
आज सऊदी अरब के राजा को "कस्टोडियन ऑफ द टू होली मॉस्क्स" यानी दो पवित्र मस्जिदों का संरक्षक कहा जाता है. मक्का और मदीना की कस्टडी सऊदी राजघराने के पास है. लेकिन करीब 100 साल पहले कहानी बिल्कुल अलग थी. तब मक्का पर पैगंबर मुहम्मद के वंशज हाशमी परिवार का शासन था. मक्का के शरीफ और हिजाज के राजा हुसैन बिन अली इसी परिवार से आते थे.
फिर अरब प्रायद्वीप में सत्ता के लिए हाशमियों और सऊद परिवार के बीच जंग शुरू हुई. इस जंग का सबसे बड़ा मोड़ 1924-25 में आया, जब नज्द के शासक अब्दुलअजीज इब्न सऊद की सेनाएं हिजाज की तरफ बढ़ीं. हिजाज वही इलाका था जहां मक्का, मदीना और जेद्दा जैसे शहर थे.
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पैगंबर मुहम्मद के वंशजों के हाथ में था मक्का
उस्मानी साम्राज्य (उस्मानिया सल्तनत) के दौर में भी मक्का में शरीफ का पद हाशमी परिवार के पास था. शरीफ हुसैन बिन अली पैगंबर मुहम्मद के वंशज माने जाने वाले हाशमी परिवार से थे. उनके बेटे अब्दुल्ला बिन हुसैन का जन्म भी 1882 में मक्का में हुआ था.
दूसरी तरफ सऊद परिवार का गढ़ मध्य अरब का नज्द इलाका था. अब्दुलअजीज इब्न सऊद धीरे-धीरे इस इलाके में अपनी ताकत बढ़ा रहे थे. दोनों परिवारों के बीच सत्ता की होड़ पहले से चल रही थी.
1918-19 में दोनों के बीच खुली लड़ाई भी हुई. इब्न सऊद की सेना ने हुसैन के बेटे प्रिंस अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली हाशमी सेना को तराबाह में हरा दिया. हालांकि उस समय ब्रिटेन के हस्तक्षेप के कारण इब्न सऊद की सेना मक्का की तरफ आगे नहीं बढ़ सकी.
ब्रिटेन ने दोनों अरब नेताओं से बनाए रिश्ते
पहले विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने उस्मानी साम्राज्य के खिलाफ अरब विद्रोह में हुसैन का साथ दिया. जून 1916 में शरीफ हुसैन ने उस्मानी शासन के खिलाफ अरब विद्रोह शुरू किया. उनके बेटे फैसल और अब्दुल्ला ने अरब सेनाओं का नेतृत्व किया. ब्रिटेन ने उन्हें हथियार, पैसा और सैन्य सलाहकार दिए. लेकिन खास बात यह थी कि ब्रिटेन सिर्फ हाशमियों के साथ नहीं था. वह नज्द के शासक इब्न सऊद से भी रिश्ते मजबूत कर रहा था.

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1915 के दारिन समझौते के तहत ब्रिटेन ने नज्द और कुछ दूसरे इलाकों पर इब्न सऊद के अधिकार को मान्यता दी. इसके बदले इब्न सऊद को ब्रिटेन से 20 हजार पाउंड और 1,000 राइफलें मिलीं. इसके बाद ब्रिटेन ने नज्द को हर महीने 5,000 पाउंड देने पर भी सहमति जताई. यानी एक तरफ ब्रिटेन हुसैन को उस्मानियों के खिलाफ लड़ने के लिए पैसा और हथियार दे रहा था, वहीं दूसरी तरफ इब्न सऊद से भी अपने रिश्ते मजबूत कर रहा था.
विश्व युद्ध खत्म हुआ, लेकिन हुसैन की उम्मीद पूरी नहीं हुई
पहले विश्व युद्ध के बाद उस्मानी साम्राज्य टूट गया. हुसैन को उम्मीद थी कि अरब इलाकों में एक बड़ा स्वतंत्र अरब साम्राज्य बनेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ब्रिटेन और फ्रांस ने इलाके में अपने प्रभाव और नियंत्रण की नई व्यवस्था बनाई. ब्रिटेन ने हाशमी परिवार के सदस्यों को अलग-अलग इलाकों में सत्ता दी. हुसैन के बेटे फैसल को इराक का शासक बनाया गया, जबकि दूसरे बेटे अब्दुल्ला को ट्रांसजॉर्डन का शासक बनाया गया. यही ट्रांसजॉर्डन आगे चलकर आज का जॉर्डन बना. इस तरह मक्का के हाशमी परिवार की सत्ता धीरे-धीरे अरब प्रायद्वीप से बाहर चली गई.
1924 में इब्न सऊद मक्का की तरफ बढ़े
1924 में हालात तेजी से बदले. इब्न सऊद की सेनाएं नज्द से पश्चिम की तरफ बढ़ने लगीं. उनकी इखवान सेना ने ताइफ पर कब्जा कर लिया और फिर मक्का की तरफ बढ़ने लगी. ताइफ पर कब्जे के दौरान हिंसा और लूट की खबरों से मक्का में डर फैल गया. हिजाज के राजा हुसैन बिन अली ने एक बार फिर ब्रिटेन से मदद मांगी. लेकिन इस बार ब्रिटेन पीछे हट गया.
ब्रिटिश सरकार ने हिजाज के भविष्य और पवित्र शहरों को लेकर खुद को "पूरी तरह तटस्थ" बताया. यानी ब्रिटेन ने हुसैन के पक्ष में सैन्य मदद नहीं भेजी.

यह इस पूरी कहानी का सबसे अहम मोड़ था. ब्रिटेन ने मक्का और मदीना सीधे इब्न सऊद को नहीं सौंपे थे. इन शहरों पर कब्जा इब्न सऊद की सेनाओं ने किया. लेकिन निर्णायक वक्त पर ब्रिटेन ने अपने पुराने हाशमी सहयोगी का साथ छोड़ दिया और इब्न सऊद के आगे बढ़ने का रास्ता खुला रहा.
मक्का, मदीना और जेद्दा सऊद के कब्जे में आए
हुसैन बिन अली ने 6 अक्टूबर 1924 को गद्दी छोड़ दी. उसी साल दिसंबर में इब्न सऊद मक्का में दाखिल हुए. इसके बाद उनकी सेना ने धीरे-धीरे मदीना और जेद्दा पर भी कब्जा कर लिया.
1925 के अंत तक हिजाज पूरी तरह इब्न सऊद के नियंत्रण में था. जनवरी 1926 में मक्का के प्रमुख लोगों ने इब्न सऊद के प्रति वफादारी जताई. वह हिजाज के राजा बने. इसके करीब छह साल बाद 1932 में उनके कब्जे वाले इलाकों को मिलाकर सऊदी अरब का गठन हुआ.
मक्का और मदीना खोने के बाद भी हाशमी परिवार की कहानी खत्म नहीं हुई. हुसैन के बेटे फैसल इराक के शासक बने और अब्दुल्ला ट्रांसजॉर्डन के शासक.
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प्रिंस अब्दुल्ला 1920 में मक्का से निकले थे. बाद में वह ट्रांसजॉर्डन पहुंचे और ब्रिटिश समर्थन से वहां के शासक बने. यही परिवार आज भी जॉर्डन पर शासन कर रहा है. मौजूदा जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय, प्रिंस अब्दुल्ला बिन हुसैन के परपोते हैं. इराक में हाशमी राजशाही 1958 में खत्म हो गई, लेकिन जॉर्डन में यह राजवंश आज भी कायम है.

"दो पवित्र मस्जिदों के संरक्षक" की उपाधि बाद में आई
मक्का और मदीना पर कब्जे के बाद इब्न सऊद और उनके परिवार के पास दोनों पवित्र शहरों की सत्ता आ गई. हालांकि "कस्टोडियन ऑफ द टू होली मॉस्क्स" यानी "दो पवित्र मस्जिदों के संरक्षक" की आधिकारिक उपाधि काफी बाद में आई. सऊदी किंग फहद ने 1986 में आधिकारिक तौर पर इस उपाधि को अपनाया. आज किंग सलमान भी इसी उपाधि का इस्तेमाल करते हैं.
यानी करीब एक सदी पहले मक्का और मदीना पर पैगंबर मुहम्मद के वंशज हाशमी परिवार का शासन था. फिर इब्न सऊद की सैन्य ताकत ने हिजाज पर कब्जा किया और सऊदी अरब की नींव पड़ी. इस पूरे बदलाव में ब्रिटेन की भूमिका सीधे मक्का-मदीना सौंपने की नहीं थी, लेकिन उसने युद्ध के दौरान दोनों अरब परिवारों से रिश्ते बनाए और निर्णायक समय पर हाशमी राजा की मदद से पीछे हट गया. इसके बाद इब्न सऊद की सेनाओं ने मक्का और मदीना पर कब्जा कर लिया और आने वाले दशकों में सऊदी राजघराना इन दोनों पवित्र शहरों का संरक्षक बन गया.