मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार (15 अक्टूबर) को अहम सुनवाई होगी. कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत 13 विपक्षी नेताओं की ओर से दाखिल याचिका पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच सुनवाई करेगी. याचिका में चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, फॉर्म 6 में बदलाव और SIR से जुड़े फैसलों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं.
विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच जिन फैसलों या बिंदुओं पर असहमति रही है, उनका विस्तृत ब्यौरा अदालत के सामने पेश किया जाए.
फॉर्म 6 में बदलाव का फैसला किसने लिया?
याचिका में मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में बदलाव की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. विपक्षी नेताओं ने मांग की है कि यह स्पष्ट किया जाए कि फॉर्म 6 में बदलाव का फैसला किसने लिया था. इसके साथ ही इस फैसले से संबंधित बैठकों के मिनट्स और SIR से जुड़े सभी रिकॉर्ड अदालत में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाए.
SIR के फैसलों का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग
याचिका में SIR से संबंधित फैसलों की संवैधानिक वैधता की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की गई है. विपक्षी नेताओं का कहना है कि समिति के जरिए इन फैसलों का ऑडिट कराया जाना चाहिए.
इसके अलावा SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए लोगों के नाम और उनके नाम हटाने के कारण सार्वजनिक करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है.
SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने की अपील
विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट से SIR की मौजूदा प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की है. याचिका में संबंधित फैसलों और प्रक्रियाओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का अनुरोध भी किया गया है.
अब गुरुवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच इस याचिका पर सुनवाई करेगी. इस दौरान चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, संबंधित रिकॉर्ड और विपक्षी नेताओं की ओर से उठाए गए संवैधानिक सवालों पर अदालत में बहस हो सकती है.
याचिका में क्या-क्या मांगें रखी गई हैं, इसे लेकर अहम जानकारियां सामने आई हैं. याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के अधिकारों, वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रोसेस और चुनाव आयोग के डिजिटल डेटाबेस की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं. याचिका में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र जांच समिति बनाने की मांग भी की गई है.
इस याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या चुनाव आयोग ने SIR लागू करते समय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया? क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ने बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना फैसले लिए? याचिका में क्या है 10 बड़ी बातें-
1. CEC पर सवाल... क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले फैसले लिए?
याचिका में अहम आरोप सीईसी ज्ञानेश कुमार पर लगाया गया है. कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों की जानकारी और सहमति के बिना कई महत्वपूर्ण फैसले लिए. इसमें 23 सितंबर 2026 की इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्तियां जताई थीं. ये आपत्तियां वोटर्स के रजिस्ट्रेशन, नाम डिलीट होने, दोबारा जोड़ने और डेटा तक पहुंच से जुड़ी थीं. हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि फैसले सर्वसम्मति से हुए और विचारों में अंतर नॉर्मल प्रोसेस है.
2. देशभर में SIR किसकी मंजूरी से लागू हुआ?
याचिका में 24 जून 2025 के आदेश पर सवाल उठाया गया है. 28 जुलाई 2025 को दाखिल RTI में देशभर में SIR को मंजूरी देने वाली फाइलें मांगी गई थीं. आरोप है कि आयोग ने केवल 24 जून का आदेश उपलब्ध कराया. बाद में प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने दर्ज किया कि तब तक देशभर में SIR शुरू करने का कोई फैसला नहीं हुआ था. जबकि आदेश में पूरे देश में SIR कराने का उल्लेख था. वहीं, आयोग ने 26 सितंबर 2026 की प्रेस रिलीज में सर्वसम्मति से मंजूरी का दावा किया. याचिका में मूल फाइल मंगाने की मांग है.
3. टीएन शेषन मामले के फैसले का हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट की 1995 की संविधान पीठ के टीएन शेषन बनाम भारत संघ फैसले का उल्लेख है. इसके मुताबिक, सीईसी को अन्य चुनाव आयुक्तों से अधिक निर्णय लेने की शक्ति नहीं है. वर्ष 2023 के कानून की धारा 18 के तहत जहां संभव हो, फैसले सर्वसम्मति से और मतभेद होने पर बहुमत से होने चाहिए. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अकेले सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल संविधान के अनुच्छेद 324 का उल्लंघन हो सकता है.
4. फॉर्म-6 में बदलाव पर सवाल
याचिका में जुलाई 2026 के दौरान ऑनलाइन फॉर्म-6 में किए गए कथित बदलावों को गैरकानूनी बताया गया है. आरोप है कि आवेदकों से यह घोषणा मांगी गई कि उनका या उनके रिश्तेदारों का नाम पिछली SIR वोटर लिस्ट में था या नहीं. याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इसके लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संशोधन नहीं हुआ. याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर को मौखिक रूप से स्पष्ट किया था कि उसने संशोधित फॉर्म को मंजूरी नहीं दी थी.
5. ECINET और ERONET का स्वतंत्र ऑडिट
याचिका में चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINET और ERONET की स्वतंत्र तकनीकी जांच मांगी गई है. सवाल है कि वोटर्स का रिकॉर्ड कौन बदल सकता है और क्या बदलावों का रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है? कुछ रिपोर्टों का हवाला देकर आरोप लगाया गया कि सॉफ्टवेयर में पुरानी स्थिति बहाल करने की सुविधा नहीं होने से हटाए गए वोटर्स के नाम दोबारा नहीं जुड़ सके. याचिकाकर्ताओं ने इलेक्शन कमीशन की आंतरिक समीक्षा को अपर्याप्त बताया है.
6. करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम का मामला
याचिका में एक अन्य लंबित मामले का जिक्र है, जिसमें विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की वोटर्स लिस्ट से लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जाने का आरोप है. हालांकि, चुनाव आयोग के मुताबिक, यह संख्या अंतिम रूप से हटाए गए मतदाताओं की नहीं, बल्कि ड्राफ्ट चरण में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट चिह्नित मतदाताओं की है. याचिका में पात्र मतदाताओं के संभावित निष्कासन की जांच मांगी गई है.
7. फॉर्म-7 के जरिए सामूहिक आपत्तियों का मुद्दा
याचिका में फॉर्म-7 के जरिए बड़ी संख्या में नाम हटाने की आपत्तियां दाखिल होने पर चिंता जताई गई है. आरोप हैं कि कुछ मामलों में फर्जी नामों और झूठी घोषणाओं का इस्तेमाल हुआ. विशेष समुदायों और महिलाओं को निशाना बनाने तथा पर्याप्त नोटिस या सुनवाई के बिना नाम हटाने के आरोप भी लगाए गए हैं. याचिकाकर्ताओं ने सख्त सुरक्षा उपायों और जवाबदेही की मांग की है.
8. पंजाब में 20.66 लाख नाम कम होने का दावा
पंजाब का उदाहरण देते हुए याचिका में कहा गया है कि 13 अगस्त 2026 की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में जून के लगभग 2.14 करोड़ वोटर्स की तुलना में 20.66 लाख नाम कम थे. इसके अलावा 12.80 लाख मतदाताओं की पुरानी सूचियों से मैपिंग नहीं हो सकी और उनसे दस्तावेज मांगे गए. अंतिम सूची 12 अक्टूबर को प्रकाशित होनी निर्धारित थी. याचिका में पात्र मतदाताओं को पर्याप्त समय और प्रभावी उपाय न मिलने की आशंका जताई गई है.
9. EVM की वर्क प्रोसेस की भी जांच की मांग
याचिका का दायरा SIR तक सीमित नहीं है. इसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) से जुड़ी नीतियों, तकनीकी संरचना, इस्तेमाल और संचालन प्रक्रियाओं की स्वतंत्र समीक्षा मांगी गई है. साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानकों और बेहतर प्रक्रियाओं से तुलना करने की मांग भी की गई है.
10. रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में समिति
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की है. इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश करें और इसमें तकनीकी विशेषज्ञ तथा अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल हों. समिति इलेक्शन डेटाबेस, SIR के लागू होने और EVM से जुड़ी प्रोसेस की जांच करे.
11. विवाद सिर्फ प्रशासनिक नहीं, संवैधानिक अधिकारों का भी
याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ा विवाद केवल उसकी आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है. यह उस संवैधानिक संस्था की शक्तियों के वैध इस्तेमाल से जुड़ा मामला है, जिसे देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
12. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा
INDIA गठबंधन ने याचिका में कहा है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं. इसके लिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसका संस्थागत कामकाज बेहद जरूरी है. ऐसे में आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया और संवैधानिक शक्तियों के इस्तेमाल की कानूनी वैधता की जांच महत्वपूर्ण है.
संजय शर्मा