पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बांग्लादेश की जेल में बंद संत चिन्मय कृष्ण दास का मुद्दा उठाया है. शनिवार को राजारहाट गोपालपुर में गणेश पूजा के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए अधिकारी ने कहा कि पांच घंटे की पेरोल पर रिहा होने के बाद अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होते हुए चिन्मय कृष्ण की तस्वीरों ने दुनिया भर के सनातनियों को झकझोर कर रख दिया है.
उन्होंने कहा, "अगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और स्वामी प्रणवानंद के संघर्ष के कारण हमें भारत में विलय नहीं मिला होता, तो शायद आज हमारी हालत भी चिन्मय कृष्ण जैसी होती."
मुख्यमंत्री ने बारी-बारी से सत्ता में रही लेफ्ट फ्रंट और टीएमसी सरकारों पर बंगाली हिंदुओं के लिए एक अलग मातृभूमि बनाने के आंदोलन में मुखर्जी और प्रणवानंद के योगदान को जानबूझकर मिटाने का आरोप भी लगाया.
अधिकारी ने अपने परिवार के दुख का भी ज़िक्र किया और अपनी मां गायत्री देवी के अनुभव को याद किया. उनका परिवार मूल रूप से उस इलाके का था जो अब बांग्लादेश है. उन्होंने बताया कि बंटवारे के समय उन्हें अपने पिता के साथ भारत भागना पड़ा था क्योंकि वे हिंदू थे.
उन्होंने कहा, "मेरे अपने जीवन में भी दुख है. हिंदू होने के कारण, मेरी मां को भी सब कुछ पीछे छोड़कर और सिर्फ़ पहने हुए कपड़े लेकर अपने पिता के साथ भागना पड़ा था."
चिनमय कृष्ण नवंबर 2024 से बांग्लादेश में हिरासत में हैं. उन पर बांग्लादेश के खिलाफ कथित अपराधों का मामला चल रहा है. हाल ही में उन्हें अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने की इजाज़त दी गई थी. इसके लिए उन्हें 5 घंटे की परोली मिली थी. उनकी मां का पिछले हफ़्ते निधन हो गया था. जब चिन्मय दास अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने आए तो मां के शव से लिपटकर रोती हुई उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो गईं.
अधिकारी ने बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की स्थिति का मुद्दा बार-बार उठाया है. पिछले साल मैमनसिंह में दीपू दास की हत्या के बाद भी उन्होंने यह मुद्दा उठाया था. तब विपक्ष के नेता के तौर पर उन्होंने तब तक ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान किया था जब तक कि ढाका दोषियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई और हिंदुओं की सुरक्षा के उपायों के बारे में स्थिति स्पष्ट न कर दे.
उन्होंने कहा, "वामपंथियों और टीएमसी ने लोगों को बंगाली हिंदुओं के लिए एक अलग मातृभूमि हासिल करने में मुखर्जी और स्वामी प्रणवानंद के संघर्ष और योगदान को भुलाने की कोशिश की. हम उस परंपरा और विरासत को वापस लाना चाहते हैं."
बीजेपी सरकार का यह राजनीतिक संदेश राज्य के सांस्कृतिक कैलेंडर, धार्मिक रीति-रिवाजों और बंटवारे तथा बंगाल के भारत में विलय से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर चल रही व्यापक वैचारिक लड़ाई के बीच आया है.
शुभेंदु अधिकारी ने 34 साल के वाम मोर्चा शासन पर भी फिर से हमला बोला और आरोप लगाया कि कम्युनिस्ट सरकार ने बंगाल को उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से दूर करने की कोशिश की थी.
उन्होंने कहा, "34 साल तक वामपंथी शासन ने हमें हमारे पंचांग, धर्मग्रंथों, परंपराओं, पुजारियों, आरती और पुष्पांजलि को भुलाने की कोशिश की." उन्होंने आरोप लगाया कि दुर्गा पूजा और महालया को भी इसी तरह वैचारिक आलोचना के दायरे में लाया गया था.
इसके बाद उन्होंने टीएमसी पर निशाना साधा और पिछली सरकार पर आरोप लगाया कि उसने अपने शासन के आखिरी सालों में बंगाल का "जमातीकरण" करने की कोशिश की थी.