मीराबाई चानू ने ग्लासगो में गोल्ड जीतने के बाद आंसू बहाए, लेकिन ये पेरिस 2024 वाले टूटे हुए आंसू नहीं थे. वहां वह सिर्फ एक किलो से चौथे स्थान पर रह गई थीं. वह अपने पीरियड के तीसरे दिन थीं और रिपोर्टरों से कहा था, 'ये मेरी किस्मत में नहीं था.' ग्लासगो में कहानी अलग थी. यहां आंसू खुशी के थे. ओलंपिक सिल्वर, अब तीन कॉमनवेल्थ खिताब, चोट के बाद वापसी और अलग-अलग वेट कैटेगरी में शरीर को फिर से ढालने की मेहनत, सब कुछ एक ही पोडियम पर जाकर मिला. यही वह शहर भी है जहां मीराबाई चानू ने 2014 में किशोरी रहते हुए सिल्वर के साथ पहला बड़ा पोडियम हासिल किया था.
करीब 7,000 किलोमीटर दूर मोदीनगर में 40 लड़कियां स्क्रीन के सामने यह पल देख रही थीं. जब मीराबाई चानू का 105 किलो क्लीन एंड जर्क पूरा हुआ, तो वहां जो शोर उठा, वह सिर्फ चैंपियन के लिए नहीं, एक कोच के लिए भी था. पेरिस में चौथा स्थान उनकी कहानी का अंत बन सकता था. लेकिन उन्होंने 48 किलो कैटेगरी के हिसाब से अपने शरीर को फिर से तैयार किया और राष्ट्रीय कोच विजय शर्मा के साथ मिलकर गाजियाबाद के बाहरी हिस्से में अगली पीढ़ी के लिए एक नया ठिकाना खड़ा कर दिया.
मोदीनगर में नया सपना
मीराबाई चानू ने IndiaToday.in से कहा, 'विजय सर और मैंने मिलकर मोदीनगर में वेटलिफ्टिंग वॉरियर्स अकादमी शुरू की.' उन्होंने बताया, 'इस वक्त हमारे पास 8 से 14 साल की खिलाड़ी हैं और सभी लड़कियां हैं. हमारा सपना हमेशा से सिर्फ लड़कियों को ट्रेन करना और उन्हें आगे बढ़ाना था. अभी भी बहुत कम लड़कियां वेटलिफ्टिंग चुनती हैं. टोक्यो ओलंपिक के बाद ज्यादा लड़कियां आने लगीं. उससे पहले तो लगभग कोई नहीं आता था.' वहां 40 बच्चे ट्रेनिंग करते हैं.
मीराबाई चानू ने कहा, 'ज्यादातर नॉर्थ ईस्ट से हैं. करीब 20 असम से हैं और करीब 20 मणिपुर से. हमारे पास जम्मू, महाराष्ट्र और दूसरे राज्यों की लड़कियां भी हैं. ऐसा नहीं है कि सिर्फ नॉर्थ ईस्ट से खिलाड़ी हैं. हमारे पास पूरे भारत से बच्चे हैं.'

बच्चियों से मिलती है अपनी ट्रेनिंग की ताकत
मीराबाई चानू ने कहा, 'मैं उनके साथ ट्रेनिंग भी करती हूं और उन्हें कोच भी करती हूं. उन्हें देखकर मुझे अपना बचपन याद आता है और याद आता है कि मैंने कैसे शुरुआत की थी. उन्हें सिखाते वक्त मुझे भी मोटिवेशन मिलता है. वेटलिफ्टिंग में जो कुछ मैंने झेला और जो सीखा, सब याद आता है. उन अनुभवों को आगे देने का मौका मिलना मुझे बहुत खुशी देता है.'
उन्होंने आगे कहा, 'मुझे नहीं पता कि बच्चे कितने खुश होते हैं, लेकिन अपने अनुभव बांटकर मैं बहुत खुश होती हूं. वे भी मुझे मोटिवेट करते हैं. उनके साथ ट्रेनिंग करने से मैं अपनी ट्रेनिंग और ज्यादा एंजॉय करती हूं.' लगभग सब कुछ जीत चुकी 31 साल की मीराबाई चानू के लिए यही वजह है कि पोडियम पर भी भावनाएं छलक जाती हैं.
ग्लासगो में मेंटर और अगला लक्ष्य
ग्लासगो में अपनी स्पर्धा खत्म होने के बाद भी मीराबाई चानू रुकी नहीं. वह बाकी मुकाबलों के दौरान खिलाड़ियों को देखती रहीं, हौसला बढ़ाती रहीं और अनुवाद में मदद करती रहीं. उन्होंने कहा, 'मणिपुर से आने वाले कई खिलाड़ियों को भाषा की दिक्कत होती है. जब मैं उनसे मणिपुरी में बात करती हूं, तो वे तुरंत समझ जाते हैं.'
उन्होंने यह भी कहा, 'मैं जो कर सकती हूं, सर की मदद करने की कोशिश करती हूं. अगर मैं किसी खिलाड़ी को किसी भी तरह सपोर्ट कर सकूं, तो शायद उससे उसके प्रदर्शन में सुधार हो. इससे मुझे खुशी मिलती है.' मीराबाई चानू ने साफ कहा, 'मेडल जीतना एक बात है, लेकिन किसी खिलाड़ी को प्रतियोगिता के मंच पर अपना सर्वश्रेष्ठ देने में मदद करना भी बहुत जरूरी है. किसी दूसरे खिलाड़ी को सपोर्ट करना अच्छा लगता है. इससे मुझे भी मोटिवेशन मिलता है.'
जब उनसे पूछा गया कि अब क्या बाकी है, तो उन्होंने कहा, 'अब मेरे पास लगभग सब कुछ है. मेरे पास मेडल हैं और मैंने बहुत कुछ हासिल किया है. लेकिन एक चीज अब भी बाकी है, एशियन गेम्स. अभी मेरा पूरा फोकस उसी पर है.' 2023 में इसी मेडल के सबसे करीब पहुंचने पर हिप इंजरी हुई थी, जिसकी छाया पेरिस तक रही. एशियन गेम्स के बाद उनके 53 किलो कैटेगरी में जाने की उम्मीद है. मोदीनगर लौटकर अब मीराबाई चानू सिर्फ अपने लिए नहीं, उन 40 लड़कियों के साथ भी गोल्ड की नई कहानी बना रही हैं.