भगवान जगन्नाथ (Bhagwan Jagannath) हिंदू धर्म के प्रमुख आराध्य देवताओं में से एक हैं. उन्हें भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है. भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ पूजे जाते हैं. इन तीनों की प्रतिमाएं ओडिशा के पुरी स्थित प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में विराजमान हैं, जो भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में गिना जाता है.
जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में अनंतवर्मन चोडगंग देव के शासनकाल में शुरू हुआ था. यह मंदिर हिंदू धर्म के चार प्रमुख धामों में शामिल है. हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं.।
भगवान जगन्नाथ की प्रतिमाएं लकड़ी से बनाई जाती हैं. समय-समय पर एक विशेष धार्मिक परंपरा के तहत पुरानी प्रतिमाओं के स्थान पर नई प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं. इस प्रक्रिया को 'नवकलेवर' कहा जाता है. यह अनुष्ठान हर वर्ष नहीं होता, बल्कि विशेष ज्योतिषीय गणना के आधार पर निर्धारित वर्षों में आयोजित किया जाता है, जो लगभग 12 सालों पर होता है.
भगवान जगन्नाथ से जुड़ा सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन रथ यात्रा है. यह उत्सव हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित किया जाता है. इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा तीन अलग-अलग विशाल रथों में सवार होकर मुख्य मंदिर से गुंडीचा मंदिर तक जाते हैं. लाखों श्रद्धालु रस्सियों से इन रथों को खींचते हैं. कुछ दिनों के प्रवास के बाद देवताओं की वापसी यात्रा, जिसे 'बहुदा यात्रा' कहा जाता है, आयोजित होती है.
तीनों रथों के अलग-अलग नाम हैं. भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष, भगवान बलभद्र के रथ को तालध्वज और माता सुभद्रा के रथ को दर्पदलन कहा जाता है. हर वर्ष इन रथों का निर्माण नई लकड़ी से पारंपरिक नियमों के अनुसार किया जाता है.
जगन्नाथ मंदिर में प्रतिदिन कई धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पद्धतियां संपन्न होती हैं. यहां बनने वाला महाप्रसाद भी धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है.
भगवान जगन्नाथ की पूजा केवल ओडिशा तक सीमित नहीं है. भारत के कई राज्यों और विदेशों में भी जगन्नाथ मंदिर स्थापित हैं. रथ यात्रा का आयोजन भी अनेक शहरों में किया जाता है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं.
Jagannath Rath Yatra 2026: जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी सबसे रहस्यमयी परंपरा! स्नान पूर्णिमा के बाद 15 दिनों तक क्यों बंद रहते हैं मंदिर के कपाट और कैसे होता है प्रभु का उपचार? पढ़ें पूरी जानकारी
ओडिशा के पुरी में 16 जुलाई को विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा उत्सव आयोजित होगा जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर गुंडिचा धाम जाएंगे.
Jagannath Rath Yatra: हमेशा जगन्नाथ मंदिर में होने वाले चमत्कार लोगों को चौंकाते रहते हैं. वहीं, इस मंदिर की रसोई का रहस्य भी काफी चर्चा में रहता है. जिसमें चूल्हे पर रखे 7 बर्तनों में सबसे ऊपर वाले का खाना सबसे पहले पकने का भी अनोखा रहस्य है. चलिए जानते हैं.
पुरी के जगन्नाथ मंदिर में महास्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को 108 कलशों में भरे सुगंधित जल से स्नान कराया जाता है. इस दिन भगवान का गजानन वेश किया जाता है, जो गणपति रूप में उनकी पूजा का प्रतीक है.
पुरी के जगन्नाथ धाम में रथयात्रा से पहले अनासरा विधान के तहत भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहनों का 15 दिनों का एकांतवास शुरू होने वाला है. इस दौरान मंदिर में घंटा और शंखनाद बंद रहेंगे, पूजा विधि में विशेष बदलाव किए जाएंगे.
पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में स्नान यात्रा की तैयारियों के चलते शनिवार रात 10:30 बजे से रविवार दोपहर करीब 1 बजे तक श्रद्धालुओं के लिए दर्शन बंद रहेंगे. 29 जून को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की स्नान पूर्णिमा मनाई जाएगी. इस दौरान लाखों श्रद्धालुओं के आने की संभावना को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के विशेष इंतजाम किए हैं. दैतापति सेवकों ने भी विशेष धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत कर दी है.
विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ यात्रा इस साल 16 जुलाई से शुरू होगी और 24 जुलाई तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ संपन्न होगी. इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का 108 पवित्र कलशों के जल से विशेष अभिषेक किया जाता है. मान्यता है कि इस महाअभिषेक के बाद भगवान जगन्नाथ को बुखार हो जाता है. फिर वे लगभग 15 दिनों तक अस्वस्थ रहते हैं.