सऊदी अरब के पास इजरायल के बाद क्षेत्र में सबसे बड़ा और आधुनिक हथियार भंडार है. अरबों डॉलर खर्च कर खरीदे गए अमेरिकी, यूरोपीय और चीनी हथियारों से लैस सऊदी सेना दुनिया की सबसे अमीर सेनाओं में शामिल है. फिर भी 2015 से चल रहे यमन संघर्ष और 2026 के बढ़ते तनाव के बावजूद रियाद हूतियों पर पूरी तरह से मिलिट्री अटैक करने से बच रहा है.
यह संयम हथियारों की कमी का नतीजा नहीं, बल्कि गहरी रणनीतिक मजबूरी और दूरदर्शिता का परिणाम है. अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और रक्षा विश्लेषक इसे मैनेज्ड डिटरेंस यानी प्रबंधित प्रतिरोध की नीति कहते हैं.
हूती विद्रोही ईरान समर्थित समूह हैं जो यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं. उन पर सीधा हमला ईरान से तनाव को खुले संघर्ष में बदल सकता है. ईरान पहले ही जॉर्डन, कतर और सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमले कर चुका है. ऐसे में सऊदी अगर हूतियों पर बड़े पैमाने पर हमला करता है तो तेहरान इसे अपने खिलाफ सीधी कार्रवाई मान सकता है. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा क्षेत्र युद्ध की आग में झुलस सकता है.
पड़ोसी इस्लामिक देशों और क्षेत्रीय समीकरण की मजबूरी
सऊदी अरब की सबसे बड़ी मजबूरी पड़ोसी इस्लामिक देशों के साथ संबंध बनाए रखना है. खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य देश- यूएई, कुवैत, बहरीन, ओमान और कतर, अपने-अपने हितों के अनुसार व्यवहार करते हैं. यूएई पहले यमन में सक्रिय रहा लेकिन बाद में पीछे हट गया. ओमान हमेशा मध्यस्थता की भूमिका निभाता रहा है.
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अगर सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ सीधा एक्शन लेता है तो ये देश या तो समर्थन से पीछे हट सकते हैं या चुपचाप असहमति जता सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ प्रोफेसर ग्रेगरी गॉज III कहते हैं कि सऊदी अरब को पता है कि इस्लामिक देशों के बीच खुला संघर्ष पूरी मुस्लिम दुनिया को बांट सकता है. उसकी अपनी नेतृत्व क्षमता को कमजोर कर सकता है.
ईरान के साथ सीधा तनाव सऊदी के लिए और खतरनाक है. दोनों देश पहले से ही क्षेत्रीय प्रतियोगी हैं. हूतियों पर हमला ईरान को जवाबी कार्रवाई का बहाना दे सकता है. सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के डिफेंस एक्सपर्ट एंथनी कॉर्ड्समैन कहते हैं कि सऊदी की वायुसेना और मिसाइल रक्षा प्रणाली मजबूत है, लेकिन ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन क्षमता लंबे समय तक सऊदी शहरों और तेल सुविधाओं को निशाना बना सकती है. 2019 में अरामको पर हुए हमले की याद अभी ताजा है.
अमेरिका के साथ संबंध और बड़े संघर्ष का डर
सऊदी अरब अमेरिका का पुराना सहयोगी है लेकिन वॉशिंगटन की नीतियां बदलती रहती हैं. 2026 के ईरान युद्ध के संदर्भ में अमेरिका अपनी प्राथमिकताओं पर केंद्रित है. अगर सऊदी हूतियों पर बड़े हमले शुरू करता है... और संघर्ष बढ़ता है तो अमेरिका पूर्ण सैन्य समर्थन देने से बच सकता है.
पूर्व अमेरिकी रक्षा अधिकारी और विशेषज्ञ मार्क पेररी का कहना है कि सऊदी जानता है कि अमेरिका अब यमन जैसे लंबे संघर्ष में फंसना नहीं चाहता. इसलिए रियाद सीमित जवाबी कार्रवाई करता है लेकिन पूरी तरह आक्रमण से बचता है. बड़े संघर्ष का डर सबसे महत्वपूर्ण मजबूरी है. यमन का भूगोल पहाड़ी और जटिल है.
2015-2022 के बीच सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हवाई हमले किए लेकिन जमीनी नियंत्रण हासिल नहीं कर सका. हूती लड़ाके गुरिल्ला युद्ध में माहिर हैं. पूर्ण हमला हजारों सैनिकों की जान ले सकता है. अरबों डॉलर खर्च करा सकता है. सऊदी अरब की इमेज को नुकसान पहुंचा सकता है. ब्रिटिश रक्षा विशेषज्ञ सर लॉरेंस फ्रीडमैन लिखते हैं कि सऊदी अरब ने यमन से सबक लिया है. वह अब उसी दलदल में दोबारा नहीं फंसना चाहता.
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आर्थिक और रणनीतिक कारण
सऊदी अरब विजन 2030 के तहत अर्थव्यवस्था को तेल से आगे ले जाने की कोशिश कर रहा है. लंबा युद्ध पर्यटन, निवेश और तेल एक्सपोर्ट को नुकसान पहुंचाएगा. हूती हमले पहले ही लाल सागर के शिपिंग रूट को प्रभावित कर चुके हैं. बड़े पैमाने पर संघर्ष इसे और बिगाड़ सकता है.
रणनीतिक रूप से सऊदी अब कूटनीति, आर्थिक दबाव और सीमित सैन्य कार्रवाई का मिश्रण अपना रहा है. वह इजरायल के साथ सामान्य रिश्ते की तरफ भी आगे बढ़ा है, जो ईरान विरोधी मोर्चा मजबूत करता है लेकिन खुले युद्ध से बचाता है.
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप की अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ एमिली नोएल कहती हैं कि सऊदी की नीति रीस्ट्रेनिंग पावर यानी निरोधक शक्ति पर आधारित है. वह हूतियों को इतना कमजोर रखना चाहता है कि वे बड़े हमले न कर सकें, लेकिन इतना मजबूत भी नहीं छोड़ना चाहता कि वे पूरी तरह खत्म हो जाएं और ईरान सीधे मैदान में उतरे. हथियारों की कोई कमी नहीं है. समस्या इच्छाशक्ति और जोखिम लेने की क्षमता की है.
क्या इस्लामिक देशों में संघर्ष बढ़ेगा?
हूतियों पर हमला क्षेत्रीय तनाव जरूर बढ़ाएगा लेकिन जरूरी नहीं कि पूरे इस्लामिक विश्व में संघर्ष छिड़ जाए. कई सुन्नी देश चुपचाप सऊदी का समर्थन करते हैं क्योंकि वे ईरान के विस्तारवादी नीति से चिंतित हैं. हालांकि, खुला युद्ध शिया-सुन्नी विभाजन को और गहरा कर सकता है. कई एक्सपर्ट चेतावनी देते हैं कि इससे आतंकवादी समूहों को बढ़ावा मिल सकता है. पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता खतरे में पड़ सकती है.
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सऊदी अरब की मजबूरी कई लेवल की है. पड़ोसी इस्लामिक देशों के साथ संबंध, अमेरिका के अनिश्चित समर्थन, बड़े संघर्ष का खतरा, आर्थिक नुकसान का डर और रणनीतिक दूरदर्शिता- ये सभी कारण उसे संयम अपनाने पर मजबूर कर रहे हैं. हथियारों की कमी बिल्कुल नहीं है.
यह समझदारी है कि कभी-कभी न लड़ना ही सबसे बड़ी जीत होती है. रियाद की यह नीति फिलहाल क्षेत्र को बड़े युद्ध से बचा रही है, भले ही हूती हमले जारी रहें. लंबे समय में यही संयम सऊदी की क्षेत्रीय शक्ति को बनाए रखने में मददगार साबित हो सकता है.
ऋचीक मिश्रा