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सऊदी पर कैसे भारी पड़ रहे हूतियों के सस्ते ड्रोन? करोड़ों का अमेरिकी एयर डिफेंस भी फेल

सऊदी अरब के पास अमेरिका के पैट्रियट और THAAD जैसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम हैं, लेकिन ईरान समर्थित हूती विद्रोही अब भी इनके सुरक्षा घेरे को भेदने में कामयाब हो रहे हैं. यमन से सैकड़ों किलोमीटर दूर रियाद, जेद्दा और अन्य अहम ठिकानों तक हमलों का खतरा पहुंच चुका है.

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आजतक की OSINT टीम ने हूती विद्रोहियों के अटैक के तरीके जानने की कोशिश की (Photo- ITG)
आजतक की OSINT टीम ने हूती विद्रोहियों के अटैक के तरीके जानने की कोशिश की (Photo- ITG)

कल्पना कीजिए कि कोई सशस्त्र समूह ऐसे देश पर हमला कर रहा है, जिसके पास मिडिल ईस्ट की सबसे एडवांस सेनाओं और एयर डिफेंस सिस्टम में से एक है. यमन के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण रखने वाले हूती विद्रोहियों ने कुछ ऐसा ही किया है. 

हूती विद्रोही सऊदी अरब के सुरक्षा घेरे को भेदकर रियाद के बीचोंबीच मौजूद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमला करने में कामयाब रहे. यहां तक कि जेद्दा में भी मिसाइल हमले को लेकर अलर्ट जारी करना पड़ा, जहां सऊदी अरब ने अपनी पहली THAAD यूनिट तैनात की थी.

रियाद, हूती विद्रोहियों के गढ़ सादा से करीब 910 किलोमीटर दूर है. वहीं जेद्दा की दूरी लगभग 715 किलोमीटर है. ऐसे में यह लड़ाई अब सीमा तक सीमित झड़प नहीं रह गई है, बल्कि सऊदी अरब के भीतर तक पहुंच गई है. इस हमले में कम से कम 18 लोगों की मौत हुई, 300 से ज्यादा लोग घायल हुए और एयरपोर्ट 17 अक्टूबर तक बंद रहने वाला है.

आखिर ऐसा कैसे हुआ?

आजतक की OSINT टीम ने इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की. टीम ने सऊदी अरब में उन जगहों की पहचान की, जिन्हें निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई. इसके बाद हथियारों की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए हूती विद्रोहियों के हथियारों की कड़ियों को ईरान तक जोड़कर देखा.

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सऊदी अरब ने अमेरिका से दो बेहद ताकतवर एयर डिफेंस सिस्टम लिए हुए हैं. इनके नाम पैट्रियट और THAAD हैं. इसके बावजूद हूती विद्रोही सऊदी के बीचोंबीच तक हमला करने में कामयाब रहे.

ये अटैक तब हुए हैं जब ये अमेरिकी सिस्टम हवा में ही दुश्मन की मिसाइलों को मार गिराने के लिए बनाए गए हैं. लेकिन इसके बावजूद ईरान समर्थित हूती विद्रोही सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था को भेदने में कामयाब हो रहे हैं. वे बार-बार रियाद के एयरपोर्ट को निशाना बना चुके हैं. 

10 अक्टूबर का हमला पिछले एक दशक से ज्यादा समय में सऊदी अरब पर हुए सबसे गंभीर हमलों में से एक था. पहले यह संघर्ष मुख्य रूप से यमन की सीमा के आसपास तक सीमित था, लेकिन अब इसकी पहुंच सऊदी अरब की राजधानी तक हो गई है.

दक्षिण में भूगोल से बढ़ती है खतरे की चुनौती

यमन की सीमा के पास स्थित जिजान से लेकर सऊदी अरब के भीतर रियाद तक हूती हमलों का फैलाव इस खतरे के बढ़ते दायरे को दिखाता है. सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, हूती हमलों में आबा, खमीस मुशैत, जिजान और नजरान में नागरिक ठिकानों और आर्थिक महत्व वाली जगहों को निशाना बनाया गया.

वॉशिंगटन स्थित विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) की एक पुरानी स्टडी में हूती विद्रोहियों के 4,103 हमलों का विश्लेषण किया गया था. इसमें पाया गया कि सऊदी अरब के भीतर हुए 80 प्रतिशत से ज्यादा हमले असीर, जिजान और नजरान क्षेत्रों में हुए.

