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TMC की कैश स्कीम के बावजूद ममता को क्यों नहीं मिला महिला सपोर्ट

तृणमूल कांग्रेस पार्टी ममता बनर्जी का चेहरा आगे करके महिला सशक्तिकरण का जो नैरेटिव बना रही थी, शायद वो बंगाल की महिलाओं के ही गले नहीं उतर रहा था. ’लक्ष्मी भंडार योजना’ जैसी कैश स्कीम भी ममता के लिए जीत की गारंटी नहीं बन पाई.

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आरजी कार मेडिकल कॉलेज की डॉक्टर का रेप और मर्डर केस ममता बनर्जी के खिलाफ हवा बना गया. (फोटो- PTI)
आरजी कार मेडिकल कॉलेज की डॉक्टर का रेप और मर्डर केस ममता बनर्जी के खिलाफ हवा बना गया. (फोटो- PTI)

भारतीय राजनीति में यह धारणा पक्की होती जा रही थी कि महिलाओं के खातों में सीधा पैसा पहुंचाने वाली 'कैश स्कीम' सत्ता विरोधी लहर के खिलाफ एक अचूक कवच है. लेकिन, बंगाल अपवाद बन गया. लक्ष्मी भंडार योजना के तहत महिलाओं को 1500 रुपए हर महीने दिए जा रहे थे, लेकिन इसका टीएमसी को फायदा न मिला.

15 साल बाद बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता का अंत हो गया. 294 सीटों वाली विधानसभा के लिए चुनाव में टीएमसी सौ सीटों के आंकड़े को भी नहीं छू पाई. माना जा रहा था कि बंगाल के दो ‘एम-फैक्टर’ ममता को परास्त नहीं होने देंगे. जिनमें से एक M यानी मुस्लिम वोटबैंक तो उनके साथ डटा रहा, लेकिन दूसरा वाला M, यानी महिला वोटबैंक दरक गया. दीदी से उस महिला वोटर ने किनारा किया, जिनको आगे करके वