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वैभव सूर्यवंशी के लिए चयन में न्याय मत खोजिए... कहीं अगला सचिन इंतजार करता न रह जाए

वैभव सूर्यवंशी को टीम इंडिया में मौका मिले या नहीं, यह बहस सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं है. असली सवाल यह है कि टीम का चयन 'न्याय' के आधार पर होना चाहिए या भविष्य की जरूरत के हिसाब से.

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कठोर है टीम इंडिया का दरवाजा... (Photo, Getty)
कठोर है टीम इंडिया का दरवाजा... (Photo, Getty)

भारतीय क्रिकेट इस समय एक ऐसी समस्या से जूझ रहा है, जिसके लिए दुनिया की ज्यादातर टीमें तरसती हैं. यहां चिंता यह नहीं है कि ओपनर कौन होगा, बल्कि यह है कि जिसने रन बनाए हैं, उसे बाहर कैसे किया जाए और इस बहस के केंद्र में है एक 15 साल का लड़का- वैभव सूर्यवंशी.

जितनी तेजी से वैभव ने क्रिकेट की दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है, उतनी ही तेजी से एक नैतिक बहस भी खड़ी हो गई है. क्या संजू सैमसन, अभिषेक शर्मा या ईशान किशन जैसे बल्लेबाजों में से किसी को सिर्फ इसलिए बाहर कर देना चाहिए कि एक असाधारण प्रतिभा दरवाजा खटखटा रही है?

पहली नजर में जवाब होगा- नहीं. लेकिन पहली नजर अक्सर क्रिकेट में भी धोखा देती है.

बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक का कहना है कि जो बल्लेबाज लगातार रन बना रहा हो, उसे सिर्फ किसी नए खिलाड़ी को मौका देने के लिए बाहर करना सही नहीं होगा. यह बात सुनने में बिल्कुल उचित लगती है. आखिर मेहनत का इनाम मिलना ही चाहिए.

लेकिन भारतीय टीम का चयन पुरस्कार वितरण समारोह नहीं है. यहां मेडल नहीं बांटे जाते, यहां अगला मैच जिताने वाली टीम चुनी जाती है. यही वजह है कि चयन का पहला नियम है- यह कभी पूरी तरह न्यायसंगत नहीं हो सकता.

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हर चयन के साथ किसी न किसी योग्य खिलाड़ी के साथ 'अन्याय' होता है. अगर चयन का पैमाना केवल न्याय होता, तो शायद किसी नए खिलाड़ी को कभी मौका ही नहीं मिलता. तब विराट कोहली भी किसी सीनियर का इंतजार कर रहे होते, जसप्रीत बुमराह भी घरेलू क्रिकेट में और विकेट लेने भेज दिए जाते, और शायद 16 साल का सचिन तेंदुलकर भी कराची जाने की बजाय मुंबई में अगला रणजी मैच खेल रहा होता.

राष्ट्रीय टीम में पिछली पारियों का सम्मान मिलता है, अगली जगह की गारंटी नहीं. यहां हर नई प्रतिभा किसी पुराने खिलाड़ी की कुर्सी के सामने आकर खड़ी होती है. सच कहें तो, चयन का दूसरा नाम ही निर्दयता है.

इसका मतलब यह नहीं कि बाहर होने वाला खिलाड़ी खराब है. विश्व कप जिताने वाले कप्तान सूर्यकुमार यादव भी अगली टीम से बाहर हो सकते हैं. इससे उनकी क्षमता कम नहीं हो जाती, सिर्फ इतना पता चलता है कि चयनकर्ताओं को उस वक्त किसी दूसरे खिलाड़ी में टीम के लिए ज्यादा संभावना दिखी.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में जगह बचाने का सबसे बड़ा तरीका रन बनाना है. लेकिन कभी-कभी सामने वाला खिलाड़ी सिर्फ रन नहीं, भविष्य लेकर आता है.

