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इस्लामी दुनिया में दो फाड़… खामेनेई के जनाजे में नहीं पहुंचे ये 3 कट्टर मुस्लिम देश

ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के जनाजे में उमड़ी अमेरिका के खिलाफ इस्लामी दुनिया की प्रतिरोध की आवाज बन गई. लेकिन कुछ ऐसे मुस्लिम देश थे जो जिन्होंने खामेनेई को अंतिम विदाई देने के लिए अपने प्रतिनिधि नहीं भेजे. ये अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की हकीकत है, जहां मजहब की बजाय संप्रभुता अधिक ताकतवर दिखती है.

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खामेनेई के जनाजे का 3 मुस्लिम देशों ने बहिष्कार किया.  (Photo: ITG)
खामेनेई के जनाजे का 3 मुस्लिम देशों ने बहिष्कार किया. (Photo: ITG)

यह एक ऐसा दृश्य था, जिसकी ओर पूरी मुस्लिम उम्मा की निगाहें टिकी थीं. ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में दुनिया भर से प्रतिनिधिमंडल पहुंचे. भारत के केंद्रीय मंत्री पहुंचे. चीन ने अपना विशेष दूत भेजा, रूस की ओर से वरिष्ठ प्रतिनिधि मौजूद रहे, तुर्की के उपराष्ट्रपति तेहरान पहुंचे, पाकिस्तान का तो पूरा कुनबा ही वहां था. मध्य एशिया के कई देशों ने भी शिरकत की. लेकिन इस भीड़ में तीन नामों की अनुपस्थिति सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी. ये तीन देश थे- संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और कुवैत. 

ये तीनों देश न केवल मुस्लिम बहुल राष्ट्र हैं, बल्कि खाड़ी क्षेत्र की राजनीति और अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ भी हैं. विशुद्ध इस्लामिक देश होने के बावजूद इन 3 देशों ने आखिर मुस्लिम दुनिया के एक बड़े चेहरे को श्रद्धांजलि देने के लिए अपना प्रतिनिधिमंडल नहीं भेजा? लेकिन क्यों? वो भी तब जब दुनिया के कई देश तेहरान में मौजूद थे, 

ये वो सवाल है जिसमें गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल  (GCC) की राजनीति, खाड़ी में मुस्लिम देशों के बीच की प्रतिद्वंद्विता और आपसी टकराव की कहानी छिपी है. 

तीन कट्टर मुस्लिम देशों ने खामेनेई को नहीं दी श्रद्धांजलि

GCC की स्थापना 25 मई 1981 को हुई थी. इसके कुल 6 सदस्य देश हैं. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत, कतर, बहरीन और ओमान. इसकी स्थापना का उद्देश्य मुस्लिम उम्मा समेत पूरी दुनिया में ईरान के बढ़ते प्रभाव को कम करना था. यहां यह भी जानना जरूरी है कि  बहरीन को छोड़कर GCC के सभी 5 देश सुन्नी बहुल हैं, जब ईरान शिया बहुल इस्लामिक राष्ट्र् है. इसलिए भी इनके बीच प्रतियोगिता चलती रहती है.

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बहरीन की कहानी थोड़ी अलग है. यह देश है तो शिया बहुल लेकिन यहां शासन सुन्नी अल खलीफा परिवार के पास है. इसलिए बहरीन का ईरान से तनाव रहता है. बहरीन की सुन्नी राजशाही लंबे समय से ईरान पर देश के शिया समुदाय को प्रभावित करने का आरोप लगाती रही है.

 वहीं UAE और ईरान के बीच अबू मूसा तथा टुंब द्वीपों को लेकर पुराना क्षेत्रीय विवाद मौजूद है. कुवैत के संबंध अपेक्षाकृत संतुलित रहे हैं, लेकिन उसने भी हमेशा ईरान के साथ एक सावधानीपूर्ण दूरी बनाए रखी है.

लंबे समय तक ईरान और GCC के बीच संबंध अविश्वास, प्रतिस्पर्धा और धार्मिक वैचारिक टकराव से प्रभावित रहे. ईरान खुद को क्षेत्रीय शक्ति मानता है, जबकि खाड़ी देशों को अक्सर लगता रहा है कि तेहरान अपनी क्रांतिकारी विचारधारा और क्षेत्रीय नेटवर्क के जरिए अरब दुनिया में प्रभाव बढ़ाना चाहता है. 

हाल के ईरान-अमेरिका इजरायल युद्ध के दौरान ईरान ने GCC के इन सभी 6 देशों पर अपने शाहेद ड्रोनों से तबाही मचा दी. तुलनात्मक रूप से ताकतवर माने जाने वाले सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पर भी ईरान ने हमले किए. ईरान के इन हमलों के दौरान खाड़ी के देश असहाय और मजबूर बने रहे. 

सबसे ज्यादा नुकसान UAE, कतर, कुवैत, बहरीन को हुआ. ईरान ने सऊदी में भी बम गिराकर उसकी औकात बता दी. ओमान को सीमित नुकसान हुआ. 

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UAE, बहरीन और कुवैत क्यों गायब रहे?

अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में UAE, बहरीन और कुवैत की अनुपस्थिति महज एक प्रोटोकॉल संबंधी फैसला नहीं थी, बल्कि यह खाड़ी क्षेत्र की जटिल कूटनीति का संकेत भी थी. ऐसा करके UAE, बहरीन, कुवैत ने ईरान के हमले के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई है. 

जंग में ईरान ने इन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और रणनीतिक परिसंपत्तियों को निशाना बनाया था. इससे इन देशों की सुरक्षा चिंताएं और बढ़ गईं. UAE की विदेश नीति अब "सुरक्षा पहले" पर आधारित है. अबू धाबी ईरान को क्षेत्रीय खतरा मानता है और अपनी सुरक्षा के लिए इजरायल, अमेरिका के साथ सैन्य-आर्थिक गठबंधन मजबूत कर रहा है. 

बहरीन लंबे समय से ईरान पर अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाता रहा है. बहरीन में अमेरिका का नौसैनिक अड्डा है, इसलिए उसका झुकाव भी अमेरिका की ओर है. 

कुवैत के संबंध अपेक्षाकृत संतुलित हैं, लेकिन वह भी ईरान के प्रति सतर्क नीति अपनाता है. इन तीनों देशों के लिए अमेरिका सुरक्षा का प्रमुख साझेदार है, इसलिए तेहरान में उच्च-स्तरीय उपस्थिति एक गलत राजनीतिक संदेश दे सकती थी. 

ईरान ने इस अनुपस्थिति को "अमेरिकी दबाव" से जोड़ा. तस्नीम न्यूज एजेंसी ने दावा किया कि अमेरिका ने कई अरब देशों पर दबाव डाला. UAE, बहरीन और कुवैत ने इसे खारिज नहीं किया, लेकिन चुप्पी साध ली. 

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अगर इन हमलों के बावजूद UAE अपना प्रतिनिधिमंडल तेहरान भेजता तो इससे संयुक्त अरब अमीरात की घरेलू राजनीति में गलत संदेश जाता. इससे ऐसा लगता कि UAE ईरान के सामने झुक गया है, इसलिए ईरानी हमले झेलने के बावजूद ईरानी नेता को श्रद्धांजलि देने को विवश है. यहां बात सुन्नी और शिया विचारधाराओं के टकराव की भी बात थी. इसे सुन्नी आबादी की बहुलता वाले UAE को शिया बहुल ईरान के सामने झुकने के तौर पर देखा जाता. 

सऊदी अरब, कतर और ओमान ने क्यों भेजे प्रतिनिधि?

सऊदी अरब, कतर और ओमान ने ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के जनाजे में आधिकारिक प्रतिनिधि भेजकर क्षेत्रीय कूटनीति का नया संकेत दिया है.  सऊदी अरब ने उपविदेश मंत्री वलीद अल खुरैजी के नेतृत्व में डेलिगेशन भेजा. सऊदी प्रतिनिधिमंडल की ओर से खामेनेई को श्रद्धांजलि की तस्वीरें पूरी दुनिया में देखी गईं. इसे दुनिया के कट्टर सुन्नी राष्ट्र द्वारा एक शिया देश को बराबरी का मान्यता देने जैसा था. वो भी तब जब ईरान ने इस जंग में सऊदी अरब पर ड्रोन बरसाए. 

लेकिन सऊदी द्वारा इस अपमान को भूलाकर तेहरान अपने प्रतिनिधि को भेजना इस बात को दर्शाता है कि रियाद ईरान के साथ तनाव कम करना चाहता है. जनाजा में भागीदारी "संवाद" की नीति को मजबूत करती है, जबकि इजरायल के साथ संबंधों को संतुलित रखती है. ईरान में अपना प्रतिनिधिमंडल भेजकर सऊदी ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय दिया है और हो सकता है कि ऐसा करते हुए सऊदी ने अमेरिका की नाराजगी भी मोल ली हो.

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कतर लंबे समय से ईरान के साथ व्यावहारिक और संतुलित संबंध बनाए हुए है, कतर का रोल इस समय एक मध्यस्थ की तरह है. हालांकि ईरान ने उस पर भी हमले किए थे. बावजूद कतर ने इसे ज्यादा तवज्जो न देते हुए अपने दूत को भेजा. 

जबकि ओमान पारंपरिक रूप से क्षेत्रीय मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है और तेहरान तथा पश्चिमी देशों के बीच संवाद का सेतु माना जाता है. 

इस घटना ने गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के बीच के दरार को भी सामने ला दिया है, जहां सऊदी अरब और UAE के बीच अघोषित प्रतियोगिता चलती रहती है. हाल ही में सऊदी ने UAE के ठिकानों पर हमले किए थे. इसलिए ईरान के मुद्दे पर दोनों देशों का अलग रुख रखना लाजिमी था. 

यह घटना दिखाती है कि गल्फ की राजनीति अब 'मजहब' से ज्यादा 'राष्ट्रीय हित' पर आधारित है. सऊदी अरब का डेलिगेशन भेजना ईरान के साथ 'संतुलन' की कोशिश है, जबकि UAE-बहरीन-कुवैत का बायकॉट ईरान-विरोधी ब्लॉक को मजबूत करता है. UAE, बहरीन और कुवैत की गैर-मौजूदगी खामेनेई के जनाजे को 'मुस्लिम एकता' का प्रतीक बनाने में असफल रही. यह GCC की कूटनीति की वास्तविकता है, जहां पुरानी दुश्मनी और नए गठबंधन (इजराइल-अमेरिका) पुरानी धार्मिक एकता को दरकिनार कर देते हैं.

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