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जगन्नाथजी बीमार हो जाते हैं तो नहलाते क्यों हैं? छिड़ी बहस के बीच जानिए पीछे की सांइस

ओडिशा के पुरी में 16 जुलाई को विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा उत्सव आयोजित होगा जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर गुंडिचा धाम जाएंगे.

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पुरी में भगवान जगन्नाथ का एकांतवास शुरू हो चुका है
पुरी में भगवान जगन्नाथ का एकांतवास शुरू हो चुका है

ओडिशा के जगन्नाथ पुरी में 'रथयात्रा' की तैयारियां चल रही हैं. इस बार रथयात्रा उत्सव का आयोजन 16 जुलाई को है. भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होंगे और गुंडिचा धाम तक जाएंगे. देवी गुंडिचा को भगवान जगन्नाथ की मौसी माना जाता है और हर साल आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की द्वितीया के दिन यह विश्वप्रसिद्ध यात्रा निकाली जाती है.

लेकिन इस यात्रा से ठीक पहले 14 दिनों का एक खास अनुष्ठान चर्चा में बना रहता है. यह वह समय है जब 14 दिन तक श्रीमंदिर में भगवान के दर्शन बंद रहते हैं और वह 'एकांतवास' में चले जाते हैं. माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं और इस बीमारी के कारण ही वह सबसे अलग-थलग होकर निवास करते हैं. इसे 'अनासरा विधान' कहा जाता है.

सोशल मीडिया पर 'अनासरा विधान' पर छिड़ी बहस

अनासरा विधान के शुरू होते ही सोशल मीडिया पर 'आस्था बनाम विज्ञान' की एक बहस चलने लगती है. लोगों का तर्क है कि जब हर साल स्नान के कारण भगवान बीमार पड़ते हैं तो फिर ऐसा हर बार किया ही क्यों जाता है? उन्हें स्नान न कराया जाए तो महाप्रभु जगन्नाथ बीमार नहीं पड़ेंगे. यह तर्क की बात है. लेकिन आस्था में इसे कर्म के विधान से जोड़ा गया है. जहां माना जाता है कि महाप्रभु अपने भक्तों के रोग-शोक आदि को अपने ऊपर ले लेते हैं और इसी वजह से बीमार पड़ जाते हैं.

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Rathyatra Odisha

...लेकिन क्यों है एकांतवास की परंपरा?

बीमारी के कारण अलग-थलग होना रोगों के उपचार की प्राचीन पद्धति में शामिल है और मंदिर परंपरा के जरिये ही संस्कृति का हिस्सा बन गया है. इसका प्रमुख कारण ये है कि अलग-थलग होने से बीमारी के संक्रमण पर रोकथाम की जा सकती है और इसके जरिये रोगी को सही इलाज मिल सकता है.

क्वारंटाइन का साइंस और पुरी की परंपरा

रोगी को 14 दिनों तक अलग-थलग रखने की इस प्रोसेस से दुनिया 'कोरोना पीरियड' में परिचित हुई थी. इस दौरान जब कोरोना के मरीजों को 14 दिनों के लिए अलग रखना अनिवार्य किया गया और इसे क्वारंटाइन प्रोसेस कहा गया. 

क्वारंटाइन इटालवी शब्द है, जिसका मूल शब्द है 'क्वारंटा जिओनी' जिसका अर्थ है 40 दिन. इटली में इसका इतिहास 600 साल पुराना है, जब प्लेग की महामारी फैली थी, लेकिन भारत में इसका इतिहास मंदिर परंपरा से लेकर सामाजिक जीवन में भी शामिल रहा है.

सूतक-पातक भी इसी परंपरा का हिस्सा 

घर में जन्म और मृत्यु के समय जो सूतक लगता है वह कुछ-कुछ ऐसा ही है. जन्म होने पर मां और नवजात को 10 दिन के लिए अलग रखा जाता है. मृत्यु की स्थिति में भी दाह संस्कार करने वाला शख्स अन्य लोगों से अलग रहता है. ये सभी क्वारंटाइन के ही रूप हैं. बौद्ध परंपरा में भी जन्म-मृत्यु और बीमारी के समय अलग-थलग रहने और रखे जाने का विधान है. कुष्ठ रोगी को भी सामान्य लोगों से अलग रखा जाता है ताकि संक्रमण न फैले. इसके अलावा भारत में चेचक का लंबा प्रकोप रहा है. इस बीमारी में भी रोगियों को अलग रखा जाता रहा है.