वैभव सूर्यवंशी की चर्चा इसलिए अलग है क्योंकि वह सिर्फ रन नहीं बना रहे, वह धारणाएं बदल रहे हैं. भारतीय क्रिकेट हर साल कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी पैदा करता है, लेकिन हर प्रतिभा के बारे में यह नहीं कहा जाता कि वह 15 साल की उम्र में ही दुनिया के सबसे तेज गेंदबाजों का सामना कर सकती है.

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जोफ्रा आर्चर नेट्स में प्रभावित होते हैं. पैट कमिंस और मिचेल स्टार्क जैसे गेंदबाज उन्हें हल्के में नहीं लेते. ऐसे संकेत रोज नहीं मिलते. क्रिकेट इतिहास में ऐसी प्रतिभाएं कैलेंडर देखकर जन्म नहीं लेतीं.

इसका मतलब यह नहीं कि वैभव को अगला मैच हर हाल में खिला दिया जाए. टीम प्रबंधन रोज उन्हें देख रहा है. उनकी तैयारी, मानसिकता और तकनीक का आकलन वही सबसे बेहतर कर सकता है. लेकिन एक बात जरूर तय होनी चाहिए- फैसले की कसौटी 'किसके साथ अन्याय होगा?' नहीं हो सकती.

हां, इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही मजबूत है...

अगर कोई बल्लेबाज लगातार टीम के लिए निडर होकर खेल रहा है, जोखिम उठा रहा है और रन भी बना रहा है, फिर भी उसकी जगह सुरक्षित नहीं रहती, तो ड्रेसिंग रूम में एक खतरनाक संदेश जाता है. खिलाड़ी टीम के लिए कम और अपनी जगह बचाने के लिए ज्यादा खेलने लगते हैं. अगर खिलाड़ी को लगने लगे कि रन बनाने के बाद भी जगह पक्की नहीं है, तो अगली बार वह टीम के लिए नहीं, अपनी जगह बचाने के लिए खेलेगा. भारत ने पिछले कुछ वर्षों में टी20 क्रिकेट में जिस बेखौफ बल्लेबाजी संस्कृति को अपनाया है, उसकी सबसे बड़ी ताकत यही है कि खिलाड़ी असफल होने के डर से मुक्त होकर खेलते हैं. उस भरोसे को टूटने नहीं देना भी टीम प्रबंधन की जिम्मेदारी है.

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यहीं कप्तान और कोच की असली परीक्षा होती है. उन्हें सिर्फ सही टीम नहीं चुननी होती, बल्कि बाहर बैठे खिलाड़ियों का भरोसा भी बनाए रखना होता है.

फिर भी एक सवाल बचता है...

अगर भारतीय टीम सचमुच मानती है कि वैभव सूर्यवंशी 2027 के वनडे विश्व कप की योजना का हिस्सा बन सकते हैं, तो तैयारी 2027 में नहीं, 2026 में शुरू होगी. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट किताब पढ़कर नहीं सीखा जाता. उसके लिए मैदान पर उतरना पड़ता है, गलतियां करनी पड़ती हैं और उनसे सीखना पड़ता है.

यही वजह है कि वैभव के मामले में सबसे बड़ी गलती जल्दबाजी नहीं, बल्कि जरूरत से ज्यादा सावधानी भी हो सकती है. इतिहास की सबसे बड़ी भूल गलत खिलाड़ी चुन लेना नहीं होती. सबसे बड़ी भूल सही खिलाड़ी को बहुत देर से पहचानना होती है. भारतीय क्रिकेट के सामने आज असली सवाल यह नहीं है कि वैभव सूर्यवंशी का डेब्यू कब होगा.

... सवाल यह है कि चयनकर्ता इतिहास के आने का इंतजार करेंगे या इतिहास को समय रहते पहचान लेंगे. क्योंकि कुछ खिलाड़ी टीम में जगह मांगते हैं. और कुछ खिलाड़ी ऐसे होते हैं, जिनके लिए टीम को अपनी जगह बनानी पड़ती है.

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