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25 किलो की पगड़ी, सिर पर मटके और हाथों में तलवारें... जयपुर की तीज सवारी में दिखा पूरा राजस्थान

जयपुर की शाम शनिवार को सिर्फ हरियाली तीज के उत्सव में नहीं डूबी थी, बल्कि पूरा शहर जैसे राजस्थान की खुली किताब बन गया था. कहीं ढोल-नगाड़ों की गूंज थी, कहीं लोक कलाकार कदम थिरका रहे थे, तो कहीं तलवारें हवा में लहराती नजर आईं. त्रिपोलिया गेट से जब तीज माता की शाही सवारी निकली, तो सड़क के दोनों तरफ उमड़ी हजारों की भीड़ ने इस राजसी परंपरा को अपनी आंखों में कैद कर लिया.

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करीब 175 लोक कलाकारों ने दी प्रस्तुति. (Photo: Screengrab)
करीब 175 लोक कलाकारों ने दी प्रस्तुति. (Photo: Screengrab)

जयपुर की एक शाम... सड़क के दोनों तरफ लोगों का हुजूम. ऊपर आसमान और नीचे गुलाबी शहर की रंगीन गलियां. कहीं ढोल बज रहे हैं, कहीं नगाड़ों की आवाज है. अचानक भीड़ के बीच से लोक कलाकारों की टोलियां दिखाई देती हैं. किसी के सिर पर 25 किलो की पगड़ी है, तो कोई सिर पर मटके रखकर नाच रहा है. आगे बढ़ते हैं तो तलवारें हवा में चमकती दिखती हैं.

और फिर आती है वो सवारी, जिसका इंतजार जयपुर को हर साल रहता है. तीज माता की शाही सवारी... हरियाली तीज के मौके पर जयपुर में निकली इस शाही सवारी ने पूरे शहर को राजस्थान की जीवित सांस्कृतिक झांकी में बदल दिया. आस्था थी, राजसी परंपरा थी, लोक कला थी और साथ में शौर्य का प्रदर्शन भी. यानी एक ही सवारी में राजस्थान के कई रंग दिखे.

शाही सवारी का नजारा देखने के लिए हजारों लोग सड़कों पर जुटे थे. जैसे ही सवारी आगे बढ़ी, ढोल-नगाड़ों की आवाज और तीज माता की जय-जयकार से माहौल गूंज उठा. सबसे खास तस्वीर तब बनी, जब सवारी त्रिपोलिया गेट पहुंची.

Jaipur 25 kg turban earthen pots balanced on heads swords in hand essence of Rajasthan Teej procession

ऐतिहासिक त्रिपोलिया गेट के सामने जयपुर के पूर्व राजघराने के सदस्य पद्मनाभ सिंह ने पारंपरिक तरीके से तीज माता की आरती की. एक तरफ हजारों लोगों की भीड़, दूसरी तरफ ऐतिहासिक महल और झरोखे और बीच में राजसी अंदाज में होती आरती. ऐसा लग रहा था जैसे जयपुर का पुराना राजसी दौर कुछ पल के लिए वापस लौट आया हो.

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अब बात उस कलाकार की जिसने भीड़ में सबसे ज्यादा ध्यान खींचा. सवारी में बाड़मेर से आए कलाकार शामिल हुए थे. इनमें से कुछ कलाकारों ने सिर पर करीब 25 किलो वजनी पगड़ी पहन रखी थी. जी हां, करीब 25 किलो. इतनी भारी पगड़ी के साथ कलाकार पूरे आत्मविश्वास से चलते रहे. उनकी पारंपरिक वेशभूषा और अंदाज देखकर लोग रुक-रुककर उन्हें देखने लगे.

Jaipur 25 kg turban earthen pots balanced on heads swords in hand essence of Rajasthan Teej procession

आगे बढ़े तो चरी नृत्य ने लोगों का ध्यान खींच लिया. सिर पर मटके रखे हुए कलाकार लय के साथ नाच रहे थे. शरीर का बैलेंस ऐसा कि नृत्य भी चलता रहे और सिर पर रखा मटका भी अपनी जगह से न हिले. इसके बाद कच्छी घोड़ी, गैर, कालबेलिया, चंग-ढप और घूमर की प्रस्तुतियां शुरू हुईं. हर प्रस्तुति के साथ राजस्थान का एक नया रंग सामने आता गया. कहीं लोक संगीत था, कहीं पारंपरिक नृत्य. कहीं कलाकारों की वेशभूषा लोगों को आकर्षित कर रही थी, तो कहीं उनकी कला तालियां बटोर रही थी.

