वाशिंगटन और तेहरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बावजूद, ट्रंप प्रशासन ईरान के अंदर एक ऐसे 'चेहरे' की तलाश कर रहा है जो भविष्य में बातचीत का जरिया या नया नेतृत्व बन सके. पॉलिटिको (Politico) की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस की नजर ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गलीबाफ पर टिकी हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की टीम ईरान के खिलाफ केवल सैन्य दबाव की रणनीति से आगे बढ़ते हुए अब कूटनीतिक समाधान की दिशा में विकल्प तलाश रही है. इसी क्रम में गलीबाफ को ऐसे नेता के रूप में देखा जा रहा है जो ईरान की सत्ता व्यवस्था के भीतर भी मजबूत पकड़ रखते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बातचीत करने की स्थिति में भी हो सकते हैं.
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप प्रशासन के अधिकारी मोहम्मद बगेर गलीबाफ को एक "कामकाजी साथी" और ईरान के संभावित भविष्य के नेता के रूप में देख रहे हैं. प्रशासन के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने गलीबाफ को एक "हॉट ऑप्शन" बताया है.
अमेरिकी प्रशासन के कुछ अधिकारियों का मानना है कि गलीबाफ ईरान के भीतर विश्वसनीयता बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ बातचीत कर सकते हैं. हालांकि अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है और अमेरिका ईरान के कई नेताओं को संभावित विकल्प के रूप में परख रहा है.
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गलीबाफ ही क्यों?
विशेषज्ञों का मानना है कि गलीबाफ ईरान की राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा रहे हैं, इसलिए यह मानना आसान नहीं है कि वे अमेरिका के साथ बड़े समझौते के लिए तैयार होंगे. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका ईरान की राजनीति को अपनी शर्तों पर प्रभावित नहीं कर सकता और ईरान पर दबाव के बावजूद उसे आसानी से झुकाना संभव नहीं होगा.
गलीबाफ पूर्व सैन्य अधिकारी और तेहरान के मेयर रह चुके हैं. उन्हें ईरान के सिस्टम में एक 'प्रैक्टिकल' (व्यावहारिक) नेता माना जाता है. रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारी ईरान में वेनेजुएला जैसा मॉडल देख रहे हैं, जहाँ किसी ऐसे व्यक्ति को स्थापित किया जाए जो तेल और परमाणु मुद्दों पर अमेरिका को "पहली और बेहतरीन डील" दे सके.
ट्रंप ने हाल ही में ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर हमले 5 दिन के लिए टाले हैं. अधिकारियों का मानना है कि केवल बमबारी से हल नहीं निकलेगा, इसलिए वे अंदरूनी बदलाव की संभावना तलाश रहे हैं. अमेरिका की कोशिश है कि किसी तरह कूटनीतिक समाधान निकले, क्योंकि युद्ध के कारण वैश्विक बाजार, खासकर तेल बाजार, पर भारी असर पड़ रहा है.
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क्या चुनौतियां हैं?
हालांकि वाशिंगटन में कुछ लोग उन्हें 'हॉट ऑप्शन' मान रहे हैं, लेकिन इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप जैसे संस्थानों के विश्लेषकों का मानना है कि गलीबाफ पूरी तरह से ईरान के इस्लामी ढांचे के प्रति वफादार हैं. वे कोई बड़ी रियायत देंगे, इसकी संभावना कम है. खुद गलीबाफ ने भी सोशल मीडिया पर किसी भी 'सीधी बातचीत' को "फेक न्यूज" करार दिया है.