मिस्र के पिरामिड और शाही कब्रें आज भी दुनिया के सबसे बड़े ऐतिहासिक रहस्यों में शामिल हैं. लेकिन करीब 5 हजार साल पुराना एक ऐसा राज सामने आया है, जो उस दौर की शाही जिंदगी की एक बेहद डरावनी तस्वीर दिखाता है. सवाल है- क्या प्राचीन मिस्र में राजा की मौत के बाद उसके साथ उसके नौकरों और कर्मचारियों को भी दफना दिया जाता था?
द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, एक नई रिसर्च में कुछ ऐसी खोपड़ियां मिली हैं, जिन पर जानलेवा चोटों के निशान हैं. इससे उस पुरानी थ्योरी को फिर से बल मिला है कि शुरुआती मिस्र के कुछ राजाओं के साथ उनके दरबार से जुड़े लोगों की भी बलि दी जाती थी.
कहां से मिले ये अवशेष?
यह मामला मिस्र के उम्म अल-काब नाम के शाही कब्रिस्तान का है. यह जगह अबिडोस के पास है और यहां मिस्र के शुरुआती राजाओं की कब्रें और अंतिम संस्कार से जुड़ी संरचनाएं मिली हैं.
यह कब्रिस्तान करीब 3000 ईसा पूर्व तक पुराना माना जाता है. यहां सिर्फ राजा-रानियों को ही नहीं दफनाया गया था. उनके आसपास कई ऐसी छोटी कब्रें भी थीं, जिनमें शाही परिवार और दरबार से जुड़े लोगों के अवशेष मिले. इनमें महिलाएं, मुहरों की देखरेख करने वाले कर्मचारी, निरीक्षक और कारीगर जैसे लोग शामिल थे.
सैकड़ों लोगों की कब्रें क्यों थीं?
मिस्र के पहले राजवंश के शासक राजा अहा के समय की कुछ ही ऐसी कब्रें मिली हैं. लेकिन उसके बाद के शासकों के दौर में शाही कब्रों और अंतिम संस्कार वाली जगहों के आसपास सैकड़ों छोटी कब्रें बनाई गईं. यहीं से सवाल उठा कि आखिर इन लोगों को राजा की कब्र के आसपास क्यों दफनाया गया?
1920 के दशक में ब्रिटिश पुरातत्वविद् फ्लिंडर्स पेट्री ने इन कब्रों की खुदाई की थी. पेट्री का मानना था कि ये लोग राजा की मौत के बाद उसके साथ बलि दिए गए होंगे. लेकिन उस समय एक बड़ी दिक्कत थी. अवशेषों पर ऐसी कोई साफ चोट नहीं मिली थी, जिससे यह साबित हो सके कि उनकी हत्या की गई थी.
इसलिए एक दूसरी थ्योरी भी सामने आई. इसके मुताबिक ये लोग शायद सामान्य मौत मरे थे और राजा की मौत के बाद उन्हें दोबारा यहां दफनाया गया.
नई रिसर्च में क्या मिला?
अब अमेरिका की पर्ड्यू यूनिवर्सिटी की डॉ. रोजलिन कैंपबेल ने इस पुराने सवाल को नए तरीके से जांचा. उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के डकवर्थ कलेक्शंस में रखी 46 खोपड़ियों का अध्ययन किया. ये खोपड़ियां तीन शाही व्यक्तियों- राजा जेर, राजा जेट और रानी मर्नेइथ से जुड़ी कब्रों के आसपास से मिली थीं. इनमें से 18 खोपड़ियों पर गंभीर चोट के निशान मिले.
कुछ में ऐसी फ्रैक्चर थीं, जो जानलेवा हो सकती थीं. एक खोपड़ी में आंख के पास काटने जैसी चोट भी मिली. यही निशान इस पुरानी थ्योरी को दोबारा चर्चा में ले आए हैं कि कम से कम कुछ लोगों की मौत प्राकृतिक नहीं, बल्कि हिंसक तरीके से हुई होगी.
क्या इन्हें जिंदा दफन किया गया था?
यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है. नई रिसर्च यह साबित नहीं करती कि इन सभी लोगों को जिंदा दफनाया गया था. बल्कि शोधकर्ताओं का कहना है कि कुछ लोगों को संभवतः राजा की मौत के बाद हिंसक तरीके से मारा गया और फिर उसके साथ दफनाया गया होगा. लेकिन सभी लोगों के साथ ऐसा हुआ था, यह कहना अभी संभव नहीं है.
जिन खोपड़ियों पर चोट के निशान नहीं मिले, उनके बारे में यह तय नहीं किया जा सकता कि वे बलि का हिस्सा थे या नहीं. डॉ. कैंपबेल के मुताबिक, नमूना बहुत छोटा है और उस समय दफन किए गए सभी लोगों की पूरी तस्वीर इससे सामने नहीं आती.
शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि खोपड़ियों पर लगी चोटें किस तरह के हथियार से आई होंगी. इन चोटों का पैटर्न उस तरह का नहीं लगता, जैसा उस समय इस्तेमाल होने वाली गदा से होता था. इसके बजाय संभावना जताई गई है कि चोटें लकड़ी या सींग से बनी चौड़ी और सपाट चीजों से लगी होंगी.यानी संभव है कि इन लोगों को किसी भारी और ठोस वस्तु से सिर पर वार करके मारा गया हो.
क्या राजा की मौत के साथ सेवकों की भी मौत होती थी?
प्राचीन मिस्र में राजा को सिर्फ एक शासक नहीं, बल्कि बेहद खास धार्मिक दर्जा भी हासिल था. इसलिए कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती दौर में राजा की मौत के बाद उसके साथ जुड़े लोगों को भी दूसरी दुनिया में उसकी सेवा के लिए भेजने की परंपरा रही हो सकती है.
मिस्र में ऐसी मान्यता थी कि मृत्यु के बाद भी जीवन जारी रहता है. ऐसे में राजा के साथ उसके सेवकों को दफनाने का मतलब यह हो सकता था कि वे दूसरी दुनिया में भी राजा की सेवा करते रहें. हालांकि, यह भी संभव है कि कुछ लोग इस परंपरा से सहमत नहीं रहे हों और इस पूरे घटनाक्रम से डरे हुए हों.
यह परंपरा ज्यादा समय तक नहीं चली
इस रिसर्च से जुड़ी एक और दिलचस्प बात सामने आती है. शाही कब्रों के आसपास बनी इन अतिरिक्त कब्रों की संख्या कुछ समय बाद तेजी से कम होने लगती है. माना जाता है कि दूसरे राजवंश की शुरुआत तक यह परंपरा लगभग खत्म हो गई थी.
बाद के दौर में असली इंसानों की जगह छोटी-छोटी मूर्तियों और प्रतिमाओं ने ले लीं. इनका इस्तेमाल मृत राजा की दूसरी दुनिया में सेवा करने वाले लोगों के प्रतीक के तौर पर किया जाता था.
मानव बलि की यह थ्योरी कोई नई बात नहीं है. मिस्र के शुरुआती राजवंशों से जुड़ी इन कब्रों की खोज के बाद से ही विशेषज्ञ इस पर बहस करते रहे हैं. लेकिन नई रिसर्च ने पहली बार पुराने मानव अवशेषों पर चोट के निशानों को आधुनिक तरीकों से गंभीरता से जांचा है.
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मिस्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्टडी इस बहस को आगे बढ़ाने के लिए अहम है. हालांकि, केवल 46 खोपड़ियों के आधार पर पूरे कब्रिस्तान में दफन सभी लोगों के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी.
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि करीब 5 हजार साल पुरानी इन खोपड़ियों ने प्राचीन मिस्र के शाही अंतिम संस्कारों से जुड़ी एक डरावनी संभावना को फिर सामने ला दिया है- हो सकता है कि कुछ राजा अपनी मौत के बाद अकेले नहीं गए थे, बल्कि उनके साथ उनके दरबार के कुछ लोग भी मारे गए हों.