scorecardresearch
 

3D होलोग्राम, AI आवाज और रोबोट: हाईटेक कैंपेन से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने के करीब थलपति विजय!

एक्टर थलपति विजय तमिलनाडु के अगले मुख्यमंत्री बन सकते हैं. दरअसल उनकी दो साल पुरानी पार्टी TVK ने इस एसेंबली इलेक्शन में ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. इस जीत के पीछे एक बड़ा टेक्नोलॉजी एंगल भी जो जानना जरूरी है.

Advertisement
X
थलपति विजय की जीत के पीछे AI का बड़ा रोल
थलपति विजय की जीत के पीछे AI का बड़ा रोल

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बीच एक नाम लगातार सुर्खियों में है. थलपति विजय. उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) पहली बार चुनाव मैदान में उतरी है, लेकिन शुरुआती रुझानों में ही कई सीटों पर मजबूत प्रदर्शन करती नजर आ रही है.

लंबे समय से स्थापित पार्टियों के बीच विजय की एंट्री ने राजनीति में एक नया समीकरण खड़ा कर दिया है. दरअसल ये दो साल पुरानी पार्टी है और इस चुनाव रूझान से तो ऐसा लग रहा है कि किसी के साथ मिल कर विजय सरकार बना सकते हैं. जाहिर है अगर ऐसा हुआ तो वहां के मुख्यमंत्री विजय ही बन सकते हैं. 

बहरहाल ये जानना यहां दिलचस्प है कि इस थलपति विजय की पार्टी और खुद विजय ने चुनावी रैलियों मे टेक्नोलॉजी को कैसे यूज किया. कई जगहों पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी उन्होंने भरपूर यूज किया है. ये देश की पहली पार्टी बन गई है जिसने चुनावी रैलियों में ह्यूमनॉयड रोबोट भी उतारा. 

TVK का टेक फर्स्ट अप्रोच

इस पार्टी और विजय ने पहले से ही टेक फर्स्ट अप्रोच अपनाया है. जाहिर है विजय हर जगह रैली में शामिल नहीं हो सकते थे, इसलिए अलग अलग जगहों पर उनका होलोग्राम चुनावी भाषण देता नजर आया. दिलचस्प ये है कि होलोग्राम इतना असली लगा कि कई लोगों को ये भी समझ में बाद में आया को भाषण रिकॉर्डेड था और वो विजय का होलोग्राम था. 

Advertisement

TVK ने चुनाव के दौरान पार्टी वर्कर के तौर पर एक ह्यूमनॉयड रोबोट भी रखा. ये लोगों को बीच चर्चा का मुद्दा जरूर बना. ये रोबोट पार्टी का शॉल ओढ़ कर पार्टी कैंडिडेट के साथ घूमता हुआ दिखा.

इससे पहले भी इस तरह के टेक यूज हुए हैं, लेकिन TVK ने परफेक्शन के साथ टेक को यूज किया ताकि ये देखने में नकली ना लगे. इस पार्टी और विजय ने यंग वोटर्स को अच्छे से समझा और उन्हें टारगेट किया. 

एक साथ दो तीन जगहों पर विजय को प्रचार करना था. ऐसे में फैन पर प्रोजेक्शन यूज करके पूरा होलोग्राम तैयार किया गया.  ओपन जीप में भी इसी तरह से प्रचार किया गया.

AI होलोग्राम से प्रचार

इस बार सबसे ज्यादा चर्चा उनके चुनाव प्रचार के तरीके की हो रही है, जिसमें टेक्नोलॉजी का आक्रामक इस्तेमाल देखने को मिला. विजय की टीम ने AI होलोग्राम टेक्नोलॉजी का सहारा लिया.

जिन जगहों पर वह खुद नहीं पहुंच सके, वहां उनका 3D डिजिटल प्रोजेक्शन दिखाया गया. मंच पर उनका डिजिटल अवतार उसी अंदाज में भाषण देता नजर आया, जैसा लोग उन्हें फिल्मों और रियल रैलियों में देखते हैं.

होलोग्राम ही नहीं, टेक्नोलॉजी का यूज प्रेजेंटेशन में भी

होलोग्राम रैलियों को सिर्फ प्रोजेक्शन तक सीमित नहीं रखा गया. इनके लिए पहले से कंटेंट प्लान किया गया, भाषण को इस तरह रिकॉर्ड या डिजाइन किया गया कि अलग-अलग इलाकों में लोकल कनेक्ट बना रहे.

Advertisement

कई जगहों पर बैकड्रॉप, लाइटिंग और साउंड को इस तरह सिंक किया गया कि लोगों को रियल स्टेज जैसा अनुभव मिले. इससे डिजिटल और फिजिकल के बीच का फर्क कम करने की कोशिश की गई.

होलोग्राम कैसे यूज होता है?

तकनीकी तौर पर इन रैलियों में हाई-ल्यूमेन प्रोजेक्टर, ट्रांसपेरेंट स्क्रीन और सिंक्रोनाइज्ड ऑडियो सिस्टम का इस्तेमाल हुआ, जिससे 3D इफेक्ट ज्यादा रियल लगे.

