जुलाई से ही गरम था ये इलाका... कहीं अल-नीनो तो नहीं है नेपाल में तबाही की वजह?

जुलाई 2026 सबसे गर्म महीनों में रहा है. उसका असर हिमालय पर भी पड़ा है. ऊपर से अल-नीनो का असर. इसकी वजह से ग्लेशियरों का पिघलना जायज है. कहीं ऐसा तो नहीं कि नेपाल हादसे के पीछे ये भी वजह हो.

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इस जुलाई और अगस्त महीने में नेपाल और हिमालय के लिए बेहद गर्म थे. जिससे ग्लेशियर पर असर पड़ता है. (Photo: ITG) इस जुलाई और अगस्त महीने में नेपाल और हिमालय के लिए बेहद गर्म थे. जिससे ग्लेशियर पर असर पड़ता है. (Photo: ITG)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 27 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 4:06 PM IST

हिमालय में पिछले दिनों असामान्य तापमान वृद्धि दर्ज हुई. वैज्ञानिक आंकड़े जलवायु परिवर्तन की पुष्टि करते हैं. इनकार करने से समस्या नहीं सुलझेगी, बल्कि ग्लेशियर और जल सुरक्षा खतरे में पड़ रही है. पिछले कुछ दिनों में पूरे हिमालयी क्षेत्र में तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया है. इस असामान्य गर्मी की चर्चा जोरों पर है.

वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि यह कोई अचानक घटना नहीं बल्कि लंबे समय से चल रहे ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा है. हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में तापमान की वृद्धि मैदानी इलाकों की तुलना में तेज होती है. पिछले एक महीने के आंकड़ों और अध्ययनों से यह साफ है कि इनकार करने से समस्या हल नहीं होती.  

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पिछले एक महीने के तापमान आंकड़े

जुलाई 2026 वैश्विक स्तर पर सबसे गर्म जुलाई महीनों में से एक रहा. कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार जुलाई 2026 का वैश्विक औसत तापमान 1991-2020 की तुलना में 0.67 डिग्री सेल्सियस अधिक था. पूर्व-औद्योगिक काल से 1.47 डिग्री अधिक. एशिया और मध्य एशिया में गर्मी के असामान्य पैच देखे गए. 

चीन के राष्ट्रीय जलवायु केंद्र के अनुसार जुलाई 2026 में तिब्बती पठार का तापमान 1961-1990 की औसत से 2.1 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, जो रिकॉर्ड तोड़ने वाला था. इंसानी गतिविधियों ने ऐसी चरम गर्मी की संभावना को लगभग 68 गुना बढ़ा दिया.  

नेपाल के मौसम विज्ञान विभाग की जुलाई 2026 रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक रहे. यह लगातार 5वां जुलाई था जब अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहा. कुछ स्टेशनों पर पॉजिटिव एनॉमली 3.5 डिग्री तक पहुंच गई. 

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पश्चिमी हिमालय यानी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्रों में भी जुलाई में कई स्थानों पर रिकॉर्ड तोड़ गर्मी दर्ज हुई. अध्ययन बताते हैं कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पिछले दो दशकों में तापमान करीब 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. रात का तापमान दिन की तुलना में तेज बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियरों को राहत नहीं मिल पाती.  

अगस्त की शुरुआत में भी कई हिस्सों में तापमान सामान्य से ऊपर बना रहा, हालांकि मॉनसून की बारिश ने कुछ जगहों पर राहत दी. लेकिन ऊंचे क्षेत्रों और तिब्बती पठार की ओर तापमान विसंगतियां बनी रहीं. ये आंकड़े बताते हैं कि 'कुछ दिनों की गर्मी' कोई अकेली घटना नहीं बल्कि व्यापक पैटर्न का हिस्सा है.  

यह अल-नीनो से जुड़ा हुआ है

2026 में एक तेज और मजबूत अल-नीनो विकसित हुआ है. अप्रैल-मई के आसपास शुरू होकर जुलाई-अगस्त तक यह काफी मजबूत हो गया. अगस्त की शुरुआत तक अल-नीनो 3.4 सूचकांक लगभग +2.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका था. पूर्वानुमान बताते हैं कि साल के अंत तक यह +3.5 से +4.0 डिग्री तक जा सकता है, जो आधुनिक रिकॉर्ड का सबसे शक्तिशाली अल-नीनो बन सकता है.

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हिमालय की गर्मी से कैसे जुड़ा है?

  • वैश्विक तापमान बढ़ाना: अल-नीनो प्रशांत महासागर से अतिरिक्त गर्मी वायुमंडल में छोड़ता है. इससे दुनिया भर का औसत तापमान बढ़ जाता है. जुलाई 2026 के रिकॉर्ड तोड़ गर्मी में इसकी भूमिका रही.
  • एशिया और हिमालय पर असर: अल-नीनो आमतौर पर एशिया के बड़े हिस्से, तिब्बती पठार और हिमालय क्षेत्र में सामान्य से अधिक तापमान लाता है. यह दक्षिण एशियाई मॉनसून को कमजोर भी कर सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में बादल कम और गर्मी ज्यादा पड़ती है.
  • जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर: लंबे समय से चल रहा ग्लोबल वार्मिंग (ग्रीनहाउस गैसों से) हिमालय के तापमान बढ़ने का मुख्य कारण है. अल-नीनो इसके ऊपर एक अतिरिक्त अस्थायी बढ़ावा देता है, जिससे गर्मी और भी तेज हो जाती है.

हिमालय क्यों ज्यादा गर्म हो रहा है

वैज्ञानिकों का कहना है कि ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान वृद्धि तेज होती है. इसे एलिवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग कहते हैं. बर्फ और बर्फ के पिघलने से धरती की परावर्तन क्षमता (अल्बेडो) कम हो जाती है, जिससे ज्यादा गर्मी अवशोषित होती है. रात का तापमान बढ़ने से ग्लेशियर रात में भी पिघलते रहते हैं. पश्चिमी हिमालय मध्य और पूर्वी हिस्सों की तुलना में तेज गर्म हो रहा है. एक अध्ययन के अनुसार उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में सदी के अंत तक पश्चिमी हिमालय की सर्दियां 7 डिग्री से अधिक गर्म हो सकती हैं.

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जलवायु परिवर्तन से इनकार का खतरा

कई लोग अभी भी जलवायु परिवर्तन को नकारते हैं या इसे प्राकृतिक चक्र बताते हैं. लेकिन वैज्ञानिक आंकड़े स्पष्ट हैं. ग्लोबल तापमान पहले ही पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.4 डिग्री से अधिक बढ़ चुका है. हिमालय में यह वृद्धि और तेजी से हो रही है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं, ग्लेशियल झीलें बढ़ रही हैं और बाढ़ तथा सूखे का खतरा बढ़ रहा है. हालिया नेपाल-तिब्बत सीमा की बाढ़ जैसी घटनाएं इसी अस्थिरता का नतीजा हैं. इनकार करने से न तो तापमान रुकता है और न ही नुकसान कम होता है.  

तापमान के ये आंकड़े चेतावनी हैं. उत्सर्जन कम करना, नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ाना, हिमालयी क्षेत्रों में निगरानी मजबूत करना और स्थानीय समुदायों को तैयार करना जरूरी है. वैज्ञानिक रिपोर्ट्स बार-बार कह रही हैं कि समय बचाने का मौका कम होता जा रहा है. हिमालय की गर्मी सिर्फ पहाड़ों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा, कृषि और जीवन से जुड़ी है. आंकड़ों को नजरअंदाज करने की बजाय उन पर आधारित नीतियां बनानी होंगी.  

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