मई महीने की शुरुआत के साथ ही उत्तर भारत के कई हिस्सों में छिटपुट बारिश और बादलों की आवाजाही ने लोगों को झुलसाने वाली गर्मी से राहत दी थी. लेकिन 9 मई के बाद अब मौसम एक बार फिर अपनी चाल बदलने वाला है. मौसम विभाग (IMD) और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की हालिया रिपोर्ट्स ने एक बड़ा अलर्ट जारी किया है.
ठंडी हवाओं का दौर अब खत्म हो रहा है. इसकी जगह सुपर अल-नीनो का खतरा मंडराने लगा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि साल 2026 के मध्य में यह प्राकृतिक घटना न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया के तापमान को रिकॉर्ड स्तर पर ले जा सकती है. यह बदलाव केवल कुछ दिनों की गर्मी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले मानसून और खेती-किसानी के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है.
यह भी पढ़ें: दुनिया के सबसे बड़े मौसम वैज्ञानिक की भविष्यवाणी- 2026 होगा सबसे गर्म
क्या है सुपर अल नीनो और यह क्यों है खतरनाक?
प्रशांत महासागर के गर्म होने की घटना को अल-नीनो कहा जाता है, लेकिन जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से बहुत अधिक (लगभग 2°C से ऊपर) बढ़ जाता है, तो इसे सुपर अल-नीनो कहा जाता है. Zero Carbon Analytics की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2026 का अल-नीनो पिछले 140 वर्षों में सबसे शक्तिशाली हो सकता है.

यह घटना वायुमंडल में भारी गर्मी पैदा करती है, जिससे बारिश के पैटर्न में बदलाव आता है. विशेषज्ञों का कहना है कि जब अल-नीनो सक्रिय होता है, तो भारत में मानसून कमजोर पड़ने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. 9 मई के बाद जैसे-जैसे सूरज तपेगा, अल-नीनो की यह सक्रियता तापमान में अचानक उछाल ला सकती है.
IMD और विशेषज्ञों की चेतावनी: मई में गर्मी और बारिश का खतरनाक मेल
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अपने मई 2026 के पूर्वानुमान में बताया है कि हालांकि देश के कई हिस्सों में बारिश की वजह से अधिकतम तापमान सामान्य से कम रह सकता है, लेकिन कुछ राज्यों में भीषण हीटवेव (Loo) का खतरा भी बना हुआ है. गुजरात, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ इलाकों में रात के तापमान में भी बढ़ोतरी देखी जाएगी.
यह भी पढ़ें: इस बार सबसे ज्यादा ओले पड़ने की घटनाएं हो रही हैं यूपी-बिहार में, साइंटिफिकली जानिए ओले क्यों पड़ते हैं
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी अलर्ट जारी किया है कि मई से जुलाई 2026 के बीच अल-नीनो के पूरी तरह सक्रिय होने की 61% संभावना है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव इतनी तेजी से होगा कि लोगों को संभलने का मौका भी नहीं मिलेगा, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं.
मानसून पर मंडराता खतरा और कृषि क्षेत्र की चिंता
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता मानसून को लेकर है. डाउन टू अर्थ (Down To Earth) की एक हालिया स्टडी में बताया गया है कि अल-नीनो के कारण साल 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रह सकता है. वैज्ञानिकों का तर्क है कि प्रशांत महासागर में बढ़ती गर्मी भारतीय मानसून की हवाओं को कमजोर कर देती है.

यदि ऐसा होता है, तो खरीफ की फसलों, विशेषकर धान और गन्ने की खेती पर इसका सीधा असर पड़ेगा. विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसानों को जल संरक्षण की दिशा में अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए, क्योंकि अल नीनो का असर मानसून के अंत तक बना रह सकता है.
ग्लोबल वार्मिंग और सुपर अल-नीनो की जुगलबंदी
जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि सुपर अल-नीनो का खतरा इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पृथ्वी पहले से ही गर्म है. NOAA और NASA के विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक तापमान पहले ही 1.5°C के करीब पहुंच रहा है और अल-नीनो इसमें 0.2°C की अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है.
यह भी पढ़ें: खत्म हो जाएगी नस्ल... न इंसान बच्चा पैदा कर पाएगा, न जानवर, वैज्ञानिकों ने दी साइलेंट फर्टिलिटी क्राइसिस की चेतावनी
इसका मतलब है कि 2026 इतिहास का सबसे गर्म साल साबित हो सकता है. 9 मई के बाद जो मौसम पलटी मारेगा, वह इसी व्यापक वैश्विक बदलाव का एक हिस्सा है. आने वाले दिनों में हमें केवल गर्मी ही नहीं, बल्कि अप्रत्याशित तूफान और बेमौसम बारिश जैसे चरम मौसम के लिए भी तैयार रहना होगा.