रामलीला में राम के सिर पर मुकुट तो आपने खूब देखे होंगे. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कोई मुकुट 100 साल से भी ज्यादा पुराना हो और आज भी उसी परंपरा के साथ इस्तेमाल किया जा रहा हो? प्रयागराज की ऐतिहासिक पजावा रामलीला में ऐसा ही होता है. यहां राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता के लिए रखे गए मुकुटों को रामलीला शुरू होने से पहले साफ किया गया, चमकाया गया और फिर मंदिर में उनकी पूजा हुई. खास बात ये है कि इन मुकुटों को लाहौर के कारीगरों ने तैयार किया था.
एक मुकुट सामने रखा है. उस पर चमकते आभूषण लगे हैं. पास में कुछ और पुराने गहने रखे हैं. पहले इन्हें साफ किया जाता है. फिर चमकाया जाता है. इसके बाद मंदिर में ले जाकर पूजा होती है. किसी रामलीला के मुकुट की इतनी तैयारी क्यों? कहानी यहीं से शुरू होती है. ये कोई नए मुकुट नहीं हैं. ये 100 साल से भी ज्यादा पुराने हैं. और इन्हें लाहौर के कारीगरों ने तैयार किया था.
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अब जरा उस वक्त की कल्पना कीजिए. वो दौर, जब भारत और लाहौर के बीच आज जैसी सीमा नहीं थी. इसी दौर में इन मुकुटों को बनवाया गया था. लाला मनोहर दास 'बच्चा जी' के परिवार की ओर से मुकुट बनवाए गए थे. इन्हें लाहौर के कुशल कारीगरों ने तैयार किया.
फिर ये मुकुट प्रयागराज की पजावा रामलीला का हिस्सा बन गए. समय गुजरता गया. साल बदलते गए. देश का बंटवारा हुआ. लाहौर भारत से अलग हो गया. लेकिन इन मुकुटों की कहानी नहीं बदली. आज भी जब पजावा रामलीला में राम और लक्ष्मण मंच पर आते हैं, तो उनके सिर पर यही पुरानी विरासत नजर आती है.
यही पजावा रामलीला की खासियत है. यहां सिर्फ रामायण की कहानी मंच पर नहीं दिखाई जाती. उससे जुड़ी कई पुरानी परंपराएं भी उसी तरीके से निभाई जाती हैं. वेशभूषा हो. आभूषण हों. या फिर ये पुराने मुकुट. सबको संभालकर रखा जाता है. रामलीला शुरू होने से पहले मुकुटों की सफाई होती है. पुराने आभूषणों को भी साफ किया जाता है. फिर उन्हें पूजा के लिए मंदिर ले जाया जाता है. इस बार भी ऐसा ही हुआ.

प्रयागराज के पुराने शहर के शाहगंज इलाके में स्थित प्राचीन राम जानकी मंदिर में मुकुट पूजन किया गया. मुकुटों को एक साथ रखा गया. पूजा-पाठ हुआ. रामलीला कमेटी के पदाधिकारी और सदस्य मौजूद रहे. और इसके साथ ही संकेत मिल गया कि अब रामलीला का इंतजार ज्यादा लंबा नहीं है. लेकिन इन मुकुटों की खासियत सिर्फ उनकी उम्र नहीं है. इन्हें सोने और चांदी के मिश्रण से तैयार किया गया था. इस वजह से इनकी कीमत भी काफी अधिक मानी जाती है.
हालांकि कमेटी के लिए इनकी कीमत सिर्फ रुपये-पैसे में नहीं है. क्योंकि किसी भी पुराने सामान की असली कीमत कभी-कभी उसके इतिहास में होती है. और इन मुकुटों के साथ तो पूरा इतिहास जुड़ा है. लाहौर के कारीगर. पुराना प्रयागराज. पीढ़ियों से चली आ रही रामलीला. और एक ऐसी परंपरा, जिसे आज भी उसी श्रद्धा से निभाया जा रहा है. पजावा रामलीला को प्रयागराज की प्राचीन रामलीलाओं में गिना जाता है.
नवरात्र और दशहरा के दौरान यहां रामलीला देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं. इस बार भी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर से होने जा रही है. इसके साथ ही शहर में दशहरे और रामलीला की रौनक बढ़ने लगेगी. लेकिन पजावा रामलीला में मंच सजने से पहले एक और काम पूरा हो चुका है. रामलीला के उन पुराने मुकुटों की पूजा. पजावा रामलीला कमेटी के वित्त सचिव सचिन कुमार गुप्ता के मुताबिक, मुकुटों की साफ-सफाई और उन्हें चमकाने का काम पूरा हो गया है. इसके बाद विधि-विधान से उनका पूजन कराया गया.

अब अगली बारी रामलीला की है. मंच सजेगा. कलाकार आएंगे. राम और लक्ष्मण की भूमिका निभाने वाले कलाकार तैयार होंगे. और जब उनके सिर पर ये मुकुट सजेंगे, तो शायद मंच के सामने बैठे ज्यादातर लोगों को ये एहसास भी न हो कि वे सिर्फ एक मुकुट नहीं देख रहे. वे 100 साल से ज्यादा पुरानी एक कहानी देख रहे हैं. एक ऐसी चीज, जिसे लाहौर के कारीगरों ने बनाया था. जिसे पीढ़ियों ने संभाला. जिसने देश का बंटवारा देखा. समय बदलते देखा. और फिर भी अपनी जगह नहीं बदली.
यही वजह है कि पजावा रामलीला के लिए ये मुकुट सिर्फ राम और लक्ष्मण के सिर की शोभा नहीं हैं. ये उस परंपरा की पहचान हैं, जो समय के साथ पुरानी जरूर हुई, लेकिन खत्म नहीं हुई. शायद इसीलिए रामलीला शुरू होने से पहले इन मुकुटों की पूजा होती है. ताकि जब राम मंच पर आएं, तो उनके सिर पर सिर्फ मुकुट न हो. साथ में एक सदी से ज्यादा पुरानी विरासत भी हो.