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अब अंडे और चिकन बिरयानी भी... जब शुरू हुआ था मिड-डे मील तो क्या था मेन्यू?

Mid Day Meal Menu: भारत में मिड-डे मील का मेन्यू कुछ सालों में पूरी तरह बदल गया है. तो जानते हैं जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब बच्चों को क्या-क्या सर्व किया जाता था.

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भारत में पीएम पोषण स्कीम के तहत 10 करोड़ से ज्यादा बच्चों को खाना मिलता है. (Photo: PTI)
भारत में पीएम पोषण स्कीम के तहत 10 करोड़ से ज्यादा बच्चों को खाना मिलता है. (Photo: PTI)

एक बार फिर स्कूलों में दिए जाने वाले मिड डे मील का मेन्यू चर्चा में है. इस बार चर्चा में आने की वजह से तमिलनाडु सरकार की ओर से दिया गया एक प्रस्ताव, जिसमें कहा गया है कि अब बच्चों को हफ्ते में एक बार चिकन बिरयानी भी दी जाएगी. इसके अलावा बंगाल में अंडा देने की वजह से मिड डे मील की चर्चा हो रही है. दरअसल, पश्चिम बंगाल में कुछ दिन पहले मेन्यू से अंडा को हटा दिया गया था, लेकिन अब फिर से इसका शुरुआत कर दी गई है. ऐसे में जानते हैं कि बार-बार चर्चा में रहने वाला मिड डे मील का मेन्यू उस वक्त कैसा था, जब इसकी शुरुआत हुई और अब ये कितना बदल गया है...

क्या है मिड डे मील की कहानी

पहले आपको बता दें कि आखिर मिड-डे मील है क्या? मिड-डे मील सरकार की एक स्कूल पोषण योजना है, जिसके तहत सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को स्कूल समय के दौरान मुफ्त पका हुआ दोपहर का भोजन दिया जाता है. स्कूलों में दिए जाने वाला मिड-डे मील की शुरुआत दो तरीके से मानी जाती है. वैसे तो बड़े स्तर पर 1995 में इसकी शुरुआत की गई थी, जबकि इसका कॉम्सेप्ट साल 1920 यानी आजादी से पहले ही आ गया था. 

बता दें कि  स्कूलों में बच्चों को खाना खिलाने की पहली पहल 1920 में तत्कालीन मद्रास नगर निगम ने की थी. इसके बाद आजादी के बाद तमिलनाडु ने एक बार फिर अग्रणी भूमिका निभाई, जहां मुख्यमंत्री के. कामराज ने 1956 में स्कूल फीडिंग योजना शुरू की. 

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ऐसे ही केरल में 1961 से एक मानवीय एजेंसी द्वारा संचालित स्कूल लंच योजना थी. फिर वहां की राज्य सरकार ने 1 दिसंबर 1984 को आधिकारिक तौर पर इस पहल को अपने हाथ में ले लिया, जिससे केरल देश का दूसरा राज्य बन गया जहां स्कूल लंच कार्यक्रम शुरू हुआ. अगले कुछ सालों में कई दूसरे राज्यों ने भी ऐसी  योजना  शुरू हुई और स्कूल में बच्चों को खाना खिलाए जाने  लगा. फिर 1995 में केंद्र सरकार ने इसमें हस्तक्षेप किया. 1995 में यह राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बन गया. माना जाता है कि अब 10 करोड़ से ज्यादा (करीब 12 करोड़) बच्चे हर स्कूली दिन दोपहर का भोजन करते हैं, जिससे यह दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा कार्यक्रम बन गया है. 

इसे वैसे तो हर राज्य में अलग-अलग नाम से जाना जाता है, लेकिन साल 2021 में मोदी सरकार ने इस योजना का नाम बदलकर इसे सीधे प्रधानमंत्री से जोड़ दिया. अब इसे आधिकारिक तौर पर पीएम पोषण शक्ति निर्माण या पीएम पोषण कहा जाता है. 

mid day meal

क्यों हुई थी शुरुआत?

बच्चों को स्कूल में खाना खिलाने की ये योजना बच्चों में कुपोषण कम करने, स्कूलों में नामांकन बढ़ाने, ड्रॉपआउट कम करने और अटेंडेंस बढ़ाने के लिए शुरू की गई थी. जब इसकी शुरुआत हुई थी, उस वक्त तक कक्षा 5 तक के बच्चों को खाना दिया जाता था, लेकिन साल 2007 में इसे कक्षा 8 तक कर दिया गया.

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मेन्यू और क्वालिटी से चर्चा में रहता है मिड-डे मील

वैसे तो अक्सर मिड-डे मील की क्वालिटी पर सवाल उठते हैं. आए दिन वीडियो आते हैं, जिसमें दिखता है कि बच्चों को पोषण के नाम क्या परोसा जा रहा है. इसके अलावा इसका मेन्यू राजनीति का भी मुद्दा रहा है और इसकी वजह से राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चा हुई है. जैसे जब-जब मेन्यू में बदलाव होता है, तो काफी बवाल होता है, जैसे अभी भी तमिलनाडु और बंगाल में हो रहा है. हर बार मिड-डे मील में अंडा शामिल करने को लेकर बवाल उठा है. 

अंडे को लेकर विवाद

देश के लगभग आधे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में छात्रों को दोपहर के भोजन के हिस्से के रूप में अंडे दिए जाते हैं।. इनमें केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, असम, बिहार, त्रिपुरा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम और मेघालय राज्य और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं. इसमें कुछ राज्यों में अंडा रोज तो कुछ कुछ राज्यों में सप्ताह में कुछ दिन दिया जाता है. इसके अलावा कुछ राज्यों में मिड-डे मील का मेन्यू वेजिटेरियन है, लेकिन अंडों के लिए स्कूलों को अलग से फंड दिया जाता है. ऐसे में जब भी अंडों को शामिल किया जाता है या फिर हटाया जाता है तो बवाल हो जाता है. 

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वहीं, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, दिल्ली और गोवा ऐसे राज्य हैं, जहां वेज खाना ही दिया जाता है. लेकिन, इनका मेन्यू हर राज्य के हिसाब से बदल जाता है, जैसे गुजरात में खिचड़ी, दाल, सब्जी दी जाती है और उत्तर प्रदेश में दाल, रोटी, मौसमी सब्जियां आदि होती हैं. कई राज्यों में बच्चों को दूध भी दिया जाता है. 

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क्या है मेन्यू का सिस्टम

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के अनुसार भोजन का मेन्यू अलग-अलग होता है. लेकिन, अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि चावल, दाल, सब्जियां, तेल और वसा से बने भोजन में मौजूद पोषक तत्व प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को कम से कम 450 कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन प्रदान करें. उच्च प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के लिए यह आवश्यकता 700 कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन है. 

सबसे पहले क्या रखा गया था मेन्यू?

जब मिड-डे मील की शुरुआत की गई थी, उस वक्त बच्चों को सीधे अनाज दिया जाता था. जैसे हर बच्चे को हर स्कूल दिन के हिसाब से 100 ग्राम चावल दिए जाते थे. लेकिन बाद में कोर्ट के आदेश के बाद बच्चों को पका हुआ खाना देने की शुरुआत हुई. फिर बच्चों को पकाकर खाना दिया जाने लगा. शुरुआत में चावल/गेहूं, दाल, मौसमी सब्जियां दी जाती थी, लेकिन फिर हर राज्य ने इसमें अपने बजट के हिसाब से केला, दूध, अंडे आदि शामिल किए.

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वहीं, तमिलनाडु में जब सबसे पहले इसकी शुरुआत हुई थी, उस वक्त बच्चों को चावल, सांभर आदि दिया जाता था. इसके बाद इसमें एक मसालों और तेल में पकाए गए भोजन आदि शामिल किए गए. फिर 1989 में सप्ताह में एक दिन अंडा दिया जाने लगा, फिर सप्ताह में रोज अंडा दिया जाने लगा. केला आदि भी शामिल किए गए. अब चिकन बिरयानी का प्रस्ताव भी गया  है. 

किसी और राज्य में भी मिलता है चिकन?

बता दें कि एक राज्य को छोड़कर किसी राज्य के मिड-डे मील मेन्यू में चिकन नहीं है. लक्षद्वीप में चिकन भी उपलब्ध कराया जाता है. पश्चिम बंगाल सीमित मात्रा में पनीर और मशरूम उपलब्ध कराता है, जबकि आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र चिक्की उपलब्ध कराते हैं. 
 

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