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पाकिस्तान में ईसाई युवक का घर जलाया, गांव छोड़कर भागे 35 परिवार

पाकिस्तान के शेखूपुर में ईशनिंदा के आरोप के बाद भीड़ ने एक ईसाई शख्स का घर और मेडिकल स्टोर जला दिया, जिसके बाद जान बचाकर 35 से ज्यादा परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े.

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पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर हिंसा.(Photo-Screengrab)
पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर हिंसा.(Photo-Screengrab)

पाकिस्तान में एक ईसाई शख्स पर लगे आरोप के बाद ऐसा बवाल हुआ कि उसके घर और मेडिकल स्टोर में आग लगा दी गई. हमले का डर इतना बढ़ा कि इलाके के 35 से ज्यादा ईसाई परिवारों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा. पुलिस ने इस मामले में शख्स को गिरफ्तार कर सुरक्षित जगह पर रखा है. वहीं, घर और दुकान जलाने के आरोप में भी अलग से केस दर्ज किया गया है.

यह घटना लाहौर से करीब 50 किलोमीटर दूर शेखूपुरा जिले के घरियाल कलां गांव में हुई. 40 साल के कमरान गुल मसीह पर सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री साझा करने का आरोप लगा था. इसके बाद एक स्थानीय मस्जिद से लोगों को उनके घर के पास जुटने का ऐलान किया गया. देखते ही देखते वहां भीड़ जमा हो गई.

भीड़ ने घर और मेडिकल स्टोर में लगाई आग

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भीड़ ने पहले कमरान के घर में आग लगाई. इसके बाद उनके मेडिकल स्टोर को भी जला दिया गया. भीड़ के जुटने की खबर फैलते ही कमरान के परिवार के लोग और इलाके के दूसरे ईसाई परिवार अपनी सुरक्षा के लिए घर छोड़कर निकलने लगे. बताया जा रहा है कि गांव में 35 से ज्यादा ईसाई परिवार अपनी सुरक्षा के लिए घर छोड़ चुके हैं.

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दो अलग-अलग मामलों में केस दर्ज

कमरान के खिलाफ पाकिस्तान के कानून की धारा 295-C के तहत मामला दर्ज किया गया है. यह धारा पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी से जुड़े मामलों में लगाई जाती है.

कहा जा रहा है कि गश्त के दौरान पुलिस को सूचना मिली थी कि कमरान ने फेसबुक पर एक वीडियो साझा किया है. इसके बाद वीडियो को मोबाइल में डाउनलोड किया गया और गवाहों की मौजूदगी में उसे यूएसबी ड्राइव में कॉपी करके जब्त कर लिया गया. वीडियो के स्क्रीनशॉट भी कब्जे में लिए गए. वहीं, घर और मेडिकल स्टोर में तोड़फोड़ करने और आग लगाने के मामले में पांच नामजद लोगों समेत कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया है.


पाकिस्तान में ईसाई और हिंदू जैसे धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को कई बार भेदभाव और हमलों का सामना करना पड़ा है. वहां ईशनिंदा के आरोप बेहद संवेदनशील माने जाते हैं. कई मामलों में आरोप की जांच पूरी होने या अदालत का फैसला आने से पहले ही भीड़ हिंसा पर उतर आती है. साल 2021 में सियालकोट में एक श्रीलंकाई नागरिक की भीड़ ने हत्या कर दी थी. उस पर भी ईशनिंदा का संदेह जताया गया था. ताजा घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि आरोप लगने के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए.

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