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स्नान पूर्णिमा के बाद 'बीमार' पड़ते हैं भगवान

इसी तरह पुरी में भगवान जगन्नाथ हर साल 14 दिन अलग रहते हैं. मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा को महास्नान के अनुष्ठान के बाद वह बीमार पड़ जाते हैं. महास्नान में उन्हें 108 कलशों में भरे सुगंधित शीतल जल से नहलाया जाता है. फिर वह 'गजाबेशा' (गणपति रूप) धारण करते हैं. इसके बाद अगले दिन वह बीमार पड़ जाते हैं और अमावस्या तक एकांत में रहते हैं. इसे जगन्नाथ महाप्रभु का 'अनासरा विधान' कहा जाता है. इस दौरान राजवैद्य की देखरेख में जड़ी-बूटियों का पानी दिया जाता है. 

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क्या है बीमारी और एकांतवास के विधान का रहस्य?

लेकिन सवाल उठता है कि क्या भगवान सच में बीमार पड़ते हैं? क्यों और कैसे? इस अनुष्ठान के पीछे एक करुण कहानी छिपी हुई है जो असल में 'कर्म और प्रारब्ध' के सिद्धांत को सामने रखती है.

भक्त माधव दास की कथा

कहानी ऐसी है कि भगवान के एक भक्त थे माधव दास. एक बार वह बीमार पड़े. उन्हें तेज ज्वर (बुखार) हो गया. वह अकेले थे तो कोई उनकी सेवा के लिए नहीं था. फिर भी उन्होंने अपनी भक्ति में कोई कमी नहीं की.  लोग उन्हें सलाह तो देते थे कि वैद्य से मिलो, औषधि लो, लेकिन उपचार कराने और उनकी देखभाल के लिए लेकर कोई आगे नहीं बढ़ता था.

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माधवदास भी कहते कि जब भगवान मेरा ख्याल रख रहे हैं तो मुझे किसी की क्या जरूरत. लेकिन, एक दिन बीमारी से कमजोर माधव दास बेहोश होकर गिर पड़े. तब अपने भक्त को संकट में देखकर भगवान खुद श्रीमंदिर से निकल आए और उनकी सेवा करने लगे. 

जगन्नाथ जी उन्हें दवा देते, हाथ-पैर दबाते. नहलाते, कपड़े बदलते और अपने हाथ से भोजन कराते थे. माधवदास जब ठीक होने लगे तब उन्होंने पहचाना कि भगवान खुद उनकी सेवा में लगे हैं.

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यह देखकर माधव दास रो पड़े. उन्होंने कहा कि आप मेरी सेवा करने क्यों आए? आप मुझे तुरंत ठीक भी तो कर सकते थे. तब जगन्नाथ जी ने कहा, मैं अपने भक्तों का साथ नहीं छोड़ता, लेकिन उनके कर्म में जो लिखा है वह तो होगा ही, लेकिन चलो, मैं एक काम करता हूं. अभी तुम्हारी बीमारी के 15 दिन और बाकी हैं, वह मैं अपने ऊपर ले लेता हूं. माना जाता है कि उस दिन ज्येष्ठ पूर्णिमा थी.

जगन्नाथ जी अपने मंदिर पहुंचे और उसी दिन उन्हें स्नान के बाद ज्वर होने लगा. तब से यह परंपरा पुरी में चल पड़ी. भगवान अपने उसी भक्त माधवदास की बीमारी में बीमार होते हैं और इस दौरान एकांतवास में चले जाते हैं. कहते हैं कि जैसे एक बार उन्होंने अपने भक्त माधवदास की पीड़ा अपने ऊपर ली थी, उसी तरह वह हर साल अपने भक्तों की पीड़ा हर लेते हैं, लेकिन भक्ति सच्ची होनी चाहिए. इसके 15 दिन बाद जब भगवान ठीक होते हैं तब नैनासर उत्सव मनाते हैं, और भगवान भ्रमण के लिए बाहर निकलते हैं. इसी को रथयात्रा उत्सव कहते हैं.
 

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