
Independence Day: 'उन्होंने ये क्या कर दिया! क्या कर दिया उन्होंने!' कलकत्ता के ज्योतिषी स्वामी मदनानंद हैरानी में बार-बार यही बात कह रहे थे. कुछ ही देर पहले उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो (AIR) पर ब्रिटिश भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की प्रेस कॉन्फ्रेंस सुनी थी. यह 4 जून 1947 का दिन था. माउंटबेटन ने ऐलान किया था कि ब्रिटिश सरकार 15 अगस्त 1947 को भारत की सत्ता भारतीयों को सौंप देगी.
देश के लोगों को इस पल का कई सालों से इंतजार था. आखिरकार अंग्रेज भारत छोड़कर जाने वाले थे. पहले इसका समय जून 1948 तय किया गया था, लेकिन फिर इसे बदलकर अगस्त 1947 कर दिया गया था. अब भारत को आजादी मिलने की तारीख पूरी तरह से तय हो चुकी थी.
लेकिन, स्वामी मदनानंद इस खबर को सुनकर बिल्कुल भी खुश नहीं थे. उनके लिए यह तिथि सिर्फ कैलेंडर पर लिखी हुई तारीख नहीं थी, बल्कि इसका संबंध ग्रह-नक्षत्रों से भी था. इसलिए उन्होंने तुरंत ज्योतिष गणनाओं का आकलन किया. और जो कुछ उन्होंने देखा, उसे लेकर वह बेहद परेशान हो गए थे. दरअसल, ग्रह नक्षत्र के नजरिए से 15 अगस्त का दिन बहुत ही खराब संकेत दे रहा था.
जैसे-जैसे भारत के स्वतंत्रता दिवस की खबर फैलने लगी, कलकत्ता, बनारस और दक्षिण भारत के कुछ ज्योतिषियों ने इस तारीख की कुंडली देखनी शुरू की. 15 अगस्त 1947 को शुक्रवार था. ज्योतिषियों ने कुंडलियां बनाईं, ग्रहों की स्थिति देखी और यह जानने की कोशिश की कि जिस समय भारत आजाद होगा, उस समय ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति कैसी होगी.
इस तारीख को लेकर सभी ज्योतिषियों का निष्कर्ष चिंता बढ़ाने वाला था. उनके अनुसार, जिस दिन भारत आजाद होगा, वह तारीख अशुभ है. हालांकि, राजनेताओं ने आजादी की तारीख तय कर दी थी, इसलिए अब उसे बदलना संभव नहीं था. लेकिन अब ज्योतिषियों के सामने एक सवाल खड़ा था कि क्या आजादी का वक्त बदला जा सकता है? तारीख तो 15 अगस्त ही रहेगी, लेकिन शायद वह समय बदला जा सकता है, जब भारत को स्वतंत्रता मिलेगी.
15 अगस्त 2026 यानी आज भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. आइए फिर लौटते हैं 15 अगस्त 1947 से पहले के उन दिनों में जब ज्योतिषियों ने यह कहा था कि भारत की आजादी के लिए चुनी गई तारीख शुभ नहीं है, तो ऐसी स्थिति में एक ऐसा रास्ता निकालना जरूरी था, जिससे लोगों की चिंता दूर हो सके. इसी बीच भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शब्द इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गए थे. जिसमें उन्होंने आधी रात में भारत की आजादी को लेकर भाषण देते हुए कहा था कि, 'जब पूरी दुनिया सो रही होगी, तब आधी रात में भारत जीवन और स्वतंत्रता की नई सुबह देखेगा.'
इस ऐतिहासिक पंक्ति को सुनकर यह सवाल भी मन में उठता है कि क्यों आधी रात में ही भारत को आजादी मिली थी? आखिर उस वक्त वास्तव में क्या हुआ था? चलिए जानते हैं इससे जुड़ी पूरी कहानी.
जब माउंटबेटन और भारतीय नेताओं ने की थी बंटवारे की घोषणा
1947 की गर्मियों तक ब्रिटेन यह मान चुका था कि अब भारत पर उसका शासन ज्यादा समय तक नहीं चलेगा. अब लंदन के सामने सवाल यह नहीं था कि भारत से जाना है या नहीं, बल्कि यह था कि देश में हालात और ज्यादा बिगड़ने से पहले ब्रिटिशर्स भारत से कैसे और कब बाहर निकले.
