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छोटे से गांव की माधवी ने कैसे बदली अपनी किस्मत, अब करोड़पति दीदी बनने का लक्ष्य

जैविक मिर्च के अचार के कारोबार के जरिए माधवी ने न सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की, बल्कि दूसरी महिलाओं को भी रोजगार की राह दिखाई. अब माधवी और उनके समूह की महिलाओं का लक्ष्य करोड़पति दीदी बनना है.

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 जैविक अचार के कारोबार से बदली जिंदगी (Photo-ITG)
जैविक अचार के कारोबार से बदली जिंदगी (Photo-ITG)

मेहनत, लगन और आत्मनिर्भर बनने का जज्बा हो, तो छोटी-सी शुरुआत भी बड़ी सफलता की राह खोल सकती है. उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले की सासनी तहसील के रुदायन गांव की रहने वाली माधवी चौधरी इसकी मिसाल हैं. पार्वती स्वयं सहायता समूह से जुड़कर उन्होंने अपने हुनर को रोजगार में बदला और जैविक मिर्च के अचार के कारोबार से अपनी पहचान बनाई.
 
सिलाई और ब्यूटीशियन के काम से शुरुआत करने वाली माधवी आज दूसरी महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं. अब उनका लक्ष्य लखपति दीदी से आगे बढ़कर करोड़पति दीदी बनना है.

स्वयं सहायता समूह से मिली नई पहचान

स्वयं सहायता समूह से शुरू हुआ आत्मनिर्भरता का सफर

माधवी चौधरी के आत्मनिर्भर बनने की कहानी  2016 में पार्वती स्वयं सहायता समूह के गठन के साथ शुरू हुई, एक एनजीओ के माध्यम से गठित इस समूह से जुड़ी महिलाओं ने हर महीने 100 रुपये की बचत करना शुरू किया. कुछ समय बाद समूह को 15 हजार रुपये का रिवॉल्विंग फंड (आरएफ) मिला. समूह की सहमति से इस राशि का इस्तेमाल माधवी ने अपने सिलाई और ब्यूटीशियन के हुनर को रोजगार में बदलने के लिए किया.

इस तरह उन्होंने कम पूंजी के साथ अपना काम शुरू किया और धीरे-धीरे आमदनी बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाए.

स्वयं सहायता समूह से मिली नई पहचान

जैविक मिर्च के अचार के कारोबार से बढ़ी आमदनी

करीब दो साल बाद स्वयं सहायता समूह को 1.10 लाख रुपये की सहायता राशि मिली, इसके बाद समूह की महिलाओं ने मिलकर जैविक मिर्च का अचार बनाने का कारोबार शुरू किया. इस पहल ने महिलाओं के लिए रोजगार का एक नया अवसर तैयार किया.

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समूह की कुछ महिलाओं ने भैंस खरीदकर दूध और डेयरी व्यवसाय भी शुरू किया. सिलाई, ब्यूटीशियन के काम, अचार निर्माण और डेयरी जैसी गतिविधियों के जरिए महिलाओं ने अपनी आमदनी बढ़ाने का प्रयास किया, इससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में भी मदद मिली.

सिलाई और अचार के कारोबार से बनीं लखपति दीदी

बच्चों की पढ़ाई पर दिया विशेष ध्यान

माधवी चौधरी ने अपने काम से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल परिवार की जरूरतों और बच्चों की शिक्षा के लिए भी किया. उनके तीनों बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं, उनका बड़ा बेटा इंटरमीडिएट में है, जबकि दूसरा बेटा केंद्रीय विद्यालय में और सबसे छोटा बेटा केएल जैन स्कूल में कक्षा नौ में पढ़ रहा है.

माधवी की कहानी बताती है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता महिलाओं को अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए प्रयास करने का अवसर भी देती है. 

लखपति दीदी के रूप में मिली पहचान

अचार के कारोबार में सफलता और अपने कार्यों के लिए माधवी चौधरी को लखपति दीदी के रूप में सम्मानित किया गया. उन्हें कई प्रशस्ति पत्र भी मिले. वर्ष 2022 में उन्हें भारतीय किसान संघ में जिला महिला प्रमुख का दायित्व सौंपा गया, संगठन के विभिन्न मंचों पर भी उनके कार्यों को सम्मान मिला.

उनकी उपलब्धियां इस बात का उदाहरण हैं कि स्वयं सहायता समूह महिलाओं को न केवल रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में मदद करते हैं, बल्कि उन्हें सामाजिक स्तर पर अपनी पहचान बनाने का अवसर भी देते हैं.

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माधवी चौधरी ने दूसरी महिलाओं को भी दिखाई राह

अब करोड़पति दीदी बनने का लक्ष्य

लखपति दीदी के रूप में पहचान बनाने के बाद अब माधवी चौधरी और स्वयं सहायता समूह की अन्य महिलाओं ने करोड़पति दीदी बनने का लक्ष्य तय किया है, इसके लिए वे अपने काम को आगे बढ़ाने और आमदनी के अवसर बढ़ाने की दिशा में प्रयास कर रही हैं.

माधवी चौधरी का सफर बताता है कि छोटी-छोटी बचत, सामूहिक सहयोग और अपने हुनर के सही इस्तेमाल से महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत बनने की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं. उनकी कहानी उन महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपना रोजगार शुरू करना और परिवार के साथ समाज की प्रगति में योगदान देना चाहती हैं. 
 

 

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