Jaipur 25 kg turban earthen pots balanced on heads swords in hand essence of Rajasthan Teej procession

कठपुतलियां नाचीं, लोकदेवताओं की गाथाएं गूंजीं

जयपुर की तीज सवारी में राजस्थान की मशहूर कठपुतली कला भी दिखाई दी. रंग-बिरंगी कठपुतलियां नाचती हुई आगे बढ़ीं तो बच्चों से लेकर बड़े तक उन्हें देखने लगे. वहीं गुलाबी साफा पहने कलाकारों ने फड़ गायन की प्रस्तुति दी. पाबूजी और देवनारायण जैसे लोकदेवताओं की गाथाओं से जुड़ी इस परंपरा ने सवारी को राजस्थान की लोक विरासत से जोड़ दिया.

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अब तक सवारी में भक्ति और लोक संस्कृति का रंग था. लेकिन इसके बाद माहौल में शौर्य भी शामिल हो गया. शौर्य सेवा संगठन की बालिकाओं ने तलवारबाजी का शानदार प्रदर्शन किया. हाथों में तलवारें, चेहरे पर आत्मविश्वास और कदमों में गजब की फुर्ती. इन बेटियों ने जब तलवारबाजी के करतब दिखाए तो लोगों का उत्साह देखते ही बनता था. तीज माता की शाही सवारी में बेटियों का ये प्रदर्शन अनोखा था.

Jaipur 25 kg turban earthen pots balanced on heads swords in hand essence of Rajasthan Teej procession

इतनी बड़ी सवारी को देखने के लिए जो लोग त्रिपोलिया गेट नहीं पहुंच सके, उनका क्या? उनके लिए भी इंतजाम किया गया था. जयपुर के 13 प्रमुख स्थानों पर एलईडी स्क्रीन लगाकर शाही सवारी का लाइव प्रसारण किया गया. छोटी चौपड़, अजमेरी गेट, न्यू गेट, मोती डूंगरी, रामबाग सर्किल, एसएमएस स्टेडियम, बिड़ला मंदिर और जवाहर सर्किल समेत कई जगहों पर लोग स्क्रीन के जरिए सवारी देखते नजर आए.

175 कलाकार और ड्रोन से पुष्पवर्षा

इस बार करीब 175 लोक कलाकारों ने शाही सवारी में हिस्सा लिया. घोड़ों और ऊंटों की संख्या भी बढ़ाई गई थी. और फिर आया वो पल, जिसमें परंपरा के साथ आधुनिक तकनीक भी जुड़ गई. ड्रोन के जरिए पुष्पवर्षा की गई. नीचे लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां चल रही थीं, ऊपर से फूल बरस रहे थे और चारों तरफ तीज माता की जय-जयकार. यानी राजस्थान की सदियों पुरानी परंपरा और आज के जमाने की तकनीक- दोनों एक ही फ्रेम में दिखाई दिए.

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ये सिर्फ सवारी नहीं थी... इसमें राजस्थान की पूरी तस्वीर दिखाई दी. आस्था थी. राजसी परंपरा थी. लोक संगीत था. कठपुतली थी. फड़ गायन था. घूमर और कालबेलिया था. 25 किलो की पगड़ी थी. सिर पर मटके थे. बेटियों की तलवारबाजी थी. और ऊपर से ड्रोन की पुष्पवर्षा. जयपुर की सड़कें कुछ घंटों के लिए ऐसी जगह बन गईं, जहां राजस्थान का अतीत और वर्तमान एक साथ चलते नजर आए.

तीज माता की शाही सवारी आगे बढ़ती रही और पीछे छोड़ गई राजस्थान की उस संस्कृति की तस्वीर, जो आज भी उतनी ही रंगीन, उतनी ही जिंदा और उतनी ही शान से भरी है. जयपुर में तीज आई... अपने साथ पूरा राजस्थान लेकर आई.

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