scorecardresearch
 

Pitra Paksha 2026: मलिनषोडशी क्रिया क्या है? जानें छोटे बच्चों का श्राद्ध करना चाहिए या नहीं

गरुड़ पुराण के अनुसार, श्राद्धकर्म उम्र के हिसाब से तीन अलग-अलग हिस्सों में बंटे हैं. पहला, अजन्मे बच्चों का श्राद्ध नहीं किया जाता है. जिन बच्चों की मृत्यु जन्म के बाद 2 वर्ष के अंतराल में हो जाती है, उनका श्राद्ध भी नहीं किया जाता है. यदि 2 वर्ष से लेकर 6 वर्ष की आयु के किसी बच्चे की मृत्यु हो जाए तो इसका भी पारपंरिक श्राद्ध नहीं किया जाता है. लेकिन इस आयु वर्ग के बच्चों की मौत के बाद मलिनषोडशी परंपरा के तहत संस्कार करना चाहिए.

Advertisement
X
श्राद्धकर्म उम्र के हिसाब से तीन अलग-अलग हिस्सों में बंटा है. (Photo: ITG)
श्राद्धकर्म उम्र के हिसाब से तीन अलग-अलग हिस्सों में बंटा है. (Photo: ITG)

पितृपक्ष चल रहा है. इस साल पितृपक्ष 26 सितंबर से लेकर 10 अक्टूबर तक रहने वाला है. इस पवित्र अवधि में लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए उनका श्राद्ध करते हैं. इसमें पितरों के निमित्त पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य किया जाता है. अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या छोटे बच्चे या अजन्मे बच्चों का श्राद्ध करना चाहिए या नहीं. आइए आज आपको इस बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं.

गरुड़ पुराण के अनुसार, श्राद्धकर्म उम्र के हिसाब से तीन अलग-अलग हिस्सों में बंटा है. पहला, अजन्मे बच्चों का श्राद्ध नहीं किया जाता है. यानी अगर गर्भावस्था के दौरान ही संतान की मृत्यु हो जाए, तो उसका पारंपरिक श्राद्ध नहीं किया जाता है. इसके अलावा जिन बच्चों की मृत्यु जन्म के बाद 2 वर्ष के अंतराल में हो जाती है, उनका श्राद्ध भी नहीं किया जाता है.

दूसरा, यदि 2 वर्ष से लेकर 6 वर्ष की आयु के किसी बच्चे की मृत्यु हो जाए तो इसका भी पारपंरिक श्राद्ध नहीं किया जाता है. लेकिन इस आयु वर्ग के बच्चों की मौत के बाद मलिनषोडशी परंपरा के तहत संस्कार करना चाहिए. 6 साल की आयु के बाद  ही मलिनषोडशी, पिंडदान आदि क्रियाएं करनी चाहिए.

मलिनषोडशी क्रिया क्या है?
गरुड़ पुराण के अनुसार, मलिनषोडशी क्रिया 2 से 6 साल की उम्र वाले बच्चों की मृत्यु के बाद की जाती है. यह प्रक्रिया करीब 10 दिन तक चलती है, जिसे दशगात्र भी कहा जाता है. इसमें प्रेत योनि से मुक्ति और शरीर के निर्माण के लिए कुल 16 पिंड अर्पित किए जाते हैं. मृत्यु के समय से लेकर श्मशान यात्रा और अस्थि संचय तक कुल 6 पिंड अर्पित किए जाते हैं. इसके बाद दशगात्र क्रिया शुरू होती है. इसमें मृत्यु के दिन से अगले 10 दिन तक रोज एक-एक पिंड अर्पित किया जाता है. यह पिंड जौ के आटे या चावल, काले तिल, दूध, घी और शहद से मिलाकर बनाए जाते हैं. 

Advertisement

पितृपक्ष 2026 का कैलेंडर
पूर्णिमा श्राद्धा- 26 सितंबर 2026, शनिवार
प्रतिपदा तिथि श्राद्ध- 27 सितंबर 2026, रविवार
द्वितीया श्राद्ध- 28 सितंबर 2026, सोमवार
तृतीया श्राद्ध- 29 सितंबर 2026, मंगलवार
चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध- 30 सितंबर 2026, बुधवार
षष्ठी तिथि का श्राद्ध- 1 अक्टूबर 2026, गुरुवार
सप्तमी तिथि का श्राद्ध- 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
अष्टमी तिथि का श्राद्ध- 3 अक्टूबर 2026, शनिवार
नवमी तिथि का श्राद्ध- 4 अक्टूबर 2026, रविवार
दशमी तिथि का श्राद्ध- 5 अक्टूबर 2026, सोमवार
एकादशी तिथि का श्राद्ध- 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार
द्वादशी तिथि का श्राद्ध- 7 अक्टूबर 2026, बुधवार
मघा तिथि का श्राद्ध- 7 अक्टूबर 2026, बुधवार
त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध- 8 अक्टूबर 2026, गुरुवार
चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध- 9 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
सर्वपितृ अमावस्या-10 अक्टूबर 2026, शनिवार

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement