उत्तर प्रदेश की सियासत में सपा का सबसे मजबूत वोट बैंक मुस्लिम और यादव (एम-वाई) माने जाते हैं. एम-वाई समीकरण सपा का बैकबोन माना जाता है. यूपी विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव में सपा ने तीन यादव और एक मुस्लिम प्रत्याशी पर दांव लगाया था. शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के इस चुनाव में सपा का 'यादव कार्ड' काफी हद तक सफल रहा, लेकिन 'मुस्लिम कार्ड' पूरी तरह निष्प्रभावी साबित हुआ.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली-मुरादाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से सपा ने हाजी दानिश अख्तर को प्रत्याशी बनाया था. यह पूरा इलाका मुस्लिम बहुल माना जाता है, जो बरेली से लेकर बिजनौर तक फैला हुआ है. यहां से सपा के तमाम बड़े दिग्गज नेता आते हैं. इसके बाद भी सपा को बीजेपी से करारी मात खानी पड़ गई.
मुस्लिमों की भारी आबादी और पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों के बावजूद सपा बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट को जीत नहीं सकी. बीजेपी के प्रत्याशी डॉ. हरि सिंह ढिल्लों ने शानदार जीत दर्ज की है, जो सपा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. इसके बाद इस इलाके के सपा नेताओं की रणनीति पर भी सवाल उठने लगे हैं.
सपा के इकलौते मुस्लिम प्रत्याशी को मिली मात
उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव में सपा ने बरेली-मुरादाबाद खंड की शिक्षक सीट पर हाजी दानिश अख्तर को प्रत्याशी बनाया था, जिनका मुकाबला बीजेपी के डॉ. हरि सिंह ढिल्लों से रहा. ढिल्लों ने सपा के दानिश अख्तर को करारी मात दी.
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डॉ. हरि सिंह ढिल्लों को कुल 21,672 मत मिले, जबकि सपा के दानिश अख्तर को 3,996 वोट मिले. बीजेपी उम्मीदवार ने सपा प्रत्याशी को 17,676 वोटों के अंतर से चुनाव हराया. यह पूरा इलाका मुस्लिम बहुल माना जाता है, इसके बाद भी सपा का मुस्लिम कार्ड नहीं चला और पूरी तरह से बेदम नजर आया.
मुस्लिम बहुल इलाके में सपा नहीं जीत सकी चुनाव
बरेली-मुरादाबाद एमएलसी निर्वाचन क्षेत्र रुहेलखंड से लेकर पश्चिमी यूपी के 9 जिलों तक फैला हुआ है. बरेली मंडल के अंतर्गत बरेली, बदायूं, पीलीभीत और शाहजहांपुर जिले आते हैं. इसी तरह मुरादाबाद मंडल के मुरादाबाद, रामपुर, बिजनौर, संभल और अमरोहा जिले आते हैं. यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में गिना जाता है.
मुस्लिम बहुल इस बेल्ट में सपा का सियासी वर्चस्व माना जाता है. विधानसभा और लोकसभा चुनावों में इस क्षेत्र में सपा का दबदबा देखने को मिलता रहा है. इस इलाके की 6 लोकसभा सीटों पर सपा के सांसद हैं और विधायकों की भी बड़ी संख्या है. सपा मानकर चल रही थी कि मुस्लिम बहुल इलाका होने के कारण शिक्षक वर्ग में भी उसे बढ़त मिलेगी, लेकिन चुनाव नतीजों ने इस उम्मीद को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया.
सपा के दिग्गज मुस्लिम और यादव नेता रहे फेल
बरेली-मुरादाबाद एमएलसी क्षेत्र से सपा के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान के अलावा जियाउर्रहमान बर्क, रुचि वीरा, नीरज मौर्य, आदित्य यादव और मुहिबुल्ला नदवी सपा के लोकसभा सांसद हैं. इसके अलावा कमाल अख्तर, महबूब अली, मोहम्मद फहीम, शहजिल इस्लाम, तस्लीम अहमद और मनोज कुमार पारस जैसे सपा के विधायक हैं.
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आजम खान और सलीम शेरवानी जैसे दिग्गज नेता भी इसी इलाके से आते हैं, उसके बाद भी सपा का मुस्लिम प्रत्याशी एमएलसी चुनाव में नहीं जीत सका. सपा नेताओं की पूरी फौज मिलकर भी दानिश अख्तर को एमएलसी नहीं बना सकी, जो बड़ा झटका माना जा रहा है. 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनावों में सपा इस बेल्ट में बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रही थी, लेकिन एमएलसी चुनाव में सपा की साइकिल रफ्तार नहीं पकड़ सकी और पंचर साबित हुई.
मुस्लिम बेल्ट में क्यों फेल हुआ सपा का समीकरण?
शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनाव में हार के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण माने जा रहे हैं. एमएलसी चुनाव में मतदाता केवल जातीय या धार्मिक लामबंदी के आधार पर वोट नहीं देता. शिक्षक और स्नातक मतदाता प्रत्याशी की छवि, प्रशासनिक पहुंच, पेंशन व सेवा संबंधी मुद्दों और स्थानीय नेटवर्क को प्राथमिकता देते हैं.
बरेली-मुरादाबाद क्षेत्र में आरएसएस समर्थित शिक्षक संगठनों, एबीवीपी और बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ताओं का नेटवर्क काफी मजबूत रहा. इसके साथ ही एनडीए गठबंधन में शामिल आरएलडी के ग्राउंड नेटवर्क ने भी ग्रामीण व कस्बाई इलाकों में बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में माहौल तैयार किया.
स्नातक और शिक्षक स्तर पर सपा अपने कोर वोटर और शिक्षित मुस्लिम वर्ग को मतदान केंद्रों तक लाने और एकजुट करने में विफल रही. इसके चलते ही सपा को बरेली-मुरादाबाद क्षेत्र की सीट पर करारी मात खानी पड़ी है.
एमएलसी चुनाव नतीजों का सियासी संदेश
बरेली-मुरादाबाद सीट पर बीजेपी की जीत और सपा की हार यह साफ संदेश देती है कि विधान परिषद चुनावों में केवल 'मुस्लिम-यादव' कार्ड या जातीय ध्रुवीकरण के भरोसे जीत दर्ज नहीं की जा सकती. सपा के तीन यादव प्रत्याशियों में से दो चुनाव जीत सके. कुर्मी समुदाय से दो उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें एक को जीत मिली और एक को हार का सामना करना पड़ा.
सपा ने भले ही वाराणसी, झांसी और लखनऊ जैसी सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करते हुए कुल 5 सीटें हासिल की हों, लेकिन अपने प्रभाव वाले मुस्लिम बहुल इलाके में मिली यह हार पार्टी को अपनी चुनावी रणनीति पर नए सिरे से सोचने को मजबूर करती है. वहीं, बीजेपी ने यह साबित कर दिया है कि वह पश्चिमी यूपी और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के बुद्धिजीवी व शिक्षक वर्ग में भी अपनी पैठ बना चुकी है. इसके अलावा आरएलडी का साथ भी बीजेपी के काम आया.
कुबूल अहमद