scorecardresearch
 

कैंसर से जंग लड़ी, 36 की उम्र में बैडम‍िंटन कोर्ट पर रचा इत‍िहास... चाउ तिएन-चेन बने वर्ल्ड चैम्प‍ियनश‍िप के सबसे उम्रदराज मेडलिस्ट

Chou Tien Chen: ताइवान के 36 वर्षीय चाउ तिएन-चेन (Chou Tien Chen) ने वर्ल्ड बैडमिंटन चैम्प‍ियनश‍िप में इतिहास रच दिया. 36 साल 225 दिन की उम्र में वह पुरुष सिंगल्स में सबसे उम्रदराज मेडलिस्ट बने. कैंसर से जंग के बाद लौटे चाउ ने बिना मुख्य कोच के यह मुकाम हासिल किया. सेमीफाइनल में हार के बावजूद उनका ब्रॉन्ज और संघर्ष की कहानी बेहद खास रही.

Advertisement
X
सर से लौटे चाउ तिएन-चेन ने 36 की उम्र में जीता वर्ल्ड चैम्प‍ियनश‍िप ब्रॉन्ज (;ीवजव)
सर से लौटे चाउ तिएन-चेन ने 36 की उम्र में जीता वर्ल्ड चैम्प‍ियनश‍िप ब्रॉन्ज (;ीवजव)

उम्र 36 साल और 225 दिन है,  सामने है  11 साल छोटा खिलाड़ी... शरीर जवाब दे रहा था, लेकिन हौसला अब भी वैसा ही था. कैंसर को वो मात दे चुके हैं...

 यह कहानी ताइवान के दिग्गज बैडमिंटन खिलाड़ी चाउ तिएन-चेन (Chou Tien Chen) की है, ज‍िन्होंने नई दिल्ली में वर्ल्ड बैडमिंटन चैम्प‍ियनश‍िप (World Championships) में ऐसा इतिहास रचा, जो लंबे समय तक याद रखा जाएगा.

चाउ सेमीफाइनल तक पहुंचते ही पुरुष सिंगल्स के इतिहास में वर्ल्ड चैम्प‍ियनश‍िप के सबसे उम्रदराज मेडलिस्ट बन गए. हालांकि जापान के 25 वर्षीय कोडाई नाराओका के खिलाफ सेमीफाइनल में उन्हें 21-17, 11-21, 10-21 से हार मिली और फाइनल में पहुंचने का सपना टूट गया.

लेकिन उनका ब्रॉन्ज मेडल पक्का हो चुका था. यह चाउ का वर्ल्ड चैम्प‍ियनश‍िप में दूसरा ब्रॉन्ज मेडल है. इससे पहले उन्होंने 2022 में भी ब्रॉन्ज मेडल जीता था.

नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में खेले गए सेमीफाइनल में चाउ ने शुरुआत शानदार तरीके से की. पहले गेम में उन्होंने नाराओका को 21-17 से मात दी.

Advertisement

करीब 36 मिनट तक चले इस गेम में वह लगातार जापानी खिलाड़ी के साथ बने रहे और आखिर में नाराओका की गलतियों का फायदा उठाकर गेम अपने नाम किया.लेकिन इसके बाद मुकाबले की कहानी बदल गई. 11 साल छोटे नाराओका ने दूसरे गेम में तेजी दिखाई और 21-11 से इसे जीत लिया.

निर्णायक गेम में तो चाउ की मुश्किलें और बढ़ गईं. नाराओका ने शुरुआत में ही 4-0 की बढ़त बना ली. इसके बाद स्कोर 11-4 और फिर 17-5 हो गया. चाउ साफ तौर पर थके हुए नजर आए. एक रैली जीतने के बाद वह कोर्ट के किनारे कुछ पल के लिए झुककर बैठ गए और सांस संभालते दिखे.फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. 74 मिनट तक चले मुकाबले के बाद नाराओका ने निर्णायक गेम 21-10 से जीतकर फाइनल में जगह बना ली.

रिकॉर्ड तो चाउ पहले ही अपने नाम कर चुके थे
सेमीफाइनल में पहुंचना ही चाउ के लिए इतिहास बनाने के लिए काफी था. 36 साल 225 दिन की उम्र में वह वर्ल्ड चैम्प‍ियनश‍िप के पुरुष सिंगल्स में सबसे उम्रदराज मेडलिस्ट बन गए.इस टूर्नामेंट में सेमीफाइनल तक पहुंचने से पहले चाउ ने शुरुआती चार राउंड में एक भी गेम नहीं गंवाया था. क्वार्टर फाइनल में उन्होंने 21 साल के अल्वी फरहान को हराकर अंतिम चार में जगह बनाई थी.

Advertisement

चाउ के नाम 600 से ज्यादा इंटनेशनल जीत भी दर्ज हैं. वह ऐसे दौर में यह उपलब्धि हासिल कर रहे हैं, जब उनके आसपास खेलने वाले कई खिलाड़ी उनसे एक दशक या उससे ज्यादा छोटे हैं. वर्ल्ड चैम्प‍ियनश‍िप में पुरुष सिंगल्स का सबसे उम्रदराज गोल्ड मेडल जीतने का रिकॉर्ड हालांकि चीन के दिग्गज लिन डैन के नाम है. उन्होंने 2013 में 30 साल की उम्र में खिताब जीता था.

कैंसर से जंग के बाद कोर्ट पर कमबैक
चाउ की यह उपलब्धि सिर्फ एक बैडमिंटन मेडल की कहानी नहीं है. इसके पीछे बीमारी से लड़कर वापसी की पूरी कहानी है. अप्रैल 2023 में चाउ को गंभीर कोलोरेक्टल कैंसर (Colorectal Cancer) का पता चला था. उन्होंने इस बीमारी की बात सार्वजनिक रूप से ज्यादा सामने नहीं आने दी और सर्जरी कराई. इसके बाद उन्होंने कोर्ट पर वापसी की और फरवरी 2024 में थाईलैंड मास्टर्स का खिताब जीतकर अपने वापसी के इरादे साफ कर दिए.

उनकी फिटनेस और लगातार खुद को बेहतर करने की कोशिश इस पूरी यात्रा का अहम हिस्सा रही है. चाउ मानते हैं कि सफलता का कोई जादुई फॉर्मूला नहीं होता. बस शटल को कोर्ट में वापस भेजते रहना, ड्राइव लगाना और लगातार सीखते रहना जरूरी है. उनका नजरिया साफ है- जब तक आंखों में कोई सपना है, तब तक खेल में सुधार की गुंजाइश भी बनी रहती है.

Advertisement

कोच नहीं, फिजियो बनीं सबसे बड़ा सहारा
चाउ की इस यात्रा में उनकी फिजियोथेरेपिस्ट विक्टोरिया काओ (Victoria Kao) की भूमिका भी बेहद खास रही है. कोर्ट के किनारे बैठी काओ हर अंक पर उन्हें उत्साहित करती नजर आती हैं. चाउ अंक जीतते हैं तो वह तुरंत दोनों हाथ ऊपर उठा देती हैं. मुश्किल समय में भी उनके चेहरे की मुस्कान और सकारात्मकता कम नहीं होती.

सेमीफाइनल के दौरान जब चाउ थकने लगे, तब गेम के अंतराल में काओ तुरंत उनके पास पहुंचती थीं. चाउ ने 2019 में पारंपरिक मुख्य कोच के साथ काम करना छोड़कर अपनी रणनीति खुद तैयार करने का फैसला किया था. इसके बाद उनकी ट्रेनिंग और खेल की योजना में आत्मनिर्भरता बढ़ी. कोर्ट के किनारे काओ उनकी फिटनेस और मानसिक मजबूती में मदद करती रहीं.

विक्टोरिया के लिए चाउ का यह मेडल किसी रिकॉर्ड से ज्यादा बड़ी बात है. उनका मानना है कि चाउ के पास अब भी कोर्ट पर बने रहने और खेलने का मौका है, यही सबसे बड़ी खुशी है.

चाउ का खेल उम्र नहीं, सोच से चलता है
चाउ कभी भी अपने दमदार शरीर या सिर्फ ताकत के बूते पर खेलने वाले खिलाड़ी नहीं रहे. उनकी असली ताकत रणनीति, डिफेंस, गति में बदलाव और शटल पर चालाकी से विपक्षी को फंसाने में रही है.

Advertisement

यही शायद चाउ तिएन-चेन की पूरी कहानी है. शरीर की उम्र 36 साल हो सकती है, लेकिन कोर्ट पर आगे बढ़ने की उनकी सोच अब भी यंग है. कैंसर से वापसी, बिना मुख्य कोच के तैयारी, 600 से ज्यादा इंटरनेशनल  जीत और अब वर्ल्ड चैम्प‍ियनश‍िप का ऐतिहासिक ब्रॉन्ज- चाउ ने साबित किया है कि कभी-कभी खेल में सबसे बड़ी ताकत शरीर नहीं, बल्कि आगे बढ़ते रहने का जुनून होता है.


 

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement