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समिट बिल्डिंग, 11वीं मंजिल और हाईटेक 'शिकारी': डेढ़ लाख के जूते, 75 हजार का ट्राउजर पहनकर करते थे इंटरनेशनल ठगी, पढ़ें पूरी कहानी

लखनऊ की समिट बिल्डिंग में अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने वाले इंटरनेशनल साइबर फ्रॉड कॉल सेंटर का पर्दाफाश हुआ है।. पुलिस ने 119 पढ़े-लिखे ठगों को गिरफ्तार किया है, जिन्होंने 7 महीने में 250 करोड़ की ठगी की. यह गैंग 'अमेरिकन एक्सेंट' और थ्री-लेयर टीम के जरिए गिफ्ट कार्ड व क्रिप्टोकरेंसी से ठगी करता था. इनके पास से महंगे कपड़े-जूते और डिजिटल उपकरण मिले हैं.

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लखनऊ में इंटरनेशनल ठगी की पूरी कहानी चौंकाने वाली है (Photo- ITG)
लखनऊ में इंटरनेशनल ठगी की पूरी कहानी चौंकाने वाली है (Photo- ITG)

लखनऊ पुलिस ने शहर के सबसे पॉश इलाके विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग में चल रहे एक बड़े इंटरनेशनल साइबर फ्रॉड कॉल सेंटर का पर्दाफाश किया है. पुलिस की संयुक्त टीम ने सुनियोजित तरीके से जाल बिछाकर मौके से 119 साइबर ठगों को दबोचा है. मात्र 7 महीने में 250 करोड़ की ठगी की है. यह हाईटेक गैंग लखनऊ में बैठकर USA के नागरिकों की जेब साफ कर रहा था. पुलिस ने इनके पास से 103 महंगे लैपटॉप, 177 कॉलिंग मोबाइल फोन समेत भारी मात्रा में डिजिटल उपकरण और महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक सबूत बरामद किए हैं. इस गिरोह की सबसे खास बात ये है कि इनमें से अधिकतर आरोपियों के शौक महंगे जूते और ट्राउजर जिनके जूतों की क़ीमत 1.5 लाख और ट्राउजर की कीमत 75000 रुपये की है. आरोपी महिलाओं के तो सैंडल और चप्पल 1 लाख की आंकी गई है.

पुलिस आयुक्त अमरेंद्र कुमार सेंगर के मुताबिक, यह शातिर गिरोह अमेरिकी नागरिकों को नामी कंपनियों और सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बनकर डराता था और फिर उन्हें अपनी ठगी का शिकार बनाता था. इस पूरे फर्जीवाड़े के लिए इंटरनेट आधारित कॉलिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाता था. ठगी की रकम को कैश कराने के लिए यह गैंग गिफ्ट कार्ड और क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल करता था, ताकि कोई इन्हें आसानी से ट्रैक न कर सके. इस बड़े रैकेट का खुलासा पुलिस आयुक्त अमरेंद्र कुमार सेंगर के निर्देशन और संयुक्त पुलिस आयुक्त अपर्णा कुमार के पर्यवेक्षण में हुआ. 

डिप्टी कमिश्नर अनिल कुमार यादव और एडिशनल डिप्टी कमिश्नर किरन यादव के नेतृत्व में साइबर सेल और साइबर थाने की टीम ने 1 जुलाई 2026 को समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर धावा बोलकर गिरोह के मास्टरमाइंड और ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार को भी दबोच लिया. इस इंटरनेशनल फ्रॉड नेटवर्क का सबसे चौंकाने वाला पहलू इसमें शामिल आरोपियों की पढ़ाई-लिखाई है. गैंग में देश के कोने-कोने जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, झारखंड, नागालैंड और मणिपुर से आए पढ़े-लिखे युवाओं को भर्ती किया गया था, जो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलकर विदेशियों को अपने जाल में फंसाते थे. 