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स्टडी के मुताबिक, यमन के नजदीक होने के कारण इन इलाकों में सऊदी अरब के एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया देने के लिए कम समय मिलता है. हालांकि, यह स्टडी जनवरी 2016 से अक्टूबर 2021 तक के आंकड़ों पर आधारित है और हालिया तनाव बढ़ने से पहले का है. फिर भी यह सऊदी अरब की दक्षिणी सीमा पर मौजूद लंबे समय से चली आ रही कमजोरी को दिखाता है. लेकिन खतरा अब दक्षिणी सीमा तक ही सीमित नहीं है.

24 सितंबर को सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने दावा किया कि उसने ताइफ और यानबू की ओर दागी गई छह बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में ही रोक दिया. यानबू लाल सागर के किनारे स्थित तेल निर्यात का एक अहम केंद्र है.

11 अक्टूबर तक सऊदी अधिकारियों ने देश के पूर्वी हिस्से में स्थित किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट, दम्माम को निशाना बनाकर किए गए हमले की भी जानकारी दी. रियाद, ताइफ, यानबू और दम्माम जैसे शहरों का नाम सामने आना बताता है कि हमलों का खतरा सऊदी अरब के अलग-अलग इलाकों तक फैल चुका है.

हूतियों के हथियारों का बड़ा जखीरा बढ़ा रहा चुनौती

हूती विद्रोहियों के हथियारों के जखीरे में कई तरह की मिसाइलें और ड्रोन शामिल हैं. इनमें जुल्फिकार बैलिस्टिक मिसाइल, आसिफ (खलीज-ए-फार्स) और फालिक एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें, अल-मंदब-2 क्रूज मिसाइल और समद-3 तथा शिहाब ड्रोन शामिल हैं. ये हथियार हूतियों की अलग-अलग तरह की सैन्य क्षमताओं की झलक देते हैं.

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CSIS के मुताबिक, ईरान ने हूती विद्रोहियों की हथियार संबंधी क्षमताओं को बढ़ाने में मदद की है. हालांकि, रियाद एयरपोर्ट पर हुए हमले में किस हथियार का इस्तेमाल किया गया, इसकी पहचान अभी नहीं हो पाई है.

खतरा इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इन हथियारों की उड़ान का तरीका और स्पीड एक-दूसरे से अलग होती है. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज ने चेतावनी दी है कि बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ हवा में उड़ने वाले दूसरे हथियारों का एक साथ इस्तेमाल करना, कई स्तरों वाली एयर डिफेंस व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकता है.

कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन और क्रूज मिसाइलों का पता लगाना और उन पर प्रतिक्रिया देना भी मुश्किल हो सकता है, क्योंकि डिफेंस सिस्टम को कार्रवाई करने के लिए कम समय मिलता है.

करोड़ों का इंटरसेप्टर बनाम कुछ सौ डॉलर का ड्रोन

इस लड़ाई में हथियारों की कीमत का अंतर भी अहम भूमिका निभाता है. CSIS के पुराने अनुमानों के मुताबिक, पैट्रियट सिस्टम में इस्तेमाल होने वाली एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत 10 लाख डॉलर से ज्यादा हो सकती है, जबकि हूतियों के कुछ ड्रोन की कीमत केवल कुछ सौ डॉलर होती है.

इंटरसेप्टर मिसाइल वह हथियार है, जिसका इस्तेमाल दुश्मन की मिसाइल को हवा में ही तबाह करने के लिए किया जाता है. यानी सऊदी अरब को हर हमले को रोकने के लिए बेहद महंगे हथियारों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है, जबकि हमलावर अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन से बार-बार हमले कर सकते हैं.

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सऊदी अरब भले ही आने वाली मिसाइलों और ड्रोन के ज्यादातर हमलों को रोकने में कामयाब हो जाए, लेकिन एक भी हथियार सुरक्षा घेरे को पार कर जाए तो एयरपोर्ट या तेल ठिकाने को नुकसान पहुंचा सकता है. इससे लोगों की जान जा सकती है और जरूरी सेवाएं बाधित हो सकती हैं. समस्या यह है कि सऊदी अरब की एयर डिफेंस व्यवस्था बेहद महंगी है, जबकि उसे लगातार कम कीमत वाले हथियारों से हमलों का सामना करना पड़ रहा है. आने वाली मिसाइलों को तबाह करने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंटरसेप्टर की कीमत लाखों डॉलर तक पहुंच सकती है, जबकि कुछ हमलावर ड्रोन की कीमत इसका छोटा-सा हिस्सा होती है.

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