वाराणसी में गंगा का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है. गंगा चेतावनी बिंदु को पार करने के बाद अब खतरे के निशान की तरफ बढ़ रही है. गंगा के बढ़ते पानी का असर सिर्फ नदी किनारे बसे इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी सहायक नदी वरुणा के किनारे बसी दर्जनों बस्तियां और रिहायशी इलाके भी इसकी चपेट में आ गए हैं. वरुणा किनारे बसे हजारों परिवारों के सामने बाढ़ का संकट खड़ा हो गया है. गंगा किनारे के तटीय इलाके, पक्के घाट, गलियां और घाटों को आपस में जोड़ने वाले रास्ते भी बाढ़ के पानी में समा चुके हैं. वहीं सबसे ज्यादा आबादी गंगा की सहायक नदी वरुणा के किनारे बसी हुई है. यही वजह है कि गंगा के जलस्तर में बढ़ोतरी का असर वरुणा किनारे बसे इलाकों में भी साफ दिखाई दे रहा है.
गंगा के चेतावनी बिंदु को पार करते ही वरुणा के किनारे बसे रिहायशी इलाकों में बाढ़ का पानी घुस गया. कोनिया घाट के किनारे बसा मोहल्ला भी इसकी चपेट में है. यहां कई जगहों पर पानी घरों तक पहुंच चुका है. लोगों के सामने घर से बाहर निकलने और रोजमर्रा के जरूरी काम करने की चुनौती खड़ी हो गई है. कोनिया घाट के बाढ़ प्रभावित इलाके में हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शहर के सलारपुर से कोनिया को जोड़ने वाले वर्ष 2021 में बने पुल का अप्रोच मार्ग भी बाढ़ के पानी में डूब गया है. पुल तक पहुंचने और वहां से उतरने के लिए लोगों को नाव का सहारा लेना पड़ रहा है.
बाढ़ के बीच नाव लोगों की जिंदगी का जरूरी सहारा बन गई है. दूधिया भी नाव के सहारे बाढ़ प्रभावित घरों तक दूध पहुंचा रहा है. जिन रास्तों पर कभी लोग पैदल या दूसरे साधनों से आसानी से पहुंच जाते थे, वहां अब पानी भर चुका है और नाव के बिना लोगों तक पहुंचना मुश्किल हो गया है. बाढ़ का असर मरीजों पर भी पड़ रहा है. मुन्ना नाम के मरीज के डॉक्टर कोनिया के बाढ़ग्रस्त इलाके में ही रहते हैं. ऐसे में डॉक्टर तक पहुंचने के लिए नाव का ही सहारा है. इसके बाद भी रास्ते में कमर तक पानी से होकर गुजरना पड़ रहा है. बाढ़ ने इलाके में रहने वाले लोगों के लिए सामान्य आवाजाही को मुश्किल बना दिया है.
कहीं नाव सहारा तो कहीं कमर तक पानी
कोनिया घाट के किनारे कई ऐसे मकान भी दिखाई दिए, जो बाढ़ के पानी में डूब चुके हैं. इसके बावजूद लोग अपने घरों में रुके हुए हैं. पानी घरों तक पहुंचने के बाद भी कई परिवार अपना आशियाना छोड़ना नहीं चाहते. लोगों के सामने घर की हिफाजत की चिंता है. साथ ही उन्हें चोरी का डर भी सता रहा है. बाढ़ प्रभावित इलाके में रहने वाले लाल बाबू भी अपने घर में रुके हुए हैं. उनका कहना है कि अभी तक उनके दरवाजे पर न तो कोई सरकारी कर्मचारी पहुंचा है और न ही उन्हें सरकारी मदद मिली है. बाढ़ के पानी के बीच उनका परिवार किस तरह रह रहा है, इसका अंदाजा घर के आसपास भरे पानी से लगाया जा सकता है.
लाल बाबू की तरह इलाके के दूसरे लोगों के सामने भी यही परेशानी है. बाढ़ का पानी लगातार रिहायशी इलाके में पहुंच रहा है, लेकिन लोगों को मदद का इंतजार है. घर छोड़कर जाने का डर भी है और घर में रहने के दौरान बाढ़ के बढ़ते पानी की चिंता भी बनी हुई है. कोनिया तट के पास रहने वाली उषा ने भी बाढ़ को लेकर अपनी परेशानी बताई. उनका कहना है कि जब उन्होंने वरुणा किनारे कोनिया तट पर मकान बनवाया था, उस समय हर साल बाढ़ का पानी उनके घर तक नहीं आता था. लेकिन पिछले दो वर्षों से स्थिति बदल गई है और उनका घर बाढ़ के पानी में डूब जा रहा है.
उषा का कहना है कि वह बाढ़ राहत शिविर में रहने के लिए भी तैयार हैं. यानी वह अपना घर छोड़कर सुरक्षित जगह पर जाने को तैयार हैं, लेकिन उनकी परेशानी यह है कि अब तक उन तक कोई मदद पहुंची ही नहीं है. बाढ़ के बीच उनका परिवार सरकारी मदद का इंतजार कर रहा है. गंगा के बढ़ते जलस्तर के साथ वाराणसी के तटीय इलाकों में पानी का दायरा बढ़ता जा रहा है. गंगा का चेतावनी बिंदु पार करने के बाद वरुणा में पानी का पलट प्रवाह होने से नदी किनारे की बस्तियों पर असर पड़ रहा है. कोनिया घाट का इलाका इसका सीधा उदाहरण है, जहां घरों से लेकर रास्तों तक पानी पहुंच चुका है.
एक तरफ गंगा खतरे के निशान की ओर बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ वरुणा किनारे रहने वाले हजारों परिवार बाढ़ के पानी के बीच अपनी जिंदगी संभालने की कोशिश कर रहे हैं. कहीं पुल का अप्रोच मार्ग डूबा है, कहीं कमर तक पानी है और कहीं लोगों के घर पानी में घिरे हुए हैं. ऐसे में नाव ही कई लोगों के लिए आने-जाने और जरूरी सामान पहुंचाने का एकमात्र सहारा बन गई है.
कोनिया में बाढ़ ने लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी रोकी
कोनिया घाट के बाढ़ प्रभावित इलाके की तस्वीर बताती है कि गंगा का बढ़ता जलस्तर किस तरह उसके किनारे से निकलकर वरुणा के आसपास बसे रिहायशी इलाकों तक पहुंच रहा है. बाढ़ के पानी के बीच भी लोग अपने घरों की हिफाजत के लिए रुके हुए हैं. उन्हें पानी बढ़ने के साथ-साथ घर में सामान और चोरी की चिंता भी सता रही है. फिलहाल कोनिया घाट और वरुणा किनारे की बस्तियों में रहने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाढ़ के बीच सुरक्षित रहना और जरूरी जरूरतों को पूरा करना है. कुछ लोगों को नाव का सहारा मिल रहा है, तो कुछ कमर तक पानी में चलकर रास्ता तय करने को मजबूर हैं. वहीं कई परिवार सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं.