हड़प्पा (Harappa) एक प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल है. इस स्थल का नाम पास के आधुनिक हड़प्पा गांव के नाम पर पड़ा है. प्राचीन समय में रावी नदी इस क्षेत्र के पास बहती थी, लेकिन वर्तमान में नदी का प्रवाह स्थल से लगभग 8 किलोमीटर उत्तर की ओर है.
हड़प्पा सिंधु घाटी सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण नगरों में से एक माना जाता है. अपने उत्कर्ष काल, जिसे परिपक्व हड़प्पा काल (2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व) कहा जाता है, के दौरान यह शहर लगभग 150 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ था. अनुमान है कि उस समय यहां करीब 23,500 लोग निवास करते थे. शहर में मिट्टी की पकी ईंटों से बने घर और सुव्यवस्थित बस्तियां मौजूद थीं.
हड़प्पा सभ्यता की जड़ें लगभग 6000 ईसा पूर्व की मेहरगढ़ संस्कृति तक पहुंचती हैं. लगभग 2600 ईसा पूर्व के आसपास हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे बड़े नगर विकसित हुए. सिंधु नदी घाटी में फैली इस सभ्यता में शहरी केंद्र, जल निकासी व्यवस्था, सामाजिक संगठन और व्यापारिक गतिविधियों का विकास हुआ था. 1920 के दशक में पुरातत्वविदों द्वारा की गई खुदाई के बाद इस सभ्यता को दुनिया के सामने दोबारा पहचाना गया.
हड़प्पा का पुरातात्विक स्थल समय के साथ कई बार क्षतिग्रस्त हुआ. 1857 में ब्रिटिश शासन के दौरान लाहौर-मुल्तान रेलवे लाइन के निर्माण में यहां के खंडहरों से ईंटें निकालकर रेलवे ट्रैक के नीचे बिछाने के लिए इस्तेमाल की गईं. इससे स्थल को काफी नुकसान पहुंचा. इसके बावजूद खुदाई में बड़ी संख्या में पुरातात्विक वस्तुएं और अवशेष प्राप्त हुए हैं.
हड़प्पा सभ्यता का विस्तार केवल पंजाब तक सीमित नहीं था. इसके अवशेष पूर्व में हिमालय की तलहटी, दक्षिण-पूर्व में गुजरात और दक्षिण-पश्चिम में बलूचिस्तान तक मिले हैं. इससे पता चलता है कि यह सभ्यता एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में फैली हुई थी.
इतिहासकारों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का प्रारंभिक चरण लगभग 3500 ईसा पूर्व से शुरू हुआ. इसका परिपक्व काल 2600 ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व तक चला. इसके बाद लगभग 2000 ईसा पूर्व से 1400 ईसा पूर्व के बीच धीरे-धीरे इसका पतन होने लगा. उपलब्ध पुरातात्विक प्रमाणों में किसी बड़े विदेशी आक्रमण के संकेत नहीं मिलते हैं. कई अध्ययनों के अनुसार जलवायु परिवर्तन, वर्षा में कमी और क्षेत्र के धीरे-धीरे शुष्क होने जैसी प्राकृतिक परिस्थितियां इसके पतन के प्रमुख कारण थीं.
वर्तमान समय में आधुनिक हड़प्पा एक छोटा कस्बा है, जिसकी आबादी लगभग 15,000 के आसपास है. वर्ष 2004 में इस स्थल को यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल किया गया था. वहीं, 2005 में यहां प्रस्तावित एक मनोरंजन पार्क परियोजना को तब रोक दिया गया जब निर्माण कार्य के दौरान कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष मिले. आज हड़प्पा विश्व इतिहास और पुरातत्व अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है.
भारत के संस्कृति मंत्रालय ने इस हड़प्पाकालीन मोहर को 4300 वर्ष पुराना बताया और इस आकृति को शिव पशुपति बताते हुए इसे भारतीय संस्कृति की निरंतरता का प्रतीक बताया. लेकिन अमेरिकी इतिहासकार ने इसे एलामाइट सभ्यता से जुड़ी एक तस्वीर बताई.
भारत के टॉप पुरातत्वविद बीआर मणि की नई रिसर्च से पता चलता है कि हड़प्पा वाले और वैदिक लोग सोने के सिक्कों का इस्तेमाल कर रहे थे, जिन्हें निष्क कहा जाता था. ये सिक्के मुद्रा के रूप में, व्यापार की संपत्ति के रूप में, अनुष्ठान की भेंट के रूप में और स्टेटस सिंबल के रूप में इस्तेमाल होते थे, मणि कहते हैं कि यह खोज भारतीय सोने के सिक्कों की समयरेखा को लगभग तीन सहस्राब्दियों पीछे धकेल देती है, जो उपमहाद्वीप की प्राचीन अर्थव्यवस्था और संस्कृति के बारे में हमारी समझ को नया आयाम देगी.
इतिहासविदों ने पश्चिमी राजस्थान के सीमावर्ती जैसलमेर जिले में 4500 साल पुरानी हड़प्पा कालीन सभ्यता के अवशेषों को खोज निकाला है. शोधार्थी दिलीप कुमार सैनी ने बताया कि इस पुरास्थल पर भारी मात्रा में खंडित मृदभांड यत्र तंत्र बिखरे हुए हैं, जिसमें हड़पा सभ्यता के नगरीय स्तर से संबंधित लेप उक्त लाल मृदभांड, लाल मृदभांड, कटोरे, घड़े, परफोरेटेड जार के टुकड़े आदि है.
कच्छ के एक गांव में कुछ लोग सोने की तलाश में थे. वो एक जगह पर सोना खोज रहे थे, तभी उन्हें हड़प्पा सभ्यता के बेशकीमती अवशेष मिले. जब उन्होंने यह बात पुरातत्वविदों को बताई तो वो भी हैरान रह गए. लेकिन यहां से कई शानदार चीजें मिली हैं.