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गिरफ्तार किए गए मुख्य आरोपियों की क्वालिफिकेशन की लिस्ट देखकर पुलिस भी हैरान रह गई है. ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी जहां अहमदाबाद से बीकॉम पास है, वहीं रांची का रहने वाला नवीन कुमार एलएलबी की डिग्री रखता है. इसके अलावा राजस्थान का हर्ष शर्मा बीएससी ग्रेजुएट है, देहरादून का सिद्धार्थ ठाकुर बीबीए पास है, नागालैंड के यानशुमथुंग यानथन ने प्लास्टिक इंजीनियरिंग की है, मणिपुर के तिदाइलुंग ने बीएससी बॉटनी से किया है और गोरखपुर का मुकेश शुक्ला बीटेक पास इंजीनियर है. 

इसके अलावा गिरोह में शामिल अन्य आरोपियों में कई 10वीं और 12वीं पास युवा भी हैं, जिन्हें अच्छी अंग्रेजी बोलने और कंप्यूटर चलाने के कारण कॉलिंग के काम पर लगाया गया था. पुलिस अब इस गिरोह के फाइनेंशियल ट्रांजैक्शंस और बैंक खातों को खंगाल रही है और नेटवर्क से जुड़े अन्य फरार आरोपियों की तलाश में छापेमारी कर रही है.

पुलिस आयुक्त अमरेंद्र कुमार सेंगर के अनुसार, इस अंतरराष्ट्रीय फर्जीवाड़े को अंजाम देने के लिए बकायदा तीन अलग-अलग लेयर्स में टीमों को बांटा गया था, जो बेहद शातिर तरीके से अमेरिकी नागरिकों को अपने जाल में फंसाती थीं. सबसे पहले 'डायलर टीम' अमेरिकी नागरिकों से बात करती थी और उन्हें फ्रॉड मैसेजेस भेजकर अपने जाल में फंसाती थी. डायलर टीम से बात होने के बाद इस कॉल को बैंकर टीम को फॉरवर्ड कर दिया जाता था. यह बैंकर टीम अमेरिकी नागरिकों को डराती थी कि उनका सोशल सिक्योरिटी नंबर फ्रीज होने वाला है. इसके बाद डर चुके पीड़ित की कॉल को क्लोजर टीम को रेफर किया जाता था. यह टीम पीड़ित को झांसा देती थी कि वे इस बड़ी मुसीबत से कैसे बच सकते हैं. क्लोजर टीम उनसे कहती थी कि आपका अकाउंट सील होने वाला है, इसलिए उसमें जितना भी पैसा है उसे तुरंत निकाल लीजिए. 

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इसके बाद पीड़ितों से गिफ्ट वाउचर खरीदवाए जाते थे, जिन्हें बाद में यह शातिर गैंग भुना लेता था. ठगी की इस रकम को ठिकाने लगाने के लिए सिर्फ गिफ्ट वाउचर ही नहीं, बल्कि क्रिप्टोकरेंसी का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता था. इसके अलावा, यूपीएस (भारत में जैसे यूपीई काम करता है वैसे ही )माध्यम से डिजिटल पैसे को प्राप्त करके यह टीम उसे रिडीम करती थी और अंत में यह पूरा पैसा हवाला के जरिए भारत आता था. इस पूरे सिंडिकेट को सुचारू रूप से चलाने के लिए बकायदा ट्रांसपोर्टेशन भी दी गई थी. 

लखनऊ के पुलिस कमिश्नर ने बताया कि इस कॉल सेंटर से जो भी आरोपी गिरफ्तार हुए हैं, उन सबको अच्छी तरह पता था कि वे क्या काम कर रहे हैं. इन सभी को बकायदा ट्रेनिंग दी गई थी. इस गैंग की सबसे बड़ी यूएसपी यह थी कि ये सभी आरोपी पीड़ितों से बिल्कुल अमेरिकन एक्सेंट में बात करते थे, जिससे सामने वाले को जरा भी शक नहीं होता था. इस ट्रेनिंग का असर ऐसा था कि ये ठग हर 10 में से 4 कॉल पर लोगों को मूर्ख बनाकर फ्रॉड कर लेते थे.

पुलिस जांच में सामने आया है कि समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर यह काला धंधा पिछले 7 महीने से लगातार चल रहा था. चूंकि यह मामला सीधे तौर पर अमेरिकी नागरिकों और अंतरराष्ट्रीय साइबर क्राइम से जुड़ा है, इसलिए अब शासन स्तर से इसकी पूरी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को भेजी जाएगी. इसके बाद इस रिपोर्ट को विदेश मंत्रालय को फॉरवर्ड किया जाएगा, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

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