बिहार में सत्ता की कमान संभालने के सीएम सम्राट चौधरी की अग्निपरीक्षा बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने जा रहा है. यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा चुने जाने के बाद खाली हुई है, जहां पर 30 जुलाई को चुनाव है. बीजेपी ने अभी उपचुनाव में अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने ताल ठोक दी है. पीके के चुनावी मैदान में उतरने से क्या बांकीपुर का सियासी गेम बदलेगा?
प्रशांत किशोर ने आधिकारिक तौर पर बांकीपुर सीट से उपचुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है. इसके साथ ही कांग्रेस ने संकेत दिए थे कि वह प्रशांत किशोर के पक्ष में अपने उम्मीदवार खड़े नहीं करेगी. लेकिन, आरजेडी और बीजेपी और पीके के खिलाफ पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी में है.
बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव का ऐलान हो गया है. सोमवार सो नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो गई है और 13 जुलाई तक कैंडिडेट अपना नामांकन दाखिल कर सकते हैं. उपचुनाव के लिए 30 जुलाई को वोट डाले जाएंगे. बांकीपुर विधानसभा सीट बीजेपी का मजबूत दुर्ग माना जाता है, जहां सम्राट चौधरी का असल इम्तिहान होना है को पीके के लिए भी अहम है.
बांकीपुर बीजेपी का मजबूत सियासी दुर्ग
पटना जिले की बांकीपुर विधानसभा सीट बीजेपी की सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है. पिछले तीन दशक से बीजेपी का दबदबा है. बांकीपुर सीट 2010 में बनी है, उससे पहले पटना पश्चिम सीट थी. 1995 से यह सीट बीजेपी जीतती रही है. नितिन नवीन से पहले उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा 1995 से लेकर 2005 अक्तूबर तक जीतते रहे हैं. 2006 में नवीन किशोर के निधन के बाद 2006 में नितिन नवीन विधायक चुने गए.
नितिन नवीन लगातार पांच बार विधायक रहे हैं, पहले पश्चिम पटना सीट से 2006 में उपचुनाव जीतकर विधायक बने. इसके बाद जब यह सीट बांकीपुर बन गई तो चार बार चुनाव जीते. बिहार में बीजेपी की सबसे मजबूत सीट मानी जाती है, जहां पिछले तीन दशकों से उसका कब्जा है. 2015, 2020 और 2025 के चुनाव में नितिन नवीन ने एकतरफा जीत दर्ज की है और अपने खिलाफ
उतरे प्रत्याशी को भारी मतों से हराया. 2025 में नितिन नवीन को 98 हजार से अधिक वोट हासिल किए थे और आरजेडी की रेखा कुमारी को 51,936 वोटों से शिकस्त दी थी.
बांकीपुर सीट पर बीजेपी और नितिन नवीन को शिकस्त देने के लिए कांग्रेस ने 2020 में शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे यश सिन्हा को चुनाव मैदान में उतारा था, जिन्हें आरजेडी और लेफ्ट पार्टी का समर्थन हासिल था, उसके बाद भी जीत नहीं सके. इतना ही नहीं 2015 में आरजेडी-जेडीयू और कांग्रेस मिलकर भी बीजेपी को बांकीपुर सीट पर शिकस्त नहीं दे सके थे. अब नितिन नवीन के इस्तीफे बाद हो रहे उपचुनाव पर सभी की निगाहें है.
बांकीपुर सीट का सियासी समीकरण
बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का सियासी समीकरण काफी अहम है, जिसके चलते ही बीजेपी के लिए यह सीट अजेय बनी हुई है. यहां पर कुल कुल मतदाताओं की संख्या करीब 3 लाख 91 हजार है. यहां पर सबसे ज्यादा मतदाता कायस्थ समुदाय के हैं. माना जाता है कि 14 फीसदी कायस्थ वोटर हैं, जो 60 से 65 हजार है. इसके बाद दूसरे नंबर पर यादव वोटर हैं, जो 12 फीसदी (55 से 60 हजार) है.
मुस्लिम वोटर 10 फीसदी, चंद्रवंशी 9 फीसदी, वैश्य समुदाय 9 फीसदी, दलित 8 फीसदी, भूमिहार 7 फीसदी, ब्राह्मण 7 फीसदी, राजपूत 5 फीसदी, कुर्मी 5 फीसदी और कुशवाहा समाज का 3 फीसदी वोट है. इस सीट पर सबसे निर्णायक भूमिका कायस्थ समाज की है, जो पारंपरिक रूप से भाजपा का कोर वोटर माना जाता रहा है. कायस्थों के साथ वैश्य, राजपूत और ब्राह्मण वोटर्स बीजेपी की जीत का आधार है.
वहीं, मुस्लिम, यादव और दलित वोटर भी काफी अहम माने जाते हैं. मुस्लिम और यादव आरजेडी का कोर वोटबैंक माने जाते हैं. बांकीपुर सीट पर कुर्मी, चंद्रवंशी और कोइरी मतदाताओं की भी अच्छी संख्या है. माना जा रहा है कि आरजेडी किसी चंद्रवंशी समाज के प्रत्याशी को उतारकर नया समीकरण बनाने की कवायद में तो पीके के उतरने से बीजेपी के कोर वोटबैंक के छिटकने का खतरा पैदा हो गया है.
सम्राट चौधरी की पहली अग्निपरीक्षा
बिहार के सियासी इतिहास में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री है. इस तरह सीएम सम्राट चौधरी के सत्ता संभालने के बाद पहली बार बिहार में उपचुनाव हो रहा है. बांकीपुर सीट बीजेपी अध्यक्ष के इस्तीफे से खाली हुई है, जिसके चलते सम्राट चौधरी के लिए बांकीपुर का चुनाव एक तरह से जनमत संग्रह माना जा रहा है. बांकीपुर उपचुनाव के नतीजो को सम्राट चौधरी के अगुवाई में बनी दो महीने पुरानी सरकार के कामकाज से जोड़कर देखा रहा है. बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव अब सिर्फ एक विधानसभा सीट के लिए मुकाबला नहीं रह गया है बल्कि इसे बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लिए पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है.
1995 से बांकीपुर सीट पर बीजेपी का कब्जा है और नितिन नवीन जिस तरह से हर समीकरण को ध्वस्त कर एकतरफा जीत दर्ज करते रहे हैं, उसके चलते सम्राट चौधरी के लिए अब उस सीट को सिर्फ जीतने की नहीं बल्कि जीत की मार्जिन के रिकार्ड को बरकरार रखने की चुनौती होगी. खासकर ऐसे समय में जब भरत तिवारी के एनकाउंटर को लेकर ब्राह्मण वोटर बीजेपी से नाराज माने जा रहे हैं. वही, दूसरी तरफ पीके के चुनाव मैदान में उतरने से बीजेपी के सवर्ण वोटबैंक खिसकने का भी खतरा बन गया है.
पीके क्या बदल पाएंगे सियासी गेम
प्रशांत किशोर ने ये साफ कर दिया है कि ये चुनाव यदि उनके लिए अग्निपरीक्षा है तो सम्राट चौधरी के दो महीने के कार्यकाल वाली सरकार के लिए जनमत संग्रह है.प्रशांत किशोर द्वारा जन सूराज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में बांकीपुर से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद उपचुनाव का महत्व और भी बढ़ गया है. उनके मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है और राज्य स्तरीय मुद्दे चुनाव प्रचार के केंद्र में आ गए हैं.
प्रशांत किशोर पिछले कुछ हफ्तों से बिहार के ज्वलंत मुद्दे जैसे भोजपुर मुठभेड़, नीट छात्र मामला, कथित टेंडर घोटाला, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शासन जैसे मुद्दों को उठा रहे हैं. उन्होंने कहा है कि बांकीपुर उपचुनाव लोगों के लिए इन मुद्दों पर अपना फैसला सुनाने का अवसर है. प्रशांत किशोर बांकीपुर उपचुनाव जनमत संग्रह मानते हैं. प्रशांत किशोर के लिए भी यह चुनाव महत्वपूर्ण है, जन सूराज पार्टी की स्थापना के बाद उनका पहला प्रत्यक्ष चुनावी मुकाबला है. अच्छा प्रदर्शन उनके इस दावे को मजबूत करेगा कि बिहार एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में है.
बांकीपुर चुनाव किसके लिए कितना अहम
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव पिछले कुछ महीनों से बिहार की राजनीति में छाए मुद्दे मतदान को प्रभावित करेंगे या नहीं. भोजपुर मुठभेड़, नीट छात्र मृत्यु मामला, भ्रष्टाचार के आरोप, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था राजनीतिक सुर्खियों में बने रहे हैं. बांकीपुर के नतीजे से पता चलेगा कि ये मुद्दे सिर्फ राजनीतिक चर्चा का विषय बनकर रह गए हैं या उन्होंने जनमत को प्रभावित किया है.
बीजेपी के लिए भी बांकीपुर सीट जीतना उतना ही महत्वपूर्ण है. यह निर्वाचन क्षेत्र वर्षों से पार्टी की सबसे मजबूत शहरी सीटों में से एक रहा है।.इस सीट को बरकरार रखने से एनडीए यह दावा कर सकेगा कि विपक्ष की आलोचना के बावजूद मतदाता उसके शासन का समर्थन करते हैं. इस मुकाबले पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि बांकीपुर में भाजपा के वोटों को कोई नहीं बांट पाएगा. उन्होंने कहा कि भाजपा हमेशा इस सीट से जीतती आई है और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में फिर से जीतेगी.
वहीं, आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने उपचुनाव को सरकार के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बताया. उन्होंने कहा कि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहला चुनाव है और दावा किया कि भ्रष्टाचार, भोजपुर मुठभेड़, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था और सरकार के अधूरे वादों को लेकर जनता का गुस्सा नतीजों में दिखेगा. उन्होंने आरजेडी की जीत का विश्वास जताया है, लेकिन अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं.
बांकीपुर उपचुनाव अब सिर्फ एक विधानसभा सीट के लिए मुकाबला नहीं है. यह एनडीए सरकार के प्रदर्शन, विपक्ष के जन मुद्दों पर अभियान और प्रशांत किशोर की एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में लोकप्रियता की परीक्षा लेने वाला चुनाव बन गया है.