फ्रांसीसी लेखक डोमिनिक लापिएर और अमेरिकी पत्रकार लैरी कॉलिन्स ने अपनी किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट’ में आजादी से पहले के आखिरी महीनों के माहौल को विस्तार से बताया है. उनके मुताबिक, कई दशकों के स्वतंत्रता आंदोलन के बाद ब्रिटेन के सामने अब भारत छोड़ने का फैसला लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. ब्रिटेन चाहता था कि वह इतिहास और सशस्त्र विद्रोह के दबाव में मजबूर होकर भारत से बाहर निकले, उससे पहले ही सम्मान के साथ भारत छोड़ दे. भारत को सत्ता सौंपने का फैसला हो चुका था, लेकिन जब लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत की जिम्मेदारी संभाली, तब तक देश बंटने और बिगड़ने की स्थिति में पहुंच चुका था.
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई थी. कांग्रेस एक अखंड भारत चाहती थी, जबकि मोहम्मद अली जिन्ना का मानना था कि अब समझौते का समय निकल चुका है. 'फ्रीडम एट मिडनाइट' के अनुसार, जिन्ना एक 'सर्जिकल ऑपरेशन' चाहते थे और उनके हिसाब से ये बंटवारा ही था.

3 जून 1947 को माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और बलदेव सिंह ने ऑल इंडिया रेडियो (AIR) पर देश को संबोधित किया था. माउंटबेटन योजना में बताया गया था कि भारत को दो हिस्सों में बांटा जाएगा, भारत और पाकिस्तान. साथ ही, सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया जून 1948 की तय समयसीमा से कई महीने पहले पूरी करने की बात कही गई थी.
लेकिन, 3 जून को माउंटबेटन ने जो घोषणा की थी, कहानी वहीं खत्म नहीं हुई थी. अगले ही दिन उन्होंने अचानक एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई थी. इसके बाद जो ऐलान हुआ, उसने सभी को हैरान कर दिया, यहां तक कि उन लोगों को भी जो बातचीत और घटनाक्रम पर नजर रख रहे थे. ब्रिटेन अब जून 1948 तक इंतजार नहीं करने वाला था. माउंटबेटन ने 15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण की निश्चित तारीख घोषित कर दी थी.
भारतीयों को पहले से पता था कि अंग्रेज भारत छोड़ने वाले हैं. अब उन्हें यह भी पता चल गया था कि अंग्रेज आखिर किस दिन भारत छोड़ेंगे. आजादी में अब सिर्फ करीब 10 हफ्ते बचे थे. यह वह पल था जिसका भारत के लोग वर्षों से इंतजार कर रहे थे. लेकिन दिल्ली के राजनीतिक गलियारों से दूर कुछ लोग इस तारीख को लेकर चिंतित होने लगे थे. ज्योतिषियों ने माउंटबेटन की चुनी हुई तारीख की कुंडली देखनी शुरू की. और उनके अनुसार, 15 अगस्त 1947 की तारीख बिल्कुल भी शुभ नहीं थी.
ज्योतिषियों का विद्रोह
'फ्रीडम एट मिडनाइट' के मुताबिक, माउंटबेटन के इस फैसले को भारत की एक परंपरा के खिलाफ बताया है. माउंटबेटन ने 15 अगस्त की तारीख तय करने से पहले भारत के प्रमुख ज्योतिषियों से सलाह नहीं ली थी. दरअसल, भारत में लंबे समय से किसी बड़े और नए काम की शुरुआत से पहले ज्योतिषियों से शुभ समय और तारीख के बारे में सलाह लेने की परंपरा रही है. किताब में बताया गया है कि ज्योतिषियों ने सप्ताह के कुछ दिनों को शुभ और कुछ दिनों को अशुभ माना था.
माउंटबेटन की चुनी हुई तारीख चिंता बढ़ाने वाली थी. रविवार और शुक्रवार को अशुभ दिन माना जाता था और 15 अगस्त 1947 को शुक्रवार था. माउंटबेटन की घोषणा के तुरंत बाद देशभर के ज्योतिषियों ने इस तारीख को ग्रह-नक्षत्रों से जोड़ना शुरू कर दिया था. वे यह जानने की कोशिश करने लगे थे कि 15 अगस्त को भारत की आजादी का देश के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?
जैसे ही रेडियो पर माउंटबेटन की ओर से 15 अगस्त की तारीख का ऐलान हुआ, देशभर के ज्योतिषियों ने गणनाएं देखनी शुरू कर दी थीं. बनारस और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में ज्योतिषियों की ओर से सबसे ज्यादा प्रतिक्रियाएं आ रही थीं. उनका मानना था कि यह तारीख इतनी अशुभ है कि भारत के लिए एक दिन और अंग्रेजों के अधीन रहना बेहतर होगा, बजाय इसके कि इतनी अशुभ तारीख पर देश आजाद हो.
वहीं, कलकत्ता में स्वामी मदनानंद ने भी तुरंत अपनी ज्योतिषीय गणनाएं देखनी शुरू कर दी थीं. उनके सामने सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों, राशियों और 27 नक्षत्रों की स्थिति से जुड़ी गणनाएं थीं. उन्होंने 15 अगस्त की तारीख को ध्यान में रखकर यह देखना शुरू किया कि उस समय ग्रह-नक्षत्र भारत के लिए क्या संकेत दे रहे हैं. गणनाएं देखने के बाद वे घबरा गए.
लापिएर और कॉलिन्स ने अपनी किताब में लिखा है कि, 'उनकी गणना के अनुसार भारत के लिए आने वाला समय संकट भरा था. दरअसल, भारत को नया जीवन मकर राशि के प्रभाव में मिलने वाला था. उस समय शनि और राहु का प्रभाव था, जबकि गुरु और शुक्र ऐसी स्थिति में थे, जिसे पंडितों ने बेहद अशुभ माना था.'
स्वामी मदनानंद के लिए यह सिर्फ एक ज्योतिषीय गणना नहीं थी. उनका मानना था कि एक नए देश के जन्म का समय उसके भविष्य पर असर डाल सकता है. तब घबराकर मदनानंद चिल्ला उठे और बोले कि, 'उन्होंने ये क्या कर दिया! उन्होंने ये क्या कर दिया!' इसके बाद उन्होंने माउंटबेटन को पत्र लिखकर आजादी की तारीख बदलने की अपील तक की. उन्होंने लिखा कि, 'भगवान के लिए भारत को 15 अगस्त को आजाद मत कीजिए.'
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर आजाद भारत में बाढ़, सूखा, अकाल और हिंसा जैसी घटनाएं होती हैं, तो इसकी वजह यह मानी जाएगी कि भारत का जन्म सितारों के अनुसार एक अशुभ दिन हुआ था. दूसरी ओर, कई अन्य ज्योतिषियों ने भी जवाहरलाल नेहरू और दूसरे हिंदू नेताओं से संपर्क कर आजादी की तारीख बदलने की कोशिश की. लेकिन तब तक राजनीतिक घटनाक्रम काफी आगे बढ़ चुका था. 15 अगस्त की तारीख बदलना अब आसान नहीं था. सत्ता हस्तांतरण की तैयारियां तेजी से चल रही थीं और राजनीतिक नेतृत्व इस फैसले को वापस लेने की स्थिति में नहीं था.
किस वजह से 15 अगस्त का दिन था अशुभ?
इस पूरे मामले का एक दिलचस्प पहलू ज्योतिषी कोटमराजू नारायण राव (के.एन. राव) ने अपनी किताब, 'The Nehru Dynasty: Astro-Political Portraits of Nehru, Indira, Sanjay and Rajiv' में बताया है. राव के अनुसार, 'ज्योतिषियों की मांग यह नहीं थी कि 15 अगस्त की तारीख ही बदल दी जाए, बल्कि वे उस तारीख के अंदर आजादी के लिए एक शुभ मुहूर्त तलाशना चाहते थे.'
इसके लिए अभिजीत मुहूर्त को महत्वपूर्ण माना गया था. यह दिन और रात के बीच का मध्य समय होता है. राव की किताब के अनुसार, 'वैदिक ज्योतिष में अगर किसी काम के लिए कोई दूसरा शुभ समय उपलब्ध न हो, तो अभिजीत मुहूर्त में काम शुरू करना शुभ माना जाता है'
गणना में एक और शुभ संकेत पुष्य नक्षत्र का था, जिसका संबंध शनि से माना जाता है. राव की किताब के अनुसार, 'पुष्य को एक बेहद शुभ नक्षत्र माना जाता है और इसके दौरान किसी राज्य या साम्राज्य की स्थापना को शुभ माना गया है'
राव ने स्वतंत्र भारत की जो कुंडली बताई है, उसमें भारत का जन्म वृषभ लग्न में माना गया है. इसमें पहले शनि की महादशा और उसके बाद बुध की महादशा का उल्लेख है. उनके ज्योतिषीय विश्लेषण में दोनों को अनुकूल माना गया है. इसलिए असली सवाल सिर्फ यह नहीं था कि 15 अगस्त की तारीख बदली जाए या नहीं. असली सवाल यह था कि 15 अगस्त को किस समय भारत को स्वतंत्र घोषित किया जाए. यहीं से एक ऐसा रास्ता निकला, जिसमें तारीख वही रखते हुए आजादी के लिए एक शुभ समय चुना जा सकता था.
आधी रात में क्यों हुआ था भारत आजाद?
लापिएर और कॉलिन्स की किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' के अनुसार, माउंटबेटन ने 15 अगस्त की तारीख अचानक ही तय की थी. माउंटबेटन ने बाद में बताया था कि यह तारीख उन्हें अचानक सूझी. उनका कहना था कि उन्हें पता था कि सत्ता हस्तांतरण जल्द से जल्द करना है और वह यह भी दिखाना चाहते थे कि पूरे घटनाक्रम पर उनका नियंत्रण है.
उन्होंने पहले अगस्त या सितंबर के बीच कोई तारीख तय करने के बारे में सोचा था और फिर उन्होंने 15 अगस्त को चुन लिया था. इस तारीख को चुनने की एक निजी वजह भी थी. माउंटबेटन ने बताया था कि 15 अगस्त जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी सालगिरह थी. चूंकि, 15 अगस्त की तारीख माउंटबेटन ने खुद तय की थी और सार्वजनिक रूप से इसका ऐलान भी कर दिया था, इसलिए भारतीय नेताओं के लिए अब तारीख बदलना लगभग संभव नहीं था. ऐसे में एक बीच का रास्ता निकाला गया कि 15 अगस्त तारीख ही रखी जाए, लेकिन इसी दिन आजादी के लिए एक शुभ समय तय किया जाए.
के.एन. राव ने इस पूरे मामले का जिक्र दुर्गा दास की किताब India from Curzon to Nehru and After के हवाले से किया है. उनके अनुसार, जवाहरलाल नेहरू ने इस समस्या का एक दिलचस्प समाधान निकाला था. नेहरू ने 14 अगस्त 1947 की दोपहर संविधान सभा की बैठक बुलाई थी. बैठक आधी रात तक चली थी. जैसे ही घड़ी में 12 बजे, पश्चिमी कैलेंडर के हिसाब से 15 अगस्त शुरू हो गया और भारत आजाद हो गया था. इस तरह नेहरू ने एक बीच का रास्ता निकाल लिया था. भारत तकनीकी रूप से 15 अगस्त को आजाद हुआ, लेकिन आजादी का समय आधी रात रखा गया था. यही वह समय था, जिसे ज्योतिषी शुभ मान रहे थे. हिंदू पंचांग के अनुसार, उस समय 15 अगस्त का नया दिन अभी शुरू नहीं हुआ था. इसलिए ज्योतिषियों का मानना था कि 14 अगस्त की रात का समय ज्यादा अनुकूल था.
'फ्रीडम एट मिडनाइट' में लापिएर और कॉलिन्स ने भी लिखा है कि कई ज्योतिषियों ने भारतीय नेताओं को सलाह दी थी कि 15 अगस्त का पूरा दिन देश की नई शुरुआत के लिए शुभ नहीं है, जबकि 14 अगस्त को ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति बेहतर थी. इसके बाद माउंटबेटन ने भी इस समझौते को स्वीकार कर लिया था. तय यह हुआ था कि भारत और पाकिस्तान 14 अगस्त 1947 की आधी रात को स्वतंत्र राष्ट्र बनेंगे. और इस तरह भारत की आजादी की लंबी लड़ाई का आखिरी अध्याय भी बेहद अनोखे तरीके से पूरा हुआ.
14 अगस्त की रात संविधान सभा की बैठक चलती रही. देश उस ऐतिहासिक पल का इंतजार कर रहा था. जैसे ही आधी रात हुई, कैलेंडर में 15 अगस्त शुरू हो गया और इसके साथ ही भारत एक स्वतंत्र देश बन गया था. इसी ऐतिहासिक मौके पर जवाहरलाल नेहरू ने अपना प्रसिद्ध भाषण दिया था, 'जब पूरी दुनिया सो रही होगी, तब आधी रात के समय भारत जीवन और स्वतंत्रता की नई सुबह देखेगा.' इस तरह भारत ने 15 अगस्त 1947 को आधी रात के समय स्वतंत्रता हासिल की थी, और आजादी का यह पल इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया.