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डॉलर की दादा'गिरी'... क्या ब्रिक्स में चीन, रूस और भारत पलट देंगे गेम?

BRICS Summit Topic: ब्रिक्स देशों की प्राथमिकता अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अमेरिकी डॉलर की निर्भरता को कम करना रहेगा. मिडिल-ईस्ट में तनाव के बीच सप्लाई चेन को बनाए रखना एक गरम मुद्दा होगा.

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डॉलर का दबदबा कम करने पर ब्रिक्स देशों का फोकस. (File Photo: Reuters)
डॉलर का दबदबा कम करने पर ब्रिक्स देशों का फोकस. (File Photo: Reuters)

दिल्ली में आयोजित होने जा रहे 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं. भारत की मेजबानी में हो रहे इस सम्मेलन में रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका समेत संगठन के सभी प्रमुख सदस्य देश हिस्सा ले रहे हैं. 

दरअसल, इस बार ब्रिक्स का आयोजन नई दिल्ली के भारत मंडपम में 12 और 13 सितंबर को किया जा रहा है. इस बैठक का मुख्य एजेंडा वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना, स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और एनर्जी सेफ्टी को मजबूत करना है. कहा जा रहा है कि मौजूदा वैश्विक हालात में यह बैठक भारत जैसे विकासशील देशों के लिए एक नया मोड़ साबित हो सकता है. 

ब्रिक्स है क्या?
BRICS दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय संगठन है. शुरुआत में चार देश ब्राजील, रूस, भारत और चीन (BRIC)  का सदस्य था. फिर साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद यह 'BRICS' बना. हाल ही में फिर संगठन का विस्तार हुआ है, और अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देश भी पूर्ण सदस्य या सहयोगी के रूप में शामिल हो चुके हैं.

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यह संगठन वैश्विक आबादी के लगभग 45% हिस्से और ग्लोबल जीडीपी के 30% से अधिक का प्रतिनिधित्व करता है. इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाना, व्यापार को आसान बनाना, वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करना है.

ब्रिक्स के मंच पर खासकर इस बार स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को लेकर जोर-शोर से चर्चा होने की संभावना है. ब्रिक्स देशों की प्राथमिकता अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अमेरिकी डॉलर की निर्भरता को कम करना रहेगा. मिडिल-ईस्ट में तनाव के बीच सप्लाई चेन को बनाए रखना एक गरम मुद्दा होगा. इसके साथ ही डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आपस में साझा करना अहम विषय रहने वाला है.

क्या ब्रिक्स देश अपनी करेंसी में ट्रेड करने में सक्षम हैं?
टेक्नोलॉजी और व्यावहारिक रूप से ब्रिक्स देश द्विपक्षीय व्यापार के लिए अपनी मुद्राओं का उपयोग करने में फिलहाल आंशिक रूप से सक्षम हैं. लेकिन वैश्विक स्तर पर अभी काफी चुनौतियां हैं. अगर दो देशों के बीच व्यापार संतुलित यानी आयात और निर्यात लगभग बराबर हो, तो वे स्थानीय मुद्रा में आसानी से कारोबार कर सकते हैं. उदाहरण के लिए चीन और रूस का आपसी व्यापार अब बड़े पैमाने पर युआन और रूबल में हो रहा है. 

लेकिन जब दो देशों के बीच व्यापार में भारी असमानता होती है, तो फिर स्थानीय करेंसी में कारोबार करने दिक्कतें आती हैं. इसका उदाहरण रूस और भारत के बीच ट्रेड को ले सकते हैं. भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है. लेकिन रूस को भारत से उतना सामान नहीं बेचता. जब भारत ने रूस को भारतीय रुपये में भुगतान किया, तो रूस के पास अरबों रुपये भारतीय बैंकों में जमा हो गए. दबी जुबान रूस की शिकायत रही है कि वह इन रुपयों का उपयोग कहां करे, क्योंकि भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रेड का विकल्प नहीं है. बाद में इस व्यापार को संभालने के लिए यूएई दिरहम और चीनी युआन जैसी मुद्राओं का सहारा लेना पड़ा. 

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क्या ब्रिक्स देश डॉलर को चुनौती देकर अपनी करेंसी को बढ़ा सकते हैं? या बिना डॉलर वैश्विक व्यापार असंभव है? फिलहाल मौजूदा हालात में बिना डॉलर का वैश्विक व्यापार असंभव तो नहीं है. लेकिन कठिन जरूर है. वैसे ब्रिक्स देश अपनी करेंसी बनाने की बात करते हैं. चीनी युआन (Yuan) डॉलर का विकल्प बनने की कोशिश कर रहा है. लेकिन चीन की पूंजी पर कड़े सरकारी नियंत्रण के कारण दुनिया के देश पूरी तरह युआन पर भरोसा नहीं करते. 

