कभी वह दौर था जब दुनिया के बड़े पर्यटन स्थलों पर पश्चिमी देशों के सैलानियों का बोलबाला रहता था, लेकिन साल 2026 की यह नई लहर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. आज टोक्यो की हलचल भरी गलियों से लेकर सिडनी के ओपेरा हाउस तक, सबसे आगे,भारतीय मुसाफिर हैं.
जेब में बढ़ती इनकम, पासपोर्ट पर लगते वीजा के स्टैम्प और सरहदों को पार करने का बढ़ता आत्मविश्वास, इन सबने मिलकर भारत को एक 'ग्लोबल टूरिज्म पावर हाउस' में तब्दील कर दिया है. यह बदलाव केवल संख्याओं में नहीं, बल्कि दुनिया के पर्यटन मैप को देखने के नजरिए में भी है. भारतीय पर्यटकों की इस बढ़ती तादाद ने ग्लोबल टूरिज्म के पुराने नियमों को ध्वस्त कर नया इतिहास लिख दिया है.
सरहदों की दूरी घटी, वीजा का झंझट खत्म
इस पर्यटन क्रांति की सबसे बड़ी बुनियाद है प्रवेश प्रक्रियाओं का बेहद सरल होना. एशिया प्रशांत क्षेत्र के कई देशों ने भारतीय यात्रियों की नब्ज को पहचाना और वीजा नियमों में बड़ी ढील दी. इसका सीधा असर यह हुआ कि अब लोग हफ्तों पहले प्लानिंग करने के बजाय बैग पैक कर अचानक विदेश यात्रा पर निकल रहे हैं. यही नहीं, एयरलाइंस ने भी इस बढ़ती मांग को देखते हुए सीधे रूट्स और उड़ानों की संख्या बढ़ा दी है. अब छोटे शहरों से लेकर बड़े विदेशी हब तक का सफर न केवल सस्ता हुआ है, बल्कि बेहद सुगम भी. इसने पहली बार विदेश जा रहे परिवारों और कपल्स के मन से अंतरराष्ट्रीय यात्रा का डर पूरी तरह खत्म कर दिया है.
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सिर्फ बड़े शहर नहीं, गांवों तक पहुंच बनी
भारतीय सैलानियों की पसंद अब सिर्फ वही पुराने, रटे-रटाए स्मारक नहीं रह गई है. विदेश यात्रा का मतलब अब केवल फोटो खिंचवाकर लौट आना नहीं, बल्कि उस देश को महसूस करना बन गया है. जापान में भारतीय पर्यटक अब टोक्यो की चमक-दमक और भीड़ तक सीमित नहीं हैं. वे छोटे ग्रामीण कस्बों की शांति तलाश रहे हैं, पारंपरिक जापानी खाने का स्वाद ले रहे हैं और सदियों पुरानी रेल यात्राओं के जरिए देश की असली आत्मा को समझ रहे हैं.
इसी तरह, लंबी दूरी की यात्रा के लिए ऑस्ट्रेलिया भारतीयों का नया हॉटस्पॉट बनकर उभरा है. सीधी उड़ानों ने सफर आसान कर दिया है और क्रिकेट व शिक्षा से जुड़ा रिश्ता ऑस्ट्रेलिया को भारतीयों के और करीब ले आया है. मेलबर्न के खेल मैदान हों या सिडनी की खूबसूरत तटरेखाएं, हर जगह भारतीय पर्यटक अब कुछ दिनों के नहीं, बल्कि लंबी छुट्टियों के लिए पहुंच रहे हैं. इसका असर सिर्फ पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय कारोबार को साल भर स्थिर आमदनी मिल रही है और अर्थव्यवस्था को लगातार मजबूती मिल रही है.
साउथ-ईस्ट एशिया में देसी स्वाद का बोलबाला
थाईलैंड, सिंगापुर और वियतनाम जैसे देशों के लिए भारतीय मुसाफिर अब उनकी इकोनॉमी की रीढ़ बन गए हैं. बढ़ती मांग को देखते हुए वहां के होटलों और रिसॉर्ट्स ने खुद को भारतीय अंदाज़ में ढालना शुरू कर दिया है. अब वहां न केवल भारतीय खाने के ढेरों विकल्प मौजूद हैं, बल्कि भाषा की बाधा को दूर करने के लिए विशेष सुविधाएं भी दी जा रही हैं. यही नहीं, वेलनेस टूरिज्म और पर्यावरण के अनुकूल ठहरने के विकल्पों में हो रहा निवेश यह साबित करता है कि दुनिया अब भारतीय प्राथमिकताओं के इर्द-गिर्द अपनी पर्यटन नीति बुन रही है.
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वैश्विक यात्रियों के लिए सुनहरा अवसर
भारतीयों का यह बढ़ता प्रभाव पूरे वैश्विक पर्यटन तंत्र को एक नई ऊर्जा प्रदान कर रहा है. जब मांग बढ़ती है, तो प्रतिस्पर्धा आती है और इसका सीधा फायदा सैलानियों को बेहतर कीमतों और उत्कृष्ट सेवाओं के रूप में मिल रहा है. एशिया प्रशांत क्षेत्र अब पहले से कहीं अधिक कनेक्टेड और मेहमाननवाज बन गया है. भारतीय मुसाफिरों की यह लहर एक दीर्घकालिक बदलाव का संकेत है, जो आने वाले दशकों में यात्रा के तौर-तरीकों को पूरी तरह परिभाषित करेगी. अब दुनिया के द्वार भारतीयों के लिए पहले से कहीं ज्यादा खुले और स्वागतपूर्ण हैं.