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शिव या एलामाइट देवता? हड़प्पाकालीन 4300 वर्ष पुरानी मोहर पर US इतिहासकार के दावे से टकराव

भारत के संस्कृति मंत्रालय ने इस हड़प्पाकालीन मोहर को 4300 वर्ष पुराना बताया और इस आकृति को शिव पशुपति बताते हुए इसे भारतीय संस्कृति की निरंतरता का प्रतीक बताया. लेकिन अमेरिकी इतिहासकार ने इसे एलामाइट सभ्यता से जुड़ी एक तस्वीर बताई.

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संस्कृति मंत्रालय के दावे पर अमेरिकी इतिहासकार ने सवाल उठाया है. (Photo: ITG)
संस्कृति मंत्रालय के दावे पर अमेरिकी इतिहासकार ने सवाल उठाया है. (Photo: ITG)

भारत के संस्कृति मंत्रालय ने हाल ही में एक 4300 वर्ष पुरानी हड़प्पाकालीन मोहर को 'भारतीय सभ्यता की अटूट निरंतरता का प्रतीक' बताते हुए सोशल मीडिया पर साझा किया. दुनिया की सबसे पुरानी मानव बस्तियों में से एक अविभाजित भारत के मोहनजो-दारो में मिली 
4300 साल पुरानी पत्थर की मोहर में योग मुद्रा में एक आकृति दिखाई देती है. संस्कृति मंत्रालय के अनुसार इस आकृति को शिव-पशुपति माना जाता है. यह आकृति मूलाबंधासन में बैठी है और जानवरों से घिरी हुई है. 

भारतीय परंपरा में लंबे समय से इसे भगवान शिव के आदि स्वरूप 'पशुपतिनाथ' से जोड़कर देखा जाता रहा है. 

इस पोस्ट ने तुरंत विवाद खड़ा कर दिया. अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के ने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की ओर से पोस्ट किए गए इस पोस्ट पर विरोध जताया. 

शिव या लॉर्ड ऑफ एनिमल्स?

ऑड्रे ट्रुश्के ने लिखा कि, “यह शिव नहीं है. इसकी ज़्यादा संभावना है कि इसे प्रोटो-एलामाइट आइकनोग्राफी से लिया गया है, जिसमें एक यूरेशियन देवता को "Lord of animals- जानवरों का स्वामी" के रूप में दिखाया गया है. 

तुरंत ही संस्कृति मंत्रालय का ये पोस्ट वायरल हो गया. और इसे लगभग 20 लाख लोगों ने देखा. इसके बाद कई लोगों ने इस पोस्ट में दिखाए गए मोहर की वास्तविकता को लेकर कमेंट किया. 

संस्कृति मंत्रालय ने एक्स पर अपने पोस्ट में आगे लिखा कि भले ही प्राचीन स्थल आज की आधुनिक सीमाओं के पार स्थित हों, लेकिन भारत ही इस विरासत का जीवंत संरक्षक बना हुआ है. पशुपति मुहर में दिखाई देने वाली योग मुद्रा, शैव प्रतीकवाद और आध्यात्मिक भावना आज भी भारत के मंदिरों, शिव की दैनिक पूजा, योग परंपराओं और सांस्कृतिक जीवन में पूरी तरह से जीवंत है. 

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वैदिक काल से लेकर आज के आधुनिक भारत तक, सभ्यता का यह सूत्र निरंतर और अटूट रूप से जीवित रहा है जो हमारे दर्शन, रीति-रिवाजों और सामूहिक चेतना में गहराई से रचा-बसा है. 

प्रोटो-एलामाइट आइकनोग्राफी क्या है?

प्रोटो-एलामाइट सभ्यता प्राचीन ईरान की सबसे शुरुआती शहरी सभ्यताओं में मानी जाती है. इसका विकास लगभग 3200 ईसा पूर्व से 2700 ईसा पूर्व के बीच आज के दक्षिण-पश्चिमी ईरान में हुआ था. यह सभ्यता मुख्य रूप से सुसा अंशान और ईरानी पठार के अन्य क्षेत्रों में फैली हुई थी. इसे मेसोपोटामिया की सुमेरियन सभ्यता के समकालीन माना जाता है. 

आइकनोग्राफी यानी कि प्रतिमा विज्ञान. इस तरह से प्रोटो-एलामाइट आइकनोग्राफी का मतलब हुआ प्रोटो-एलामाइट सभ्यता के दौरान पाए गए प्रतिमाओं का अध्ययन या जानकारी. 

इस सभ्यता की मोहरों और बर्तनों पर पशु आकृतियां, धार्मिक प्रतीक और ज्यामितीय डिजाइन मिलते हैं. बैल, बकरी और जंगली जानवरों की छवियां आम थीं. इस दौरान मनुष्य और पशुओं की मिश्रित तस्वीरें भी देखने को मिलती हैं. 

अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के ने संस्कृति मंत्रालय के पोस्ट पर दावा किया ये मोहर शिव का नहीं है. 

जबकि संस्कृति मंत्रालय ने इसे शिव-पशुपति या प्रोटो-शिव के रूप में वर्णित किया. यह मोहर शैव परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक धारा की प्राचीनता को रेखांकित करता है.  

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क्या योग भी एलामाइट का हो गया है?

ऑड्रे ट्रुश्के के तर्कों का जवाब शिवा ट्रिलॉजी,रामचंद्र सीरीज जैसे पौराणिक आख्यानों पर किताब लिखने वाले चर्चित लेखक अमीष त्रिपाठी ने दिया. 

उन्होंने लिखा, "प्रोटो-एलामाइट? पशुपति की मुहर पर एक हाथी, एक भैंसा और एक गैंडा है. पुराना एलाम दक्षिण-पश्चिमी ईरान में था. हाथी, भैंसा और गैंडे पुराने एलाम में नहीं पाए जाते थे. वैसे वे भारत में जरूर पाए जाते रहे हैं. साथ ही, यह मूर्ति योग की मुद्रा में बैठी है. क्या अब योग भी एलामाइट का हो गया है? क्या सच में?"

अमीष त्रिपाठी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि, "आपकी प्रोफाइल में लिखा है कि आप एक प्रोफेसर हैं. मेरा मतलब इस तरह से जवाब देना नहीं है, लेकिन आपके स्टूडेंट्स को रिफ़ंड मिलना चाहिए. और सच में, पश्चिमी यूनिवर्सिटीज़ को अपने हायरिंग के तरीकों में सुधार करने की ज़रूरत है."

एक दूसरी प्रोफेसर लावण्या वेमसानी ने कहा, "एलामाइट मोहर पशुपति/आदि-शिव मोहर से पूरी तरह अलग है. ये दोनों एक जैसी नहीं हैं. इन दोनों के बीच तुलना करने लायक 1% भी समानता मौजूद नहीं है."

"सिंधु-सरस्वती सभ्यता की पशुपति मोहर में शिव को 'मूलबंधासन' में बैठे हुए दिखाया गया है, जो केवल सिद्ध योगी ही कर पाते हैं और वे भारत में पाए जाने वाले जानवरों (बाघ, हाथी, गैंडा) से घिरे हुए हैं. यह बात उन लोगों को डराती है जो भारतीय इतिहास की मनगढ़ंत और झूठी कहानियां फैलाते हैं. चाहे उन्हें इस बात का एहसास हो या न हो, लेकिन अब भारतीय इतिहास उनकी गढ़ी हुई कहानियों पर आधारित नहीं रहा है."

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इस पोस्ट पर पाकिस्तान से भी कई प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. एक पाकिस्तानी यूजर ने कहा कि मोहनजो-दारो तो पाकिस्तान में है, इस पर भारत कैसे दावा कर सकता है. 

संस्कृति मंत्रालय का ये पोस्ट केवल एक मोहर की व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बड़े सवाल से जुड़ा है कि भारत के प्राचीन इतिहास को देखने का नजरिया क्या हो.एक पक्ष इसे सांस्कृतिक निरंतरता का प्रमाण मानता है, बकि दूसरा पक्ष ठोस पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर आगे बढ़ने की सलाह देता है. 
 

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