तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच 7 अगस्त को हुए मक्का पैक्ट को पश्चिम एशिया में एक नए सामूहिक रक्षा गठबंधन के तौर पर देखा जा रहा है. इसे कुछ लोग ‘इस्लामिक NATO’ भी कह रहे हैं. समझौते के बाद तुर्की ने मिस्र को इसमें शामिल करने की इच्छा जताई और उसे ‘स्वाभाविक साझेदार’ बताया. हालांकि, मिस्र फिलहाल इस गठबंधन से बाहर है.
मिस्र के इस फैसले में भारत के साथ उसके रिश्ते भी एक अहम फैक्टर हो सकते हैं. भारत और मिस्र के संबंध दशकों पुराने हैं. 1956 के स्वेज संकट में भारत ने मिस्र के समर्थन में ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल की सैन्य कार्रवाई का विरोध किया था. वहीं 1961 में गोवा मुक्ति अभियान के दौरान मिस्र ने पुर्तगाली मदद को स्वेज नहर से गुजरने की अनुमति नहीं दी थी.
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दोनों देश गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक देशों में रहे हैं. आज भी दोनों के बीच रणनीतिक और रक्षा संबंध मजबूत हैं. 2023 में रिश्तों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया गया. मिस्र में 700 से ज्यादा भारतीय कंपनियां रजिस्टर्ड हैं, जबकि करीब 70 कंपनियां वहां सक्रिय हैं. भारतीय कंपनियों का निवेश 5.5 अरब डॉलर से ज्यादा है. 2025-26 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 6.5 अरब डॉलर रहा.
सऊदी अरब का विरोध, मक्का पैक्ट से क्यों दूर है मिस्र?
मिस्र के मक्का पैक्ट से बाहर रहने की सबसे बड़ी वजह सऊदी अरब का विरोध भी बताई जा रही है. रिपोर्टों के मुताबिक, रियाद राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी की सरकार से नाराज है और मानता है कि मिस्र ने यमन जैसे मुद्दों पर अपेक्षित सहयोग नहीं किया. इसके अलावा मिस्र यूएई, इजरायल, ग्रीस और साइप्रस के साथ भी अपने संबंध बनाए रखना चाहता है. वहीं पाकिस्तान के भारत और इजरायल के साथ बेहद अलग रणनीतिक रुख के कारण मिस्र के लिए इस गठबंधन में शामिल होना संवेदनशील हो सकता है.
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क्या मिस्र की दूरी में भारत कोई फैक्टर है?
अंतरराष्ट्रीय मामलों की विशेषज्ञ इंद्राणी बागची के मुताबिक, भारत मिस्र के फैसले की एक वजह है, लेकिन आखिरी वजह नहीं. उनका कहना है कि गठबंधन में शामिल होने से भारत के साथ रिश्तों पर बड़ा असर शायद न पड़े, लेकिन इससे अच्छा संदेश नहीं जाता. यानी मिस्र का फिलहाल मक्का पैक्ट से बाहर रहना किसी एक देश को चुनने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने की कोशिश ज्यादा नजर आता है.