यमन के हूती लड़ाकों की तस्वीरें और वीडियो जब भी सामने आते हैं, उनमें एक चीज अक्सर लोगों का ध्यान खींचती है. लड़ाकों के गाल एक तरफ से कुछ ज्यादा फूले हुए नजर आते हैं और ऐसा लगता है जैसे उन्होंने मुंह में कुछ भर रखा हो. कई तस्वीरों में उनके मुंह में हरी पत्तियां भी दिखाई देती हैं.
आखिर ये हरी पत्तियां क्या हैं? हूती लड़ाके इन्हें मुंह में दबाकर क्यों रखते हैं? क्या ये कोई नशे की चीज है और इसे चबाने से शरीर पर क्या असर होता है?
दरअसल, इन पत्तियों को खात या क़ात की पत्ती कहा जाता है. यह एक झाड़ीदार पौधा है, जिसकी कोमल पत्तियों और टहनियों को तोड़कर चबाया जाता है. टाइम की रिपोर्ट के मुताबिक, यमन में इसका इस्तेमाल इतना आम है कि यह वहां की रोजमर्रा की जिंदगी और सामाजिक मेल-जोल का हिस्सा बन चुका है.खात की पत्तियों में साइकोएक्टिव कंपाउंड पाया जाता है, जिसका असर एम्फेटामिन जैसे उत्तेजक पदार्थों से मिलता-जुलता है.
गाल में पत्तियों का गोला क्यों बना लेते हैं?
खात को खाने या सामान्य तरीके से निगलने के बजाय इसकी ताजी पत्तियों और कोमल टहनियों को चबाया जाता है. लोग पत्तियों को मुंह के एक तरफ इकट्ठा करके गाल और मसूड़े के बीच दबाकर रखते हैं. यही वजह है कि तस्वीरों में एक तरफ का गाल फूला हुआ दिखाई देता है.

पत्तियों को चबाते हुए उन्हें गाल में एक छोटे से गोले की तरह रखा जाता है. धीरे-धीरे पत्तियों से निकलने वाले सक्रिय रसायन लार के जरिए शरीर में पहुंचते हैं. करीब 30 से 60 मिनट में इसका उत्तेजक असर महसूस होना शुरू हो सकता है. यानी हूती लड़ाकों के फूले हुए गाल में कोई गोली या सामान्य खाने की चीज नहीं, बल्कि अक्सर खात की पत्तियों का गुच्छा होता है.
इसे चबाने से शरीर में क्या होता है?
खात को चबाने का सबसे प्रमुख असर इसके साइकोएक्टिव कंपाउंड की वजह से होता है, जो कई देशों में बैन एम्फेटामिन जैसा प्रभाव पैदा करते हैं. यह दिमाग और नर्वस सिस्टम को उत्तेजित करता है. इसे चबाने के बाद व्यक्ति को कुछ समय के लिए ज्यादा सतर्कता, ऊर्जा, उत्साह और बातचीत करने की इच्छा महसूस हो सकती है. कुछ लोगों में हल्का नशा या खुशी का अहसास भी होता है.
यही वजह है कि यमन में कई लोग इसे थकान कम करने, लंबे समय तक जागने या काम के दौरान सक्रिय महसूस करने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं. लेकिन इसका असर हमेशा एक जैसा नहीं रहता.
कुछ घंटों बाद बेचैनी, चिड़चिड़ापन, नींद आने में दिक्कत और मूड खराब होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं. लंबे समय तक या बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने पर निर्भरता और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम भी सामने आया है.
यमन में सिर्फ हूती ही खात नहीं चबाते
यह समझना जरूरी है कि खात को सिर्फ हूती लड़ाकों से जोड़ना सही नहीं होगा. यमन में खात चबाने की परंपरा काफी पुरानी है और यह समाज के बड़े हिस्से में लोकप्रिय रही है. यमन में वयस्क पुरुषों के बीच इसका इस्तेमाल बहुत व्यापक है. करीब 90 फीसदी वयस्क पुरुष और 73 फीसदी महिलाएं इसका इस्तेमाल करती हैं.
कई जगहों पर लोग दोपहर या शाम को एक साथ बैठकर खात चबाते हैं. इस दौरान बातचीत होती है, चाय-कॉफी पी जाती है और लोग कई घंटे साथ बिताते हैं. इसलिए यमन में खात सिर्फ एक पत्ता नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का भी हिस्सा रहा है.
हूती लड़ाके भी उसी यमनी समाज का हिस्सा हैं जहां खात का इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है. युद्ध और सैन्य गतिविधियों की तस्वीरों में जब लड़ाके घंटों तक तैनात या सक्रिय दिखाई देते हैं, तो उनके मुंह में खात का गुच्छा नजर आ सकता है. लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि वे हमला करने या लड़ने के लिए खात जरूर चबाते हैं.
हां, इसके उत्तेजक प्रभाव की वजह से इसे चबाने वाले लोगों को कुछ समय के लिए ज्यादा जागरूक और ऊर्जावान महसूस हो सकता है. यही वह असर है जिसकी वजह से खात को यमन में लंबे समय से थकान और काम करने की क्षमता से जोड़कर देखा जाता रहा है.
खात से जुड़ा है यमन का पानी का संकट
खात की कहानी सिर्फ नशे या सामाजिक आदत तक सीमित नहीं है. इसका एक बड़ा संबंध यमन के पानी के संकट से भी है. खात की खेती के लिए काफी सिंचाई की जरूरत पड़ती है. यमन में कृषि क्षेत्र कुल पानी निकासी का करीब 90 फीसदी इस्तेमाल करता है और सना बेसिन से निकाले जाने वाले पानी का करीब 30 फीसदी खात की खेती में जाता है.
यमन पहले से ही दुनिया के सबसे ज्यादा पानी की कमी वाले देशों में शामिल है. वहां भूजल जितनी तेजी से निकाला जा रहा है, उतनी तेजी से उसकी भरपाई नहीं हो रही. सना बेसिन में खात की सिंचाई के लिए कुछ कुओं की गहराई 700 मीटर या उससे ज्यादा तक पहुंच चुकी है.यानी जिस पौधे की हरी पत्तियां यमन में लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं, वही पौधा देश के बेहद गंभीर पानी के संकट से भी जुड़ा हुआ है.