पाकिस्तान ने बॉम्बे (अब मुंबई) के दो भारतीय पारसी डॉक्टरों को अपने मुल्क के सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'निशान-ए-इम्तियाज़' से सम्मानित करने की मंजूरी दी है. इन डॉक्टरों ने 1947 में भारत के बंटवारे से ठीक पहले के अहम दौर में पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की गंभीर बीमारी की बात गुप्त रखी थी.
जिन्ना की बिगड़ती सेहत एक ऐसी बात थी जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता था; कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अगर यह बात सबको पता होती, तो बंटवारे की दिशा और समय बदल सकता था. हो सकता है तब दक्षिण एशिया का इतिहास ही कुछ और होता.
एक्स पर एक पोस्ट में पाकिस्तान के योजना विकास और विशेष पहल मंत्री अहसान इकबाल ने घोषणा की कि डॉक्टर जल रतनजी पटेल और रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर जल धायभो-कू को इस पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया है. अहसान इकबाल इस पुरस्कार समिति के अध्यक्ष भी हैं.
उन्हें यह सम्मान उनकी "शांत लेकिन असाधारण सेवा" के लिए दिया जा रहा है, जिसके तहत उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि जिन्ना की गंभीर बीमारी की जानकारी केवल उनके करीबी लोगों तक ही सीमित रहे.
इक़बाल ने X पर लिखा, "पुरस्कार समिति के अध्यक्ष के तौर पर मुझे दो बेहतरीन डॉक्टरों एक फिजिशियन और एक रेडियोलॉजिस्ट को 'निशान-ए-इम्तियाज़' के लिए नॉमिनेट करने का सौभाग्य मिला है. ये दोनों बॉम्बे के पारसी समुदाय से हैं और इन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना की गंभीर बीमारी के राज़ को पूरी ईमानदारी से बनाए रखा."
1930 के दशक में जिन्ना को टीबी हो गई थी
मुहम्मद अली जिन्ना जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के बंटवारे और पाकिस्तान के निर्माण में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी, बंटवारे के समय बहुत खराब सेहत से जूझ रहे थे.
जिन्ना की बीमारी के बारे में सिर्फ़ उनके करीबी लोगों के एक छोटे से समूह को ही पता था, जिसमें उनकी बहन फ़ातिमा जिन्ना भी शामिल थीं. ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि डर था कि अगर लोगों को उनकी हालत के बारे में पता चला, तो उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंच सकता है. ज़िंदगी के आखिरी सालों में उनकी सेहत बहुत खराब हो गई थी. वे बहुत ज़्यादा धूम्रपान करते थे; कहा जाता है कि वे दिन में 50 सिगरेट और क्यूबन सिगार पीते थे और साथ ही काम का बोझ भी बहुत ज़्यादा रहता था.
लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लैपियर की किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' के अनुसार 1946 में बॉम्बे के डॉक्टर जल रतनजी पटेल और रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर जल धायभो-कू ने जिन्ना के एक्स-रे की जांच की और पाया कि उन्हें टीबी बहुत गंभीर स्तर तक हो चुका था. डॉक्टरों का मानना था कि उनके पास जीने के लिए शायद सिर्फ़ एक या दो साल ही बचे हैं. इन दोनों पारसी डॉक्टरों ने उनकी बीमारी की बात गुप्त रखी.
कॉलिन्स और लैपियर ने अपनी किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में लिखा है कि अगर लॉर्ड माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू या महात्मा गांधी को 1947 में जिन्ना की बीमारी के बारे में पता होता, तो शायद बंटवारा टल जाता या होता ही नहीं. कहा जाता है कि बाद में माउंटबेटन ने लेखकों से कहा था, "अगर मुझे उस समय यह सब पता होता तो इतिहास कुछ और ही होता. मैं आज़ादी देने का फ़ैसला कुछ महीने टाल देता. पाकिस्तान कभी बनता ही नहीं."
इन दो डॉक्टरों के काम के बारे में पाकिस्तानी मंत्री अहसान इक़बाल ने एक्स पर लिखा, "इतने अहम मोड़ पर पूरी तरह से पेशेवर गोपनीयता बनाए रखकर, इन डॉक्टरों ने चुपचाप लेकिन असाधारण सेवा की. अपनी पेशेवर शपथ के प्रति उनकी निष्ठा अनजाने में ही उन हालात में एक अहम योगदान बन गई, जिनकी वजह से पाकिस्तान का बनना मुमकिन हुआ."
पाकिस्तान की आज़ादी के एक साल से कुछ ज़्यादा समय बाद 11 सितंबर 1948 को टीबी की वजह से मुहम्मद अली जिन्ना की मौत हो गई. डॉ. जल रतनजी पटेल और डॉ. जल धायभो-कू को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 78 साल बाद मिल रहा है. ये सम्मान मार्च 2027 में एक समारोह में औपचारिक रूप से दिए जाएंगे.