बंगाल इफेक्ट.. यूपी में ओवैसी क्या अखिलेश यादव की चादर खींचने जा रहे हैं?

बिहार के बाद सबका रुख बंगाल की ओर था, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी तभी से उत्तर प्रदेश के बारे में सोचने लगे थे. यूपी में 2027 में विधानसभा के चुनाव होने हैं, और वहां अखिलेश यादव को भी बीजेपी से ही जूझना है. आखिर असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी AIMIM की भूमिका क्या होने वाली है?

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आम जनता उन्नयन पार्टी नेता हुमायूं कबीर और AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी. (Photo: PTI) आम जनता उन्नयन पार्टी नेता हुमायूं कबीर और AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 07 मई 2026,
  • अपडेटेड 3:52 PM IST

हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी ने पश्चिम बंगाल चुनाव में पहले हाथ मिलाया था, लेकिन बाद में गठबंधन टूट गया. असल में, एक स्टिंग ऑपरेशन के चलते हुमायूं कबीर के विवादों में आ जाने पर असदुद्दीन ओवैसी ने हाथ झटक लिए. और, दोनों अलग-अलग चुनाव लड़े. 

तृणमूल कांग्रेस से सस्पेंड होने के बाद आम जनता उन्नयन पार्टी नाम से अपनी नई पार्टी बनाने वाले हुमायूं कबीर दो सीटों से चुनाव लड़े, और दोनों जगह जीत हासिल की. हुमायू्ं कबीर ने अपनी भरतपुर सीट छोड़ दी थी, और 2026 के चुनाव में नोवदा और रेजीनगर से चुनाव लड़े, और जीते. हुमायू्ं कबीर की सीट पर जीत दर्ज कर टीएमसी ने अपनी सीट बरकरार रखी है. भरतपुर सीट पर बीजेपी की अनामिका घोष महज 1620 वोटों के अंतर से हार गईं. लेकिन, मुर्शिदाबाद विधानसभा क्षेत्र जहां हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद बनवाने की घोषणा की है, वहां बीजेपी के गौरीशंकर घोष ने टीएमसी की शाओनी सिंह रॉय को शिकस्त देकर जीत हासिल की है. 

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पश्चिम बंगाल चुनाव में जहां हुमायूं कबीर ने दो सीटें अपने नाम कर डाली, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM अपना खाता भी नहीं खोल सकी है. लेकिन, अब असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश का रुख कर चुके हैं, जहां अगले साल 2027 में विधानसभा के चुनाव होने हैं. 

ओवैसी के मिशन यूपी का टार्गेट क्या है

बिहार में लगातार दूसरी बार 5 विधानसभा सीटें जीतने के बाद असदुद्दीन ओवैसी ने 2027 में यूपी चुनाव लड़ने की घोषणा की थी - सवाल है कि क्या ओवैसी भी यूपी में वही करने जा रहे हैं, जिसके लिए हुमायूं कबीर को पश्चिम बंगाल में जिम्मेदार माना जा रहा है? 

1. पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिले मुस्लिम आबादी के दबदबे के कारण हार जीत में निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं. पहले लेफ्ट फ्रंट के लिए, और बाद में तृणमूल कांग्रेस के लिए. 

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2. मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर की 43 सीटों पर, तृणमूल कांग्रेस का लगातार दबदबा बना रहा. टीएमसी ने 2021 में यहां की 35 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी को सिर्फ 8 सीटें मिली थीं. अकेले मुर्शिदाबाद जिले में टीएमसी ने 22 में से 20 सीटें अपने नाम कर डाली थी. मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी दो-तिहाई से ज्यादा है.

3. 2026 में पूरी रवायत बीजेपी के पक्ष में बदल गई. पांच साल में ही बीजेपी ने अपनी सीटें 8 से 18 पर पहुंचा दी, और टीएमसी को भारी नुकसान हुआ. मुस्लिम वोटों के दबदबे वाली पश्चिम बंगाल की 142 सीटों में से बीजेपी का दावा है कि उसके खाते में 72 सीटें आई हैं, और टीएमसी को 64 सीटें ही मिली हैं. बाकी सीटें कांग्रेस और अन्य के खाते में गई हैं. 

जिस तरह से असदुद्दीन ओवैसी आने वाले यूपी चुनाव में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, लगता है वो भी यूपी में वैसी ही तैयारी कर रहे हैं जैसा 'खेला' हुमायूं कबीर ने पश्चिम बंगाल में किया है. 2020 और 2025 के बिहार चुनाव के नतीजे तो सबूत भी हैं. 

पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे आने के बाद असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी तरफ से SIR का मुद्दा उठाया, और कहा, मैंने संसद में भी कहा था कि नागरिकता को SIR से जोड़ना गलत है. नागरिकता को लेकर गृह मंत्रालय के अपने नियम हैं. NRC और NPR के नियम भी मौजूद हैं. यह सिर्फ वोट डालने का मामला नहीं है, बल्कि अपनी नागरिकता सुरक्षित रखने का भी सवाल है.

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असदुद्दीन ओवैसी का कहना है, SIR ममता बनर्जी और एम के स्टालिन के चुनाव क्षेत्रों में भी कराए गए थे, और दोनों ही चुनाव हार गए.

AIMIM नेता ओवैसी के इरादों पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद कहती हैं, अगर असदुद्दीन ओवैसी को इतनी समस्या है, तो उनसे पूछना चाहिए कि वह उत्तर प्रदेश में 90 सीटों पर चुनाव कैसे लड़ रहे हैं? उन्हें पैसा कौन दे रहा है?

कांग्रेस प्रवक्ता की सलाह है, ओवैसी को BJP की ‘बी टीम’ बनना बंद करना चाहिए. आखिर वह कौन हैं? क्या सिर्फ वोटकटवा नेता हैं?

उत्तर प्रदेश में AIMIM का प्रदर्शन कैसा रहा है

बिहार में लगातार दो विधानसभा चुनावों में 5-5 सीटें जीतने, और पश्चिम बंगाल में दोनों बार गच्चा खा जाने वाले असदुद्दीन ओवैसी का यूपी में भी चुनावी प्रदर्शन बंगाल जैसा ही रहा है. पश्चिम बंगाल चुनाव में ओवैसी ने AIMIM के 11 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, और वे सभी चुनाव हार गए. वोट शेयर भी महज 0.09 फीसदी ही दर्ज किया गया. 

1. यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में ओवैसी की पार्टी AIMIM ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा था. उनमें से 37 सीटों पर AIMIM की जमानत जब्त हो गई थी. ध्यान देने वाली बात यह है कि AIMIM ने जिन सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, वे मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुस्लिम आबादी बहुल सीटें थीं.

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2. यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में AIMIM ने 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, और नतीजा सिफर ही रहा. 

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 19 फीसदी है. और, ऐसी 85 सीटें हैं जहां मुस्लिमों आबादी 25 से 50 फीसदी तक मानी जाती है. यूपी में 60 विधानसभा सीटें ऐसी भी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 से 25 फीसदी के बीच है.

1. यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में समाजवादी पार्टी ने 63 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे. नतीजे आए तो 34 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गए.

2. अखिलेश यादव ने 2017 में समाजवादी पार्टी का कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था. सपा-कांग्रेस गठबंधन के तहत 2017 में 88 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में थे. यूपी की मुस्लिम बहुल 85 सीटों में से 64 बीजेपी ने जीत ली थी, और समाजवादी पार्टी को सिर्फ 16 सीटें ही मिली थीं. 

CSDS के मुताबिक, 2017 में करीब 55 फीसदी मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी, 14 फीसदी बीएसपी, 33 फीसदी कांग्रेस और करीब 2 फीसदी बीजेपी के पक्ष में गया था. 2012 की बात करें, तो महज 39 फीसदी मुस्लिम वोट मिलने के साथ साथ समाजवादी पार्टी ने सरकार भी बना ली थी. 

जो सूरत-ए-हाल है, आने वाले यूपी चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की क्या भूमिका हो सकती है? क्या ओवैसी पर भी वैसे ही आरोप नहीं लगेंगे, जैसे बीते चुनावों में बीएसपी नेता मायावती पर बीजेपी की मददगार बनने के आरोप लगाए जाते रहे हैं.

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