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'ईरान में काम अधूरा मत छोड़ना, वरना...', डर के साये में जी रहे पांच खाड़ी देशों ने अब ट्रंप पर बनाया प्रेशर

ईरान ने खाड़ी देशों के एयरपोर्ट, बंदरगाहों और तेल सुविधाओं पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं. इसके बाद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को भी बंद कर दिया. ऐसे में पहले विरोध कर रहे खाड़ी देश, अब अमेरिका पर दबाव डाल रहे हैं कि वो इस जंग को बीच में न छोड़ें.

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के बाद खाड़ी देशों का रुख बदला. (Photo: Reuters)
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के बाद खाड़ी देशों का रुख बदला. (Photo: Reuters)

पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच खाड़ी देशों का रुख अब पूरी तरह बदल गया है. भले ही खाड़ी देशों ने अमेरिका से ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के लिए नहीं कहा था, लेकिन अब वो वॉशिंगटन पर दबाव डाल रहे हैं कि इस युद्ध को बीच में न छोड़ा जाए.

ईरान ने पिछले तीन हफ्तों में खाड़ी देशों के एयरपोर्ट, बंदरगाहों और तेल सुविधाओं को मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया है. वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवन रेखा कहलाने वाले स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को भी ईरान ने लगभग बंद कर दिया है.

ऐसे में खाड़ी देशों के नेताओं और राजनयिकों का मानना है कि ईरान ने 'रेड लाइन' पार कर दी है. खाड़ी देशों के मुताबिक जब तक ईरान की सैन्य क्षमता और हमला करने की शक्ति को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता, क्षेत्र की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था खतरे में रहेगी.  

'ईरान अब हमारा दुश्मन...'

सऊदी अरब स्थित 'गल्फ रिसर्च सेंटर' के अध्यक्ष अब्दुल अजीज सागर ने कहा, 'शुरुआत में हमने ईरान का बचाव किया और युद्ध का विरोध किया. लेकिन जब उन्होंने सीधे हम पर हमले शुरू किए, तो वो हमारे दुश्मन बन गए. उन्हें अलग करने का अब कोई दूसरा तरीका नहीं है.'

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'अमेरिका जंग को बीच में न छोड़े'

खाड़ी देशों को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि अगर अमेरिका और इजरायल ने ईरान की सैन्य शक्ति को पूरी तरह तबाह किए बिना हमला रोक दिया, तो ईरान भविष्य में और आक्रामक हो जाएगा. नेताओं का मानना है कि अगर ईरान के पास हमलावर हथियार बनाने की क्षमता बची रही, तो वो जब चाहे क्षेत्र की ऊर्जा आपूर्ति को 'बंधक' बना सकता है.

अब्दुल अजीज सागर ने चेतावनी देते हुए कहा, 'अगर अमेरिकी अपना काम पूरा होने से पहले पीछे हट जाते हैं, तो हमें ईरान का सामना अकेले ही करना पड़ेगा.'

ट्रंप का दबाव और खाड़ी देशों की दुविधा

एक तरफ खाड़ी देश ईरान को कमजोर देखना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उन पर इस युद्ध में सीधे शामिल होने का दबाव बना रहे हैं. ट्रंप चाहते हैं कि क्षेत्रीय समर्थन दिखाकर इस युद्ध को अंतरराष्ट्रीय वैधता और घरेलू समर्थन मिले.

यूएई जैसे देशों ने संयम बरतने की कोशिश की है. यूएई ने कहा है कि वो इस लड़ाई में नहीं खिंचना चाहता, लेकिन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा के लिए कार्रवाई करने का अधिकार रखता है.

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ईरान के हमलों ने खाड़ी देशों की व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने वाली छवि को भी चोट पहुंचाई है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर ईरान का कब्जा पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को दांव पर लगा रहा है. प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बर्नार्ड हेकल के मुताबिक, 'अगर इस खतरे का समाधान नहीं किया गया, तो ये खतरा लंबे समय तक बना रहेगा.'

क्या सऊदी अरब देगा जवाब?

सऊदी अरब फिलहाल सीधे हस्तक्षेप से बच रहा है, लेकिन अब्दुल अजीज सागर का कहना है कि अगर ईरान ने मुख्य तेल सुविधाओं या पानी को साफ करने वाले 'डीसेलिनेशन प्लांट' को निशाना बनाया, तो रियाद के पास जवाबी कार्रवाई के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा.
 

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