scorecardresearch
 

Ahoi Ashtami 2026: अहोई अष्टमी के पानी से क्यों रूप चौदस पर धोते हैं बच्चें का चेहरा? जानें वजह

रूप चौदस, जिसे नरक चतुर्दशी यानी छोटी दीपावली के दिन सौंदर्य और रूप निखारने की परंपराओं से जुड़ा पर्व है. इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने, उबटन लगाने और शरीर की स्वच्छता का विशेष महत्व बताया गया है. इसी दिन अहोई अष्टमी के दिन रखे गए जल से बच्चों का चेहरा धुलाने की पारिवारिक परंपरा निभाई जाती है.

Advertisement
X
अहोई अष्टमी का व्रत संतान की रक्षा और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है. (Photo: ITG)
अहोई अष्टमी का व्रत संतान की रक्षा और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है. (Photo: ITG)

भारतीय संस्कृति में त्योहारों और व्रतों के साथ जुड़ी परंपराएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें कई ऐसी मान्यताएं भी शामिल हैं, जो पीढ़ियों से परिवारों में निभाई जा रही हैं. ऐसी ही एक विशेष परंपरा अहोई अष्टमी और रूप चौदस से जुड़ी है. अहोई अष्टमी पर जहां माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए निर्जला व्रत रखकर अहोई माता की पूजा करती हैं. वहीं पूजा के दौरान मिट्टी की छोटी मटकी में जल भरकर रखने की भी परंपरा है. इस जल का उपयोग रूप चौदस की सुबह बच्चों का चेहरा धोने के लिए किया जाता है. ऐसा करने से बच्चों के चेहरे पर निखार आता है और वे रूपवान व आकर्षक बनते हैं.

अहोई अष्टमी का व्रत संतान की रक्षा और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है. इस साल यह व्रत 1 नवंबर को रखा जाएगा. माताएं दिनभर व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता का पूजन करती हैं. पूजा में चांदी की अहोई, कलश और जल का विशेष महत्व होता है. कई परिवारों में मिट्टी की छोटी मटकी में स्वच्छ जल भरकर उसे पूजा स्थल पर रखा जाता है. पूजा के दौरान इस जल को अहोई माता के आशीर्वाद से जुड़ा हुआ माना जाता है. इसके बाद मटकी को सुरक्षित रख दिया जाता है. ताकि रूप चौदस की सुबह उसका उपयोग किया जा सके.

संतान की मंगलकामना का सूत्र
रूप चौदस, जिसे नरक चतुर्दशी यानी छोटी दीपावली के दिन सौंदर्य और रूप निखारने की परंपराओं से जुड़ा पर्व है. इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने, उबटन लगाने और शरीर की स्वच्छता का विशेष महत्व बताया गया है. इसी अवसर पर अहोई अष्टमी के दिन रखे गए जल से बच्चों का चेहरा धुलाने की पारिवारिक परंपरा निभाई जाती है. मान्यता है कि अहोई माता के पूजन में रखा गया जल बच्चों के चेहरे की सुंदरता बढ़ाता है और उन्हें स्वस्थ, तेजस्वी और आकर्षक बनाता है.

Advertisement

इस परंपरा के पीछे मां की संतान के प्रति मंगलकामना और दोनों पर्वों के बीच धार्मिक संबंध भी दिखाई देता है. अहोई अष्टमी पर मां अपनी संतान के जीवन की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती है. जबकि रूप चौदस पर उसी संतान के सौंदर्य और आरोग्य की कामना के साथ विशेष जल का उपयोग किया जाता है. इस प्रकार एक पर्व संतान की लंबी आयु और सुरक्षा का प्रतीक बनता है तो दूसरा उसके रूप और स्वास्थ्य को लेकर शुभकामनाओं से जुड़ जाता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement