हूतियों से जंग लड़ रहे सऊदी अरब को कड़वे अनुभव का सामना करना पड़ रहा है. हूती विद्रोही सऊदी अरब पर तो भारी पड़ ही रहे हैं, सऊदी को मदद का दावा करने वाले उसके रक्षा साझीदार भी मुंह मोड़ ले रहे हैं. पहले तो पाकिस्तान मक्का पैक्ट के अपने वादे से पीछे हट गया और हूतियों पर हमले से मुकर गया. इसके बाद क्राउन प्रिंस सलमान ने अपने विश्वस्त डिपेंस पार्टनर अमेरिका का दरवाज खटखटाया लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किसी भी तरह की सीधी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से इनकार करके सारी उम्मीदें खत्म कर दीं.
इन घटनाओं ने एक बार फिर पाकिस्तान और अमेरिका के अप्रत्याशित रवैये को उजागर कर दिया है.
हूती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित यमनी सेनाओं के बीच टकराव बढ़ने पर सऊदी अरब ने ट्रंप से मदद मांगी. गुरुवार को विद्रोहियों ने लाल सागर के अहम बंदरगाह मोखा पर कब्ज़ा कर लिया, जिससे वे बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के और करीब पहुंच गए. इससे एक और अहम शिपिंग रूट पर खतरा पैदा हो गया है, जबकि अमेरिका-ईरान टकराव के बीच होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति भी अनिश्चित बनी हुई है.
यह टकराव 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुए युद्धविराम के बाद से सबसे गंभीर तनाव है.
ट्रंप ने हूतियों के खिलाफ मदद करने से इनकार किया
एक्सियोस की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने गुरुवार को ट्रंप को दो बार फोन करके हूतियों के खिलाफ हमले करने के लिए कहा. उन्हें अजीब व्यवहार वाले राष्ट्रपति ट्रंप से साफ "ना" सुनने को मिला. अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि ट्रंप का फिलहाल सीधे तौर पर दखल देने का कोई इरादा नहीं है.
अपनी पहली बातचीत में MBS ने ट्रंप को बिगड़ते हालात के बारे में बताया क्योंकि हूती सेनाएं तटीय शहर मोखा की ओर बढ़ रही थीं. कुछ घंटों बाद MBS ने ट्रंप को फिर से फ़ोन किया और उनसे हूतियों के ख़िलाफ़ अमेरिकी हमले का आदेश देने को कहा. ऐसा तब था जब सऊदी-समर्थित यमन की सरकारी सेना पीछे हट रही थीं.
अमेरिकी अधिकारियों ने Axios को बताया कि ट्रंप एक और मिलिट्री फ्रंट खोलने को लेकर सतर्क थे क्योंकि बातचीत के कई दौर और सीज़फ़ायर के बावजूद ईरान के साथ टकराव जारी था. हालांकि अमेरिका ने सऊदी अरब को हूतियों के बारे में इंटेलिजेंस जानकारी देने का भरोसा दिलाया है.
ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अमेरिका ईरान के प्रॉक्सी के ख़िलाफ़ बड़ी लड़ाई को अपने क्षेत्रीय सहयोगियों पर छोड़ने का इच्छुक था. अधिकारी ने Axios को बताया, "ट्रंप का निर्देश है कि अमेरिकी सेनाओं का ध्यान ईरान और होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा पर केंद्रित रहे."
लेकिन पश्चिम एशिया के इस टकराव की वजह से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ज़्यादा हो गई हैं. इसलिए यह देखना बाकी है कि अमेरिका इस टकराव से कब तक दूर रह सकता है.
ट्रंप का यह रुख़ तब सामने आया जब पाकिस्तान हूतियों के ख़िलाफ़ अपनी बहुचर्चित सैन्य धमकी से पीछे हटता हुआ दिखा है और मक्का करारनामे पर अमल करने में हिचक रहा है.
पाकिस्तान पीछे हटा, मक्का समझौता खटाई में पड़ा
इस हफ़्ते की शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि पाकिस्तान सऊदी अरब की मदद के लिए आगे आएगा. बुधवार को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ ने चेतावनी दी थी कि अगर यमन का संघर्ष सऊदी अरब तक फैला तो मक्का समझौता एक्टिवेट हो जाएगा. उन्होंने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान "इस समझौते की शर्तों और नियमों से बंधा हुआ है."
पिछले महीने 7 अगस्त को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते के तहत, किसी एक सदस्य पर होने वाले सशस्त्र हमले को तीनों पर हमला माना जाएगा.
आसिफ़ की यह चेतावनी तब आई जब हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी सऊदी अरब की ओर दर्जनों ड्रोन और मिसाइलें दागीं, जिससे 70 से ज़्यादा आम नागरिक घायल हो गए और कई तेल ठिकानों पर आग लग गई.
इसके 24 घंटे के भीतर ही पाकिस्तान का असली चेहरा सामने आ गया.
गुरुवार को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने साफ़ किया कि मक्का समझौता सिर्फ़ एक "रक्षात्मक गठबंधन" है और उन अटकलों को खारिज कर दिया कि इस्लामाबाद हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सैन्य हमले पर विचार कर रहा है.
प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने अपनी साप्ताहिक मीडिया ब्रीफ़िंग में कहा, "अभी ऐसी किसी चीज़ पर चर्चा नहीं हो रही है. जब समय आएगा, तो हम समझौते के तहत कार्रवाई करेंगे."
पाकिस्तान ने पहले ईरान को अपने हूती सहयोगियों पर लगाम लगाने की चेतावनी दी है. वह ऐसे समय में क्षेत्र में बड़े पैमाने पर तनाव बढ़ने से बचने की कोशिश कर रहा है जब वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के तौर पर अपनी स्थिति मज़बूत कर रहा है.
लेकिन इससे सऊदी अरब के लिए मुश्किल स्थिति पैदा हो गई है. बता दें कि अमेरिका लंबे समय से सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी देता रहा है.