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7 हार, एक जैसी गलती! विदेशी पिचों पर टीम इंडिया का 'ऑलराउंडर फॉर्मूला' पूरी तरह फ्लॉप, सेलेक्शन पर उठे सवाल

कार्डिफ वनडे में भारतीय टीम को इंग्लैंड के हाथों 4 विकेट से हार झेलनी पड़ी. 26 जून से अब तक भारतीय टीम अपने पिछले 9 इंटरनेशनल मुकाबलों में से 7 में हार झेल चुकी है. लगातार खराब प्रदर्शन के बाद अब सवाल सिर्फ खिलाड़ियों पर नहीं हैं, टीम मैनेजमेंट और सेलेक्टर्स की भी आलोचना हो रही है.

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भारतीय टीम के ऑलराउंडर्स कार्डिफ ODI में फ्लॉप साबित हुए. (Photo: BCCI)
भारतीय टीम के ऑलराउंडर्स कार्डिफ ODI में फ्लॉप साबित हुए. (Photo: BCCI)

यूरोप दौरे पर टीम इंडिया की लगातार नाकामी ने सिर्फ खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर ही नहीं, बल्कि टीम सेलेक्शन और मैनेजमेंट की सोच पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. पिछले नौ इंटरनेशनल मुकाबलों में से सात में हार झेल चुकी भारतीय टीम की सबसे बड़ी कमजोरी अब साफ नजर आने लगी है. विदेशी परिस्थितियों में अतिरिक्त बल्लेबाज की जगह ऑलराउंडरों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा भारत को लगातार भारी पड़ रहा है.

भारतीय क्रिकेट की पहचान हमेशा मजबूत बल्लेबाजी रही है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि इंग्लैंड जैसे दौरे पर टीम इंडिया के वनडे स्क्वॉड में एक भी अतिरिक्त विशेषज्ञ बल्लेबाज मौजूद नहीं है. इसके बजाय टीम मैनेजमेंट ने ऐसे ऑलराउंडरों पर भरोसा जताया, जो ना तो बल्ले से मैच फिनिश कर पा रहे हैं और न ही गेंद से बड़ा असर छोड़ पा रहे हैं.

सुंदर-शिवम का रोल समझ से परे!
इस पूरे मामले में अक्षर पटेल को आलोचना से अलग रखा जा सकता है. उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में तीनों फॉर्मेट में खुद को साबित किया है. लेकिन वॉशिंगटन सुंदर और शिवम दुबे लगातार उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए हैं. अगर हार्दिक पंड्या फिट होकर टीम का हिस्सा होते तो शायद इन दोनों में से किसी एक को भी प्लेइंग इलेवन में जगह नहीं मिलती. यही बात अब टीम चयन पर सवाल खड़े कर रही है.

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कार्डिफ वनडे में भारत मजबूत स्थिति में था. 32वें ओवर में विराट कोहली के 65 रनों के निजी पर आउट होने तक टीम का स्कोर 178/4 था. उस समय ऐसा लग रहा था कि भारत आसानी से 300 रनों तक पहुंच जाएगा. लेकिन इसके बाद पूरी बल्लेबाजी बिखर गई. वॉशिंगटन सुंदर, अक्षर पटेल और शिवम दुबे जैसे ऑलराउंडर तेज गेंदबाजों के सामने टिक नहीं सके. नतीजा यह हुआ कि पूरी टीम 44 ओवर में सिर्फ 233 रनों पर सिमट गई. यही वह दौर था, जिसने मैच इंग्लैंड की झोली में डाल दिया.
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कार्डिफ की पिच पर जोफ्रा आर्चर और साकिब महमूद ने भारतीय मिडिल ऑर्डर की तकनीक की परीक्षा ली और बल्लेबाज उसमें फेल साबित हुए. वॉशिंगटन सुंदर हैमस्ट्रिंग में खिंचाव के बाद शॉर्ट गेंद पर विकेटकीपर जोस बटलर को कैच दे बैठे. अक्षर पटेल ने आर्चर की बाउंसर पर अपर कट खेलने की कोशिश की और विकेट गंवा दिया. शिवम दुबे बिना खाता खोले कॉट एंड बोल्ड हो गए. तीनों बल्लेबाज उस समय टिककर पारी संभालने में नाकाम रहे, जब टीम को सबसे ज्यादा जरूरत थी.
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सबसे ज्यादा सवाल शिवम दुबे के चयन पर उठ रहे हैं. दिसंबर 2019 में ओडीआई डेब्यू करने वाले दुबे ने अब तक गिने-चुने मुकाबले खेले हैं, लेकिन फिर भी उन्हें दोनों मैचों में प्लेइंग इलेवन में मौका मिला. दूसरे वनडे इंटरनेशनल में वह शून्य पर आउट हुए और गेंदबाजी में भी छह ओवर डालने के बावजूद कोई प्रभाव नहीं छोड़ सके. टी20 क्रिकेट में उपयोगी साबित होने वाले दुबे अब तक वनडे प्रारूप में खुद को स्थापित नहीं कर पाए हैं.

भारत ने अतिरिक्त बल्लेबाज क्यों नहीं चुना?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि विदेशी दौरे पर भारत ने एक अतिरिक्त विशेषज्ञ बल्लेबाज क्यों नहीं चुना? इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, साउथ अफ्रीका और न्यूजीलैंड जैसी परिस्थितियों में बल्लेबाजी करना हमेशा कठिन माना जाता है. जब विशेषज्ञ बल्लेबाज भी संघर्ष करते हैं, तब ऐसे खिलाड़ियों पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो जाता है, जिनकी बल्लेबाजी उनकी मुख्य पहचान नहीं है. टीम में एक अतिरिक्त बल्लेबाज होता तो विराट कोहली के आउट होने के बाद पारी को संभालने का विकल्प मौजूद रहता. लेकिन भारत के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं था.

भारत ने पिछले दो वर्षों में व्हाइट-बॉल क्रिकेट में बड़ी सफलताएं हासिल की हैं. टी20 वर्ल्ड कप 2024, चैम्पियंस ट्रॉफी 2025 और टी20 वर्ल्ड कप 2026 जीतने के बाद शायद टीम मैनेजमेंट को अपने कॉम्बिनेशन पर जरूरत से ज्यादा भरोसा हो गया. लेकिन इंग्लैंड की परिस्थितियों ने साफ कर दिया कि घरेलू या धीमी पिचों पर सफल रहने वाला फॉर्मूला विदेश में हमेशा काम नहीं करता.

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चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट को भी जवाब देना होगा कि आखिर विदेशी दौरे के लिए टीम बनाते समय विशेषज्ञ बल्लेबाजों की जगह ऑलराउंडरों पर इतना बड़ा दांव क्यों लगाया गया. अगर यही रणनीति जारी रही, तो विदेशी सरजमीं पर टीम इंडिया की मुश्किलें खत्म होने की बजाय और बढ़ सकती हैं.

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