इंसानों की तरह चिंपैंजी भी अपने इलाके और सामाजिक माहौल के हिसाब से बातचीत का अलग अंदाज विकसित कर सकते हैं. एक नई रिसर्च में सामने आया है कि चिंपैंजी के हंसने, गुर्राने और धीमी आवाज में रोने जैसे स्वर जन्म से पूरी तरह तय नहीं होते, बल्कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनमें बदलाव आता है. यही बदलाव अलग-अलग समूहों में अलग ‘वोकल पैटर्न’ या कहें तो ‘डायलेक्ट’ पैदा कर सकता है. यानी कि चिंपैंजी की नई पीढ़ियां बाकयदा एक 'बोली' विकसित कर सकती हैं.
यह अध्ययन PLOS One जर्नल में प्रकाशित हुआ है. शोधकर्ताओं ने जाम्बिया के Chimfunshi Wildlife Orphanage और तंजानिया के Gombe National Park में रहने वाले चिंपैंजी के बच्चों और बड़े हो रहे चिंपैंजियों की आवाजों का अध्ययन किया. दोनों आबादियां भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से अलग हैं.
शोधकर्ताओं ने पाया कि दोनों जगहों के चिंपैंजी की अलग-अलग तरह की आवाजों में अंतर पहचाना जा सकता है. इसका मतलब है कि चिंपैंजी जिस तरह की आवाजें निकालते हैं वो आबादी के हिसाब से अलग-अलग ‘डायलेक्ट’ मौजूद हो सकते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि उम्र बढ़ने के साथ यह अंतर और स्पष्ट होता गया. यानी चिंपैंजी का संवाद करने का तरीका केवल उनके जीन से तय नहीं होता, बल्कि बचपन से लेकर किशोरावस्था तक उनके आसपास के सामाजिक और पर्यावरण के माहौल से भी प्रभावित होता है. यानी उनके अंदर सीखने और उसे एडॉप्ट करने की क्षमता होती है.
अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता और क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन की डॉक्टोरल रिसर्चर कासांद्रा गिरागोसियन ने कहा कि "शुरुआती जीवन में बातचीत का तरीका कैसे विकसित होता है, इसे समझना जानवरों के व्यवहार को समझने के लिए ज़रूरी है. हमारी स्टडी से पता चलता है कि चिंपैंज़ी की आवाज़ें जन्म से ही फिक्स्ड नहीं होतीं, बल्कि जैसे-जैसे युवा जानवर अपने सामाजिक और पर्यावरण के माहौल के साथ घुलते-मिलते हैं, वे विकसित होती रहती हैं."
शोधकर्ताओं के मुताबिक मजेदार बात यह है कि इंसानों में भी यही प्रक्रिया देखने को मिलती है. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले बच्चे भाषा तो एक जैसी सीख सकते हैं, लेकिन उनके बोलने के लहजे और उच्चारण पर उनके आसपास का क्षेत्र और सामाजिक वातावरण असर डालता है. इसी तरह चिंपैंजी के अलग-अलग समुदायों में भी आवाज निकालने का अंदाज थोड़ा अलग हो सकता है.
रिसर्च में यह भी पाया गया कि कुछ आबादी-विशिष्ट आवाजों की विशेषताएं चिंपैंजी के शैशवकाल में ही दिखाई देने लगती हैं, जबकि कुछ अंतर किशोरावस्था में विकसित होते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन उस पुरानी धारणा को चुनौती देता है कि प्राइमेट्स की आवाजें पूरी तरह आनुवंशिक और जन्म से निर्धारित होती हैं. इसके बजाय चिंपैंजी का संचार तंत्र लचीला और लगातार विकसित होने वाला नजर आता है.