ईरान के दुर्गम पहाड़ों में करीब 48 घंटे तक छिपे रहने के बाद एक अमेरिकी एयरफोर्स ऑफिसर को सुरक्षित बचा लिया गया है. इस ऑपरेशन को एयरस्ट्राइक, कमांडो और जेट्स के साथ अंजाम दिया गया. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिशन की जानकारी देते हुए कहा, 'हमने उसे ढूंढ लिया!' यह ऑफिसर उस F-15E फाइटर जेट का हिस्सा था, जिसे ईरानी सेना ने मार गिराया था.
पायलट के पास एक पिस्टल, एक बीकन और एक उम्मीद के अलावा कुछ खास नहीं था, उम्मीद इस बात की थी कि उसका पीछा करने वालों से पहले ही रेस्क्यू टीम वहां पहुंच जाएगी.
यह अधिकारी एक कर्नल और वेपन सिस्टम स्पेशलिस्ट था जो F-15E Strike Eagle विमान के ईरानी बलों द्वारा मार गिराए जाने के बाद लापता हो गया था. पहले पायलट को इजेक्ट करने के तुरंत बाद बचा लिया गया था, लेकिन दूसरा क्रू मेंबर ईरान के पहाड़ी इलाके में गायब हो गया था जिसके बाद बड़े स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया.
दुश्मन की सरजमीं पर खौफनाक रातें
विमान गिरने के बाद पायलट ने पैराशूट से सुरक्षित लैंडिंग तो की, लेकिन वह सीधे दुश्मन के इलाके में जा गिरा. अमेरिकी अधिकारियों ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि पायलट लगभग दो दिनों तक दुश्मन के इलाके में छिपकर ईरानी बलों से बचता रहा, जो लगातार उसकी तलाश कर रहे थे.
पायलट के पास सिर्फ एक पिस्टल, एक डिस्टेस बीकन, GPS ट्रैकर और सिक्योर कम्युनिकेशन डिवाइस थी जिनकी मदद से वह अमेरिकी सेना के संपर्क में रहा और अपनी लोकेशन देता रहा. ईरानी सेना ने उनकी तलाश में इनाम घोषित कर दिया था और स्थानीय लोगों की मदद ले रही थी. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, कर्नल ने ऊंचाई वाले इलाकों में छिपकर और अपनी लोकेशन को गुप्त रखकर करीब दो दिनों तक गिरफ्तारी को टाला.
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रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिस इलाके में विमान गिरा था, वहां ईरान सरकार के विरोधी समूहों की मौजूदगी भी थी. ऐसे में संभावना जताई गई कि एयरमैन को स्थानीय लोगों ने भी मदद की. वहीं अमेरिकी सेना के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता उस अफसर को ढूंढना और बचाना था, इससे पहले कि ईरानी सेना वहां पहुंच जाए
हॉलीवुड जैसा क्लाइमेक्स
जब अमेरिकी सेना ने रेस्क्यू शुरू किया, तो वह किसी हॉलीवुड फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा था. ट्रंप के निर्देश पर, दुनिया के सबसे घातक हथियारों से लैस दर्जनों विमानों को तैनात किया गया था. इस मिशन में स्पेशल ऑपरेशन फोर्स, कई फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर, साइबर, स्पेस और इंटेलिजेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया गया.
दर्जनों लड़ाकू विमानों, हमलावर हेलीकॉप्टरों और विशेष कमांडो दस्ते ने अंधेरे का फायदा उठाकर ईरान में एंट्री की. इस दौरान अमेरिकी विमानों ने ईरानी काफिलों पर बमबारी की ताकि वे पायलट तक न पहुंच सकें. एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने इसे अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशन के इतिहास के सबसे कठिन मिशनों में से एक बताया.
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रेस्क्यू ऑपरेशन रात के अंधेरे में शुरू हुआ. अमेरिकी हमलावर विमानों ने उस इलाके की ओर बढ़ रहे ईरानी काफिलों पर बमबारी और फायरिंग की ताकि वे एयरमैन तक न पहुंच सकें. इसी दौरान निकासी क्षेत्र जहां पायलट मौजूद था, उसके के पास फायरफाइट भी हुई. भारी दबाव के बावजूद एयरमैन अपनी पोजीशन पर तब तक डटा रहा जब तक कि रेस्क्यू टीम वहां नहीं पहुंच गई. वह घायल हुआ लेकिन उसके ठीक होने की उम्मीद है.
ऑपरेशन के दौरान एक अमेरिकी हेलीकॉप्टर पर फायरिंग हुई, जिसमें कुछ क्रू मेंबर घायल हो गए, हालांकि हेलीकॉप्टर सुरक्षित उतर गया. एक A-10 एयरक्राफ्ट भी मिशन के दौरान हिट हुआ और उसके पायलट को पर्शियन गल्फ के ऊपर इजेक्ट करना पड़ा, जिसे बाद में बचा लिया गया.
ट्रंप का संदेश
मिशन के दौरान दो ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट ईरान के अंदर एक रिमोट बेस पर खराब हो गए, जिसके बाद तीन और विमान बुलाने पड़े. अमेरिका का दावा है कि खराब हुए विमानों को दुश्मन के हाथ लगने से बचाने के लिए वहीं नष्ट कर दिया गया. रेस्क्यू किए गए एयरमैन को इलाज के लिए कुवैत ले जाया गया. हालांकि ईरान का दावा है कि इस विमान को ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने मार गिरा दिया था.
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ट्रंप के लिए, यह ऑपरेशन सैन्य क्षमता का प्रदर्शन भी था. उन्होंने कहा, 'इन दोनों अभियानों को बिना किसी अमेरिकी सैनिक के नुकसान के सफलतापूर्वक अंजाम देना एक बार फिर साबित करता है कि हमने हवाई वर्चस्व की बेजोड़ उपलब्धि हासिल की है.' उन्होंने आगे कहा, 'हम कभी भी किसी अमेरिकी सैनिक अकेले नहीं छोड़ेंगे.'