रूस-चीन में धड़ल्ले से कारोबार

हालांकि पिछले 3-4 वर्षों में पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का प्रयोग तेजी से बढ़ा है. डॉलर को बैकफुट पर धकलने के लिए भारत ने 20 से अधिक देशों को भारतीय रुपये में व्यापार करने के लिए विशेष वीओस्ट्रो खाते (Vostro Accounts) खोलने की अनुमति दी है. लेकिन इसकी में राह में चुनौतियां काफी हैं. अगर किसी देश की करेंसी जैसे कि रूबल या रुपया में अचानक भारी गिरावट आ जाए, तो दूसरे देश को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है.

इस बीच ब्रिक्स देशों के आपस में होने वाले कुल व्यापार में अब करीब 65 फीसदी के बीच कारोबार डॉलर के बिना स्थानीय मुद्राओं (जैसे युआन, रूबल, रुपया, दिरहम वगैरह) में सेटल हो रहा है. रूस और चीन का आपस में लगभग 95% से अधिक व्यापार अमेरिकी डॉलर के स्थान पर चीनी युआन और रूसी रूबल में हो रहा है. पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद भारत और रूस के बीच 80% से अधिक कच्चा तेल और कमोडिटी व्यापार नॉन-डॉलर सिस्टम (रुपया, रूबल और यूएई दिरहम) के माध्यम से सेटल किया गया. ब्रिक्स के अंदर नॉन-डॉलर ट्रेड में 60% से अधिक का आंकड़ा मुख्य रूप से रूस और चीन के बीच बड़े व्यापार के कारण संभव हुआ है.

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हालांकि ब्रिक्स के अंदर स्थानीय मुद्राओं का उपयोग बढ़ा है. लेकिन विश्व के कुल वैश्विक व्यापार में डॉलर की हिस्सेदारी अभी भी 85% से अधिक है. ब्रिक्स देशों का यह प्रयोग मुख्य रूप से द्विपक्षीय स्तर पर सीमित है. 

भारत के कितने देशों के साथ रुपये में कारोबार
RBI ने 22 देशों के 100 से अधिक बैंकों को भारत में 'स्पेशल वस्त्रा खाते' खोलने की अनुमति दी है. जिसमें प्रमुख देश रूस, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, श्रीलंका, मॉरीशस, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मलेशिया, ओमान और कुछ अफ्रीकी देश शामिल हैं. नेपाल और भूटान के साथ भारत का अधिकांश व्यापार पारंपरिक रूप से रुपये में होता है. UAE और मलेशिया के साथ भी रुपये-दिरहम/रिंगिट में ट्रेड किए जा रहे हैं. स्पेशल वस्त्रा खातों (SRVA) के माध्यम से होने वाले लेन-देन में सालना 30% से 40% से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

अमेरिका के लिए यह कितनी बड़ी चुनौती?
डॉलर के बिना वैश्विक व्यापार खासकर अमेरिका के लिए मौजूदा समय में एक चेतावनी और लॉन्ग टर्म में एक गंभीर आर्थिक संकट बन सकता है. क्योंकि अमेरिका जब चाहे किसी देश पर वित्तीय प्रतिबंध लगा देता है,  और उन्हें SWIFT सिस्टम से बाहर कर देता है. अगर देश डॉलर के बजाय अपनी करेंसी में व्यापार करने लगेंगे, तो अमेरिका का यह आर्थिक हथियार बेअसर हो जाएगा. 

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बता दें, पूरी दुनिया जब डॉलर को रिजर्व करेंसी के रूप में रखती है, तो अमेरिका आसानी से नोट छाप सकता है और दुनिया भर से कर्ज ले सकता है. अगर डॉलर की मांग कम होती है, तो अमेरिका में महंगाई और ब्याज दरें बढ़ सकती हैं. अमेरिका के लिए चुनौती यह नहीं है कि डॉलर रातो-रात खत्म हो जाएगा, बल्कि चुनौती यह है कि दुनिया अब केवल डॉलर पर निर्भर रहने के बजाय विकल्प तलाश चुकी है. 

अब सवाल उठता है कि डॉलर का इतना दबदबा क्यों? जगजाहिर है, अमेरिकी अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे स्थिर मानी जाती है. डॉलर पूरी दुनिया में आसानी से स्वीकार्य है और इसे कभी भी किसी अन्य मुद्रा में बदला जा सकता है. दुनिया में कच्चे तेल और ज्यादातर कमोडिटीज का व्यापार डॉलर में ही कोड किया जाता है. 

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