ईरान जंग में अमेरिका का मिसाइल भंडार खाली, चीन से टकराव का बढ़ा खतरा

ईरान के साथ लंबे युद्ध के बीच अमेरिका के Patriot इंटरसेप्टर समेत कई अहम हथियारों का भंडार तेजी से घटा है, जिससे चीन और रूस के मोर्चे पर अमेरिकी सैन्य तैयारियों को लेकर चिंता बढ़ रही है.

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ईरान जंग में अमेरिका का हथियार भंडार तेजी से घट रहा है (Photo-Reuters) ईरान जंग में अमेरिका का हथियार भंडार तेजी से घट रहा है (Photo-Reuters)

शौनक सान्याल

  • नई दिल्ली,
  • 01 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 3:22 PM IST

ईरान के साथ 6 महीने से जारी जंग ने अब अमेरिका के हथियारों और एयर डिफेंस सिस्टम के भंडार पर बड़ा दबाव डाल दिया है. हालात ऐसे हैं कि ईरानी मिसाइलों और ड्रोन को रोकने के लिए अमेरिका को कई बार एक हमले के जवाब में दो से तीन इंटरसेप्टर तक इस्तेमाल करने पड़ रहे हैं. इससे अमेरिकी हथियारों का स्टॉक तेजी से घट रहा है. इसकी गूंज अब यूरोप से लेकर एशिया तक सुनाई देने लगी है.

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Patriot मिसाइलों का स्टॉक 65% तक घटा

अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता Patriot एयर डिफेंस सिस्टम के इंटरसेप्टर की है. रॉयटर्स और सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटनेशनल स्टडीज (CSIS) के आंकड़ों के मुताबिक, ईरान युद्ध के दौरान फरवरी से जुलाई के बीच अमेरिका के करीब 65 फीसदी Patriot इंटरसेप्टर इस्तेमाल हो चुके हैं. युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका के पास करीब 2,330 Patriot इंटरसेप्टर थे, लेकिन अब यह संख्या 850 से भी कम रह गई है.

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खास बात यह है कि इनकी सालाना उत्पादन क्षमता करीब 600 इंटरसेप्टर की है. यानी जितनी तेजी से इनका इस्तेमाल हुआ है, उतनी तेजी से इनकी भरपाई करना आसान नहीं है.

बता दें कि अमेरिकी सेना ने ईरानी मिसाइलों और ड्रोन को रोकने के लिए करीब 1,500 Patriot इंटरसेप्टर खर्च किए हैं. एक Patriot इंटरसेप्टर की कीमत करीब 4 मिलियन डॉलर तक बताई गई है, जबकि जिन ईरानी ड्रोन या मिसाइलों को इन्हें रोकना होता है, उनकी कीमत कई मामलों में इससे काफी कम होती है. यही वजह है कि लंबे समय तक चलने वाला यह संघर्ष अब अमेरिका के लिए भी महंगा साबित हो रहा है.

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Tomahawk और दूसरे हथियार पर भी दबाव

सिर्फ एयर डिफेंस मिसाइलें ही नहीं, अमेरिका के लंबी दूरी के हथियारों का भंडार भी प्रभावित हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के शुरुआती चार हफ्तों में अमेरिकी सेना ने 850 से ज्यादा टोमाहॉक क्रूज मिसाइलें दागीं. इसी अवधि में 1,000 से ज्यादा Patriot और THAAD इंटरसेप्टर भी इस्तेमाल किए गए.

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ATACMS और Precision Strike Missile जैसे दूसरे लंबी दूरी के हथियारों के स्टॉक पर भी असर पड़ा है. अमेरिकी रक्षा उद्योग उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन नए हथियार तैयार होने में समय लगता है. Patriot इंटरसेप्टर के उत्पादन को आने वाले सालों में बढ़ाने की योजना है, लेकिन मौजूदा कमी को तुरंत दूर करना आसान नहीं होगा.

यूरोप और एशिया तक पहुंचा असर

अमेरिका के हथियारों की कमी का असर अब उसके सहयोगी देशों पर भी दिखाई दे रहा है. यूरोप में NATO देशों के लिए Patriot इंटरसेप्टर की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है. रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोप में मौजूदा भंडार लंबे समय तक चलने वाले बड़े मिसाइल हमले का सामना करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा है.

वहीं यूक्रेन पर भी इसका असर पड़ा है, जहां रूस के साथ युद्ध के बीच एयर डिफेंस की जरूरत लगातार बनी हुई है. वहीं एशिया में जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे अमेरिकी सहयोगी भी अमेरिकी हथियारों की सप्लाई पर निर्भर हैं. Patriot मिसाइलों और दूसरे डिफेंस इक्विप्मेंट की डिलीवरी में देरी होने की भी आशंका जताई गई है. 

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फिलहाल अमेरिका की असली रणनीतिक चिंता अब चीन को लेकर है. ईरान युद्ध के कारण अगर अमेरिकी सैन्य संसाधन लगातार मिडिल ईस्ट में लगे रहते हैं, तो इससे Indo-Pacific रीजन में उसकी तैयारियों पर असर पड़ सकता है. इसके साथ ही ताइवान को लेकर चीन का सैन्य दबाव पहले से बढ़ा हुआ है.

ऐसे में अमेरिकी कमांडरों के सामने सवाल यह है कि अगर एक साथ किसी दूसरे मोर्चे पर बड़ा संकट पैदा होता है तो क्या अमेरिका के पास पर्याप्त हथियार और एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद होंगे. रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध के समर्थन में अमेरिका ने यूरोप और एशिया में तैनात मिलिट्री रिसोर्सेज को भी मध्य पूर्व की तरफ भेजा है. कई युद्धपोतों कि तैनाती में बदलाव किया गया है.

यही वजह है कि अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के बीच लंबे समय तक चलने वाले ईरान युद्ध को लेकर चिंता बढ़ रही है. यानी ईरान के खिलाफ शुरू हुआ अमेरिकी सैन्य अभियान अब धीरे-धीरे अमेरिका पर भी भारी पड़ रहा है. हथियारों के घटते भंडार और उनकी धीमी भरपाई ने अमेरिका के सामने एक सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर ईरान के साथ जंग लंबी चली और इसी दौरान चीन या रूस के मोर्चे पर संकट बढ़ा, तो क्या अमेरिका एक साथ सभी मोर्चों पर अपनी सैन्य ताकत बनाए रख पाएगा?

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