आम आदमी खुश भी है, अब आसानी से पीएफ-एनपीएस के पैसे निकल जाते हैं. लेकिन इस सुविधा ने एक बड़ी बहस भी छेड़ दी है. दरअसल, अब तक PF और NPS को रिटायरमेंट फंड के तौर देखा जाता है, जो मिडिल क्लास के लिए एक इमरजेंसी का सहारा भी होता है. इन्हें इस तरह डिजाइन किया गया था कि आप चाहकर भी आसानी से पैसे न निकाल सकें, ताकि बुढ़ापे के लिए मोटी रकम जमा हो सके.
लेकिन नए नियमों ने इसकी परिभाषा बदल दी है, जिससे निकासी के दरवाजे आसानी से खुलते जा रहे हैं. हाल ही में भविष्य निधि संगठन (EPFO) और पेंशन नियामक (PFRDA) ने नियमों में बड़े बदलाव किए हैं. ईपीएफ से जब मर्जी UPI या एटीएम के जरिये 75 फीसदी तक रकम निकालने की सुविधा मिलने वाली है. कुछ शर्तों के साथ एनपीएस में भी प्री-एग्जिट यानी समय से पहले बाहर निकलने का विकल्प दिया जा रहा है. इसके अलावा, PF योगदान को भी कर्मचारियों की मर्जी पर छोड़ने का फैसला लिया गया है, EPFO ने अब अनिवार्य पीएफ योगदान को केवल 1800 रुपये प्रति माह पर सीमित कर दिया है यानी ये तीनों कदम बचत पर ग्रहण जैसा है.
पहली नजर में यह कदम आम आदमी को अपनी ही कमाई पर ज्यादा नियंत्रण देता है. लेकिन इसकी गहराई में जाने पर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या इससे बुढ़ापे की सुरक्षा यानी रिटायरमेंट फंड खतरे में पड़ गया है? क्या सरकार जानबूझकर आम आदमी की पारंपरिक बचत की आदत छुड़वा रही है? फिर आम आदमी के पास सेविंग का क्या विकल्प बचेगा? क्या आम आदमी के लिए शेयर बाजार में निवेश करना मजबूरी या सरकार खुद उस ओर धकेल रही है?
नए बदलाव को लेकर बहस क्यों?
हालांकि, फाइनेंशियल फ्रीडम या लिक्विडिटी की बातें सुनने में अच्छा लगता है. लेकिन जब बात भारतीय परिवारों के व्यवहार और उनकी आर्थिक स्थिति की आती है तो यह कदम सचमुच एक बड़े संकट की घंटी जैसा नजर आता है. क्योंकि EPFO जल्द ही ऐसी सुविधा देने जा रहा है, जिससे पीएफ का 75% हिस्सा बेहद आसानी से निकाला जा सकता है, एटीएम और UPI के जरिये PF अमाउंट की निकासी चंद मिनट का काम रह जाएगा.
भारत में PF को आज तक सबसे सफल रिटायरमेंट स्कीम इसलिए माना गया, क्योंकि इसके नियम सख्त थे. कर्मचारियों को पता था कि यह पैसा आसानी से नहीं निकलेगा, इसलिए वे उसे भूल जाते थे और 30 साल की नौकरी के बाद जब रिटायर होते थे, तो उनके हाथ में 20-30 लाख या 50 लाख रुपये की एकमुश्त रकम आती थी.
अब जब पीएफ को एटीएम और यूपीआई से जोड़ दिया जाएगा तो क्या होगा? इच्छाएं जरूरत बन जाएंगी, नया आईफोन लेना हो, कार की डाउनपेमेंट करनी हो, या अचानक कोई वेकेशन प्लान करना हो. लोग सोचेंगे कि पीएफ में 2 लाख रुपये पड़ा है, अभी निकाल लेता हूं, बाद में देख लेंगे. फिर पीएफ अकाउंट में 1,000 रुपये भी बचना कल्पना से परे हो जाएगा. आज के दौर फिलहाल हर तरफ लोन, ईएमआई और 'बाय नाउ पे लेटर' का जाल है. ऐसे माहौल में पीएफ जैसे सुरक्षित फंड को लिक्विड बनाना आम आदमी को बचत से दूर और खर्च के करीब ले जाएगा.
इसके अलावा, ईपीएफओ ने अब 15,000 रुपये की बेसिक सैलरी के आधार पर PF में केवल 1800 रुपये का मासिक योगदान ही कानूनी रूप से अनिवार्य रह गया है. अगर कोई कर्मचारी चाहे, तो वह अपनी ऊंची सैलरी होने के बावजूद अपना पीएफ कंट्रीब्यूशन घटाकर सिर्फ 1800 रुपये कर सकता है और बाकी पैसा 'टेक-होम सैलरी' के रूप में नकद ले सकता है. वहीं NPS अकाउंट में 2.50 लाख रुपये तक है, उसे भी एकमुश्त निकाल सकते हैं.
ह्यूमन नेचर है कि जब पैसा हाथ में रहता है यानी आसानी से उपलब्ध हो जाता है, तो खर्च भी हो जाता है. अब जब पीएफ और एनपीएस जैसे अनुशासित बचत साधनों के दरवाजे इतने ढीले कर दिए जाएंगे, तो आम भारतीय के पास 60 साल की उम्र के बाद क्या बचेगा? क्या यह कहना गलत नहीं होगा कि इससे आम आदमी की 'मजबूरी' वाली सुरक्षित सेविंग का अंत हो सकता है.
क्या सरकार चाहती है...
सरकार कभी भी किसी से नहीं कहती है कि आप शेयर बाजार में पैसे लगाएं, क्योंकि शेयर बाजार में निवेश जोखिम भरा होता है. लेकिन आर्थिक नीतियों का इशारा साफ है कि आपका पैसा आप अपनी मर्जी से जहां चाहें, वहां लगाएं. सरकारी सेविंग्स स्कीम्स में रखना है या बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट करनी है, या फिर म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार में लगाना है.
सरकार की सोच है कि पीएफ में पैसा दशकों तक बंद रहने से अर्थव्यवस्था में रोटेशन कम होता है. अगर कर्मचारियों को यह विकल्प दिया जाए कि वे पीएफ में कम पैसा कटाएं, तो उनकी 'इन-हैंड सैलरी' बढ़ेगी. जिसे वो चाहे खर्च करें या निवेश. यह पैसा जब सिस्टम में आएगा, तो इससे देश की आर्थिक तरक्की को रफ्तार मिलेगी. आज का भारत एक कंजूमर इकोनॉमी है.
म्यूचुअल फंड और इक्विटी की तरफ झुकाव
वैसे भी पिछले कुछ वर्षों में आम निवेशकों की रुचि इक्विटी मार्केट को लेकर बढ़ी है. क्योंकि पीएफ पर 8.25% ब्याज के मुकाबले म्यूचुअल फंड और इक्विटी मार्केट लंबी अवधि में 12% से 15% तक रिटर्न मिला है. सरकार पीएफ को अनिवार्य के बजाय स्वैच्छिक बनाकर युवाओं को यह मौका दे रही है कि वे खुद अपना वित्तीय फैसला लें और वेल्थ क्रिएशन के लिए इक्विटी का रुख करें.
क्या सही में 'सेविंग का गेम ओवर' होने वाला है?
अगर आम नागरिक पीएफ से निकले पैसे या बची हुई सैलरी को मोबाइल, कार या छुट्टियों में खर्च कर देगा तो निश्चित रूप से रिटायरमेंट के समय उसका 'गेम ओवर' होना तय है. लेकिन जानकार बताते हैं कि सब लोग इसकी चपेट में नहीं आएंगे. खतरा उन लोगों के लिए ज्यादा है, जो वित्तीय रूप से अनुशासित नहीं हैं. सरकार आपकी सैलरी से जबरन पैसा काटती थी और बुढ़ापे के लिए सुरक्षित करती थी. लेकिन अब सरकार आपको पैसा दे रही है, अब खुद को अनुशासित रखकर निवेश करना होगा.
वहीं शेयर बाजार के नजरिये से फिलहाल भारत की तुलना अमेरिका या फिर यूरोपियन देशों से नहीं की जा सकती. क्योंकि यहां अमेरिका या यूरोपीय देशों की तरह सरकार की तरफ से कोई यूनिवर्सल ओल्ड-एज सोशल सिक्योरिटी या मुफ्त बेहतरीन मेडिकल सुविधाएं नहीं मिलती हैं. बुढ़ापे में व्यक्ति पूरी तरह से अपनी जमा पूंजी पर निर्भर होता है. लेकिन पीएफ खत्म होने का मतलब है- बुढ़ापे में लाचारी. इसके बाद तमाम लोगों को बुढ़ापे में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा या फिर पूरी तरह दूसरों पर आश्रित होना पड़ेगा.