साल 2001 में अर्जुन जैन गृह मंत्री की कार से अपने जेईई केंद्र परीक्षा देने पहुंचे. यह कार उनके सहपाठी के पिता की थी और उनके साथ एक गार्ड भी था. लेकिन परीक्षा हॉल के अंदर, विशेष अधिकार रिजल्ट को नहीं बदल सकें. अखबार को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपको कौन छोड़कर जाता है. जैन ने लिंक्डइन पर एक पोस्ट में अपने अनुभव को साझा करते हुए लिखा.
पोस्ट में उन्होंने बताया कि वह परीक्षा केंद्र पर कुछ ही प्रश्नों के उत्तर दे सकें. उस समय ही उन्हें मालूम चल गया था कि उनका प्रदर्शन बेहद खराब था. दो साल तक जैन ने JEE परीक्षा की तैयारी पर पूरा ध्यान दिया. पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए उन्होंने हॉकी, क्विज और डिबेट सब छोड़ दिए था. जब JEE में उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, तो उनकी योजना थी कि वह कोटा में एक और साल तैयारी करेंगे लेकिन उनका परिवार इसका खर्च नहीं उठा सकता था. इसलिए उन्होंने कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई के लिए बेंगलुरु के RV College of Engineering में एडमिशन ले लिया और यही फैसला उनकी जिंदगी बदलने वाला साबित हुआ.
JEE परीक्षा में असफल फिर ठुकराई आईआईटी की सीट
आरवी कॉलेज में जैन ने कंप्यूटर साइंस को केवल अपनी क्लास तक सीमित नहीं रखा बल्कि बाहर जाकर भी खोजने की कोशिश की. उन्होंने आईईईई पत्रिकाओं से शोध पत्र निकाले और खुद इस क्षेत्र के बारे में पढ़ना शुरू किया. एक साल का समय बीतने के बाद मैंने अपने हॉस्टल के कमरे से ही जेईई की परीक्षा में एक और प्रयास किया.
इस बार उन्होंने 3,363वीं रैंक हासिल की और आखिरकार उन्हें आईआईटी में सीट मिल गई. लेकिन इसमें एक पेंच था, उन्हें आईआईटी-बीएचयू में पेट्रोकेमिकल इंजीनियरिंग की सीट मिली थी. लेकिन अर्जुन जैन ने इसे ठुकरा दिया.
नहीं करना चाहते थे नई शुरुआत
इसके पीछे वजह थी कि उन्होंने कंप्यूटर साइंस में एक साल का कोर्स पूरा कर लिया था और वह अब ऐसी ब्रांच में दोबारा से शुरुआत नहीं करना चाहते थे जिसमें उनकी दिलचस्पी नहीं थी. इसलिए उन्होंने RV College से ही अपनी डिग्री पूरी करने का फैसला किया.
उन्होंने बताया कि वह पहले ही कंप्यूटर साइंस की एक साल की फीस भर चुके थे. उनके लिए दोबारा शुरुआत करने का मतलब था अधिक समय और फीस खर्च करना, वह भी ऐसी पढ़ाई पर जिसमें उनकी रुचि नहीं थी. आखिरकार, इसी फैसले ने उन्हें उस IIT से दूर पहुंचा दिया, जहां वह कभी जाना चाहते थे.
कंप्यूटर साइंस से एआई रिसर्च तक
जैन का सफर यहीं पर नहीं रुका. उन्होंने सारलैंड यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में PhD की. उन्हें इस दौरान सबसे बड़ा सम्मान मिला. इसके बाद उन्होंने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के Courant Institute में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च की. NYU में उन्होंने डीप लर्निंग और इंसानों की बॉडी पोजिशन पहचानने से जुड़े काम पर रिसर्च की. उन्होंने यान लेकुन और क्रिस ब्रेगलर जैसे शोधकर्ताओं के साथ भी काम किया. उनका रिसर्च ICLR, NeurIPS और CVPR जैसे बड़े सम्मेलनों में भी पेश किया गया.
उनके रिसर्च का इस्तेमाल इंडस्ट्री में भी हुआ. इसी रिसर्च से Perceptive Code नाम की कंपनी शुरू हुई. बाद में Mercedes ने उसकी बौद्धिक संपत्ति खरीद ली.
इसके बाद जैन का सफर Apple के साथ शुरू हुआ
साल 2015 में उन्होंने Apple की Project Titan टीम में सीनियर रिसर्चर के तौर पर काम किया. वहां उन्होंने गाड़ियों के लिए कंप्यूटर विजन और सेंसर सिस्टम पर काम किया. इसमें ड्राइवर और यात्रियों की निगरानी से जुड़ी तकनीक भी शामिल थे.
14 साल बाद IIT बॉम्बे से बुलावा आया
लेकिन साल 2016 में ऐसा पल आया जिसने शायद उन्हें भी इमोशनल कर दिया. अपने पहले JEE प्रयास के करीब 14 साल बाद, जैन ने IIT बॉम्बे में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में काम शुरू किया. उन्हें इस बात की विडंबना का एहसास था. उन्होंने लिखा कि 14 साल बाद IIT बॉम्बे से फोन आया किसी पद के लिए नहीं बल्कि पढ़ाने के लिए. अब वह उन छात्रों को कंप्यूटर विजन पढ़ा रहे थे, जिन्होंने वह परीक्षा पास की थी जिसमें वह खुद कभी सफल नहीं हो पाए थे.
जैन ने कई साल तक IIT बॉम्बे में पढ़ाया और दो PhD छात्रों को गाइड किया. इनमें से एक छात्र, ऋषभ डबराल, बाद में मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर इंफॉर्मेटिक्स (Max Planck Institute for Informatics) में प्रोफेसर और ग्रुप लीडर बने, जहां जैन ने खुद ट्रेनिंग ली थी. जैन ने अपनी पोस्ट में लिखा कि यह समानता मुझे हैरान करती है. मेरा छात्र उस जगह पढ़ा रहा है जहां मैंने ट्रेनिंग ली थी और मैंने उस जगह पढ़ाया जहां मैं पढ़ नहीं सका. आज जैन Fast Code AI के संस्थापक और मुख्य वैज्ञानिक हैं. उन्होंने अकादमिक क्षेत्र और AI रिसर्च में भी काम किया है.