7 अक्टूबर को RBI का मोनेटरी रिव्यू अहम होगा.

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