अमेरिका के मित्र देशों की हालत ईरान के इन हथियारों से खराब... रोक भी नहीं पा रहे अटैक

ईरान अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देशों और अमेरिकी ठिकानों पर शाहेद ड्रोन तथा फतेह समेत बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला कर रहा है. सस्ते ड्रोन और मिसाइलों की बौछार से एयर डिफेंस सिस्टम को थकाया जा रहा है.

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ईरान की फतह मिसाइल किसी अनजान जगह से लॉन्च होते हुए. (Photo: X/IRGC) ईरान की फतह मिसाइल किसी अनजान जगह से लॉन्च होते हुए. (Photo: X/IRGC)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 09 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:09 AM IST

मिडिल ईस्ट में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है. खासकर 2024 से 2026 के बीच की घटनाओं में ईरान ने अमेरिका के सहयोगी देशों और वहां स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया है. संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बहरीन और जॉर्डन जैसे देशों पर ये हमले हुए हैं.

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ईरान का मकसद सिर्फ सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन बदलना और अमेरिकी प्रभाव को कमजोर करना भी रहा है. ये हमले अक्सर जवाबी कार्रवाई के रूप में सामने आए, जब अमेरिका या इजरायल ने ईरानी ठिकानों पर हमला किया.

ईरान की रणनीति एसिमेट्रिक वॉरफेयर पर आधारित है. महंगे और जटिल हथियारों के बजाय वह सस्ते और बड़ी संख्या में उपलब्ध ड्रोन तथा मिसाइलों का इस्तेमाल करता है. इससे दुश्मन के महंगे एयर डिफेंस सिस्टम जैसे पैट्रियट और थाड को थकाया जा सकता है. 

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एक सस्ता ड्रोन कई लाख या करोड़ रुपये के इंटरसेप्टर मिसाइल को खर्च करवा सकता है. यही कारण है कि खाड़ी देशों पर हमलों में ड्रोनों की संख्या मिसाइलों से कहीं ज्यादा रही है.

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शाहेद ड्रोन: सस्ते लेकिन घातक हथियार

ईरान के हमलों में सबसे ज्यादा चर्चा शाहेद-136 ड्रोन की हुई है. यह एक तरफा हमला करने वाला या सुसाइड ड्रोन है. यानी यह लक्ष्य तक पहुंचकर विस्फोट करता है. इसकी रेंज सैकड़ों किलोमीटर से लेकर दो हजार किलोमीटर से ज्यादा तक बताई जाती है. 

इसमें 40 से 50 किलोग्राम का वॉरहेड होता है. इसकी खासियत यह है कि यह सस्ता है. बड़ी संख्या में आसानी से लॉन्च किया जा सकता है. साधारण प्लेटफॉर्म से भी इसे छोड़ा जा सकता है. शाहेद-131 और शाहेद-101 जैसे अन्य वेरिएंट भी इस्तेमाल हुए हैं. ये छोटे आकार के होते हैं. कम दूरी के लक्ष्यों के लिए उपयुक्त माने जाते हैं. 

अबाबिल सीरीज के ड्रोन भी ईरान और उसके सहयोगी समूहों द्वारा इस्तेमाल किए गए हैं. ये ड्रोन मुख्य रूप से सैन्य ठिकानों, एयरपोर्ट, एनर्जी फैसिलिटी और कभी-कभी शहरी इलाकों को निशाना बनाते हैं. खाड़ी देशों में दुबई, रियाद, दोहा और कुवैत सिटी जैसे शहरों के आसपास इनके प्रभाव की खबरें आई हैं.

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इन ड्रोनों की सबसे बड़ी ताकत उनकी संख्या है. सैकड़ों ड्रोनों की एक साथ बौछार से एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव पड़ता है. कई बार कुछ ड्रोन बचाव व्यवस्था को भेदकर लक्ष्य तक पहुंच जाते हैं. ईरान ने इन ड्रोनों को अपने सहयोगी समूहों जैसे यमन के हूती विद्रोहियों और इराक के कुछ मिलिशिया को भी उपलब्ध कराया है. इससे हमलों का दायरा और बढ़ जाता है.

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बैलिस्टिक मिसाइलें: फतेह सीरीज और अन्य सिस्टम

ड्रोनों के साथ ईरान बैलिस्टिक मिसाइलों का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करता है. खाड़ी देशों के लिए खासतौर पर शॉर्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये ईरान की सीमा से आसानी से पहुंच सकती हैं. फतेह सीरीज की मिसाइलें इसमें प्रमुख हैं. फतेह-110 की रेंज 200 से 300 KM बताई जाती है. बाद के वर्जन जैसे फतेह-313 की रेंज 500 किलोमीटर तक और जोलफगार या देजफुल जैसी मिसाइलों की रेंज 700 किलोमीटर या उससे ज्यादा हो सकती है.

ये मिसाइलें सॉलिड फ्यूल वाली होती हैं. इसका फायदा यह है कि इन्हें जल्दी लॉन्च किया जा सकता है और रोड मोबाइल लॉन्चर पर ले जाया जा सकता है. लिक्विड फ्यूल वाली मिसाइलों की तुलना में तैयारी का समय कम लगता है. बाद के संस्करणों में गाइडेंस सिस्टम बेहतर बताए जाते हैं, जिससे सटीकता बढ़ती है. कुछ वेरिएंट एंटी-शिप यानी जहाजों को निशाना बनाने के लिए भी विकसित किए गए हैं.

कयाम और शहाब सीरीज की मिसाइलें पुराने स्कड डिजाइन पर आधारित लिक्विड फ्यूल वाली हैं. इनकी रेंज 300 से 800 किलोमीटर के आसपास मानी जाती है. ये भारी पेलोड ले जा सकती हैं. अधिक दूरी के लिए एमाद, गदर, शहाब-3, खैबर शेकन, फत्तह और सेज्जिल जैसी मिडियम रेंज मिसाइलें उपलब्ध हैं. 

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इनकी रेंज 1300 से 2000 किलोमीटर तक हो सकती है. ये मुख्य रूप से इजरायल जैसे दूर के लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल होती हैं, लेकिन खाड़ी अभियानों में भी इनकी भूमिका रही है. क्रूज मिसाइलें अपेक्षाकृत कम संख्या में रिपोर्ट हुई हैं.

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क्या है ईरान की रणनीति और होने वाला असर

ईरान की रणनीति में ड्रोन और मिसाइलों को मिलाकर सैल्वो यानी एक साथ कई हमले करना शामिल है. ड्रोन धीमी गति से आते हैं. एयर डिफेंस को व्यस्त रखते हैं, जबकि बैलिस्टिक मिसाइलें तेज गति से पहुंचती हैं. इससे बचाव व्यवस्था पर दोहरा दबाव बनता है. 

कई रिपोर्टों के अनुसार खाड़ी देशों पर हजारों ड्रोन और सैकड़ों मिसाइलें दागी गईं. संयुक्त अरब अमीरात सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से एक रहा. कुवैत, सऊदी अरब और कतर भी निशाने पर रहे. इन हमलों का असर सैन्य ठिकानों, तेल रिफाइनरी, एयरपोर्ट और कभी-कभी नागरिक इलाकों पर पड़ा. अमेरिकी ठिकानों पर भी हमले हुए, जिनमें कुछ सैनिकों की मौत और घायल होने की खबरें आईं. 

एनर्जी फैसिलिटी को निशाना बनाने से वैश्विक तेल बाजार पर भी दबाव पड़ा. हालांकि ज्यादातर हमलों को इंटरसेप्ट कर लिया गया, फिर भी कुछ प्रोजेक्टाइल लक्ष्य तक पहुंच गए. ईरान के प्रॉक्सी समूहों ने भी इसी तरह के हथियारों का इस्तेमाल किया. यमन से सऊदी अरब और रेड सी शिपिंग पर हमले, इराक से अमेरिकी ठिकानों पर ड्रोन अटैक इसके उदाहरण हैं. इससे संघर्ष का दायरा और व्यापक हो गया.

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ईरान हथियारों का प्रोडक्शन अलग-अलग करता है

ये हमले मिडिल ईस्ट की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देते हैं. खाड़ी देश लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा छत्रछाया पर निर्भर रहे हैं. लेकिन बड़े पैमाने के ड्रोन और मिसाइल हमलों ने दिखाया कि महंगे एयर डिफेंस सिस्टम भी थक सकते हैं. इंटरसेप्टर मिसाइलों का स्टॉक तेजी से खर्च होता है. उनकी कीमत ड्रोनों से कई गुना ज्यादा होती है.

अमेरिका और उसके सहयोगियों ने जवाबी कार्रवाई में ईरानी मिसाइल और ड्रोन उत्पादन फैसिलिटी को निशाना बनाया. इससे ईरान की क्षमता प्रभावित हुई, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई. ईरान ने उत्पादन को बिखेरकर और भूमिगत फैसिलिटी का इस्तेमाल करके अपनी क्षमता बनाए रखने की कोशिश की.

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इस पूरे घटनाक्रम से क्षेत्र में नया समीकरण बन रहा है. कुछ खाड़ी देश ईरान के साथ तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि कुछ अमेरिका और इजरायल के करीब आ रहे हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर भी खतरा बना रहता है.

ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमले मिडिल ईस्ट की सुरक्षा चुनौतियों को नई दिशा दे रहे हैं. सस्ते और बड़ी संख्या में उपलब्ध हथियारों के जरिए वह शक्तिशाली दुश्मनों को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है. शाहेद ड्रोन और फतेह सीरीज की मिसाइलें इस रणनीति का मुख्य आधार हैं. 

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ये हमले न सिर्फ सैन्य बल्कि आर्थिक और राजनीतिक असर भी छोड़ रहे हैं. भविष्य में इस तरह के संघर्ष में ड्रोन और मिसाइल डिफेंस सिस्टम की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी. क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत बनी हुई है, क्योंकि सैन्य समाधान अकेले पर्याप्त नहीं लगते.

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