कुछ मामलों में टाइमिंग को इस तरह सेट किया गया कि अलग-अलग शहरों में एक ही वक्त पर ‘लाइव’ जैसी फील आए. यानी यह सिर्फ रिकॉर्डेड वीडियो नहीं था, बल्कि एक कोरियोग्राफ्ड टेक एक्सपीरियंस था.

इसके अलावा, AI टूल्स का इस्तेमाल कंटेंट प्रोडक्शन में भी किया गया. भाषणों के क्लिप्स को तेजी से एडिट करना, सबटाइटल्स और अलग-अलग भाषाओं में वर्जन तैयार करना और उन्हें सोशल मीडिया के लिए ऑप्टिमाइज करना, यह सब प्रोसेस ऑटोमेशन और AI की मदद से तेज किया गया. इससे हर रैली के बाद तुरंत डिजिटल इंपैक्ट बनाया जा सका.

डेटा एनालिसिस में AI का बड़ा रोल

डिजिटल कैंपेनिंग में डेटा एनालिटिक्स की भी अहम भूमिका रही. अलग-अलग इलाकों के रिस्पॉन्स के आधार पर यह तय किया गया कि कहां किस तरह का मैसेज ज्यादा असर करेगा. उसी हिसाब से सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और भाषण के हिस्सों को प्रमोट किया गया. यानी कैंपेन को रियल टाइम फीडबैक के आधार पर एडजस्ट किया गया.

Advertisement

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. इस कैंपेन में सिर्फ होलोग्राम ही नहीं, बल्कि डिजिटल टूल्स का पूरा इकोसिस्टम इस्तेमाल हुआ. रैलियों के वीडियो क्लिप्स को तुरंत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पुश किया गया, जिससे हर इवेंट का असर जमीन से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन पर दिखा.

छोटे-छोटे वीडियो, वायरल क्लिप्स और भाषण के हाइलाइट्स तेजी से फैलाए गए, जिससे एक नैरेटिव बनाया गया कि विजय हर जगह एक्टिव हैं.

डिजिटल कैंपेन को माइक्रो लेवल पर लाया गया

इसके अलावा, उनकी टीम ने डेटा और डिजिटल मैनेजमेंट का भी इस्तेमाल किया. अलग-अलग इलाकों के हिसाब से मैसेजिंग को थोड़ा-थोड़ा बदला गया, लोकल मुद्दों को हाइलाइट किया गया और उसी हिसाब से कंटेंट तैयार किया गया. यानी एक तरह से कैंपेन को माइक्रो लेवल पर ट्यून किया गया, ताकि हर क्षेत्र के वोटर्स को लगे कि बात सीधे उनसे की जा रही है.

क्राउड मैनेजमेंट और रैली प्लानिंग में भी टेक्नोलॉजी की भूमिका रही. बड़े इवेंट्स को इस तरह डिजाइन किया गया कि वे सिर्फ मौके पर मौजूद लोगों तक सीमित न रहें, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी बड़े पैमाने पर देखे जाएं. LED स्क्रीन, हाई-क्वालिटी ऑडियो-वीडियो सेटअप और लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए रैली का एक्सपीरियंस कई गुना बढ़ाया गया.

हालांकि, इन सबके बावजूद यह मान लेना कि टेक्नोलॉजी ने ही जीत दिलाई, सही नहीं होगा. टेक्नोलॉजी ने प्रचार को अट्रैक्टिव और अलग जरूर बनाया, लेकिन असली ताकत जमीन पर बनी.

Advertisement

पिछले कुछ सालों में विजय ने अपने फैन बेस को एक मजबूत संगठन में बदला, स्थानीय नेताओं को जोड़ा और बूथ लेवल तक नेटवर्क तैयार किया. कई जगहों पर उनकी पकड़ इसी वजह से बनी, न कि सिर्फ डिजिटल कैंपेन के कारण.

पहले भी हुआ होलोग्राम रैली, लेकिन परफेक्शन विजय ने दिखाया

होलोग्राम जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल पहले भी हो चुका है, लेकिन इस बार फर्क यह था कि इसे ज्यादा प्लान्ड तरीके से चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाया गया. खासकर उन इलाकों में, जहां एक ही दिन में पहुंचना संभव नहीं था, वहां यह तरीका कारगर साबित हुआ.

इस चुनाव ने एक बात साफ कर दी है कि अब टेक्नोलॉजी चुनाव प्रचार का अहम हिस्सा बन चुकी है. लेकिन यह सिर्फ एक टूल है, पूरा खेल नहीं. शहरों में जहां लोग ऐसे एक्सपेरिमेंट्स को दिलचस्प मानते हैं, वहीं गांवों में अब भी सीधा संपर्क, स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार की जमीन से जुड़ी छवि ज्यादा मायने रखती है.

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल और बढ़ेगा. लेकिन इसके साथ नए सवाल भी खड़े होंगे, क्या इससे प्रचार ज्यादा ट्रांसपेरेंट होगा या भ्रम की गुंजाइश बढ़ेगी? क्या लोग असली और डिजिटल के बीच फर्क कर पाएंगे?

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement