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ओडिशा का गायब होने वाला बीच, कभी लहरों का शोर, कभी सूखा मैदान

ओडिशा के बालासोर में एक ऐसा रहस्यमयी तट मौजूद है, जहां की लहरें बिना किसी चेतावनी के मुसाफिरों की आंखों के सामने से ओझल हो जाती हैं. जो लोग प्रकृति के करीब रहकर कुछ शांत पल बिताना चाहते हैं, उनके लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं.

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इन लहरों में छिपा है अनोखा रहस्य (Photo: Pixabay)
इन लहरों में छिपा है अनोखा रहस्य (Photo: Pixabay)

जरा सोचिए आप समुद्र के किनारे खड़े होकर लहरों की आवाज सुन रहे हैं और ठंडी हवा का मजा ले रहे हैं. तभी अचानक समुद्र की लहरें आपसे काफी दूर चली जाती है. जहां कुछ देर पहले तक लहरें उठ रही थीं, वहां अब सिर्फ गीली रेत और खुला समुद्र तल दिखाई देता है. आमतौर पर हम समुद्र से लहरों के उठने-गिरने की एक जानी-पहचानी आवाज सुनते हैं, लेकिन ओडिशा के बालासोर जिले में स्थित चांदीपुर बीच इस सोच को पूरी तरह बदल देता है.

यहां समुद्र का व्यवहार बिल्कुल अलग है. कुछ खास समय पर पानी इतना पीछे हट जाता है कि आसमान भी उसके साथ खिसकता हुआ महसूस होता है. आखिर क्या है इस गायब होने वाले बीच का रहस्य और क्यों यहां मुसाफिर खिंचे चले आते हैं. 

यहां जब लो-टाइड आता है, तो समंदर का पानी अचानक पीछे हटने लगता है. देखते ही देखते पानी आपकी आंखों के सामने से 4-5 किलोमीटर दूर चला जाता है. जहां अभी शोर मचाती लहरें थीं, वहां अचानक एक रेतीला मैदान दिखने लगता है. आप उस जगह पर आराम से पैदल चल सकते हैं या गाड़ी चला सकते हैं, जो कुछ देर पहले समंदर की गहराई में थी. जो लोग पहली बार यहां जाते हैं, वे अपनी आंखों पर यकीन नहीं कर पाते. ऐसा लगता है मानो समंदर ने खुद रास्ता देकर आपको अंदर आने का न्योता दिया हो.

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क्यों कहा जाता है इसे लुका-छिपी बीच?

समुद्र का इस तरह बार-बार गायब होना और फिर कुछ घंटों बाद लौट आना ही इसे स्थानीय लोगों के बीच काफी मशहूर है. यह करिश्मा यहां दिन में दो बार होता है. दरअसल, इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण चंद्रमा की स्थिति और बंगाल की खाड़ी की खास भौगोलिक बनावट है. यही कारण है कि जब पानी पीछे हटता है, तो पीछे गीली मिट्टी और रेत का एक अंतहीन मैदान रह जाता है. इस दौरान मुसाफिर बिना किसी नाव या जहाज के समुद्र के बीचों-बीच मीलों तक पैदल चलते नजर आते हैं, जो किसी दूसरी ही दुनिया में होने जैसा जादुई एहसास कराता है.

यहां नहीं है प्रकृति का कोई तय समय

चांदीपुर की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां ज्वार-भाटे का कोई फिक्स टाइम-टेबल नहीं होता. समुद्र कब पीछे जाएगा और कब लौटेगा, यह पूरी तरह प्रकृति के मिजाज पर निर्भर करता है. हालांकि स्थानीय लोग और मछुआरे इस बदलाव को समझ लेते हैं, लेकिन पर्यटकों के लिए यह हमेशा एक सरप्राइज बना रहता है. एक पल समुद्र शांत होता है और अगले ही पल वह दूर-दूर तक फैले मैदान में बदल जाता है.

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चांदीपुर कोई भीड़भाड़ वाला या कमर्शियल बीच नहीं है. यहां न तेज शोर है और न ही भारी भीड़. यह जगह शांति और सुकून के लिए जानी जाती है. रेत पर चलते छोटे-छोटे लाल केकड़े और दूर तक फैला खाली समुद्र तल एक ऐसा दृश्य रचते हैं, जो लंबे समय तक यादों में बना रहता है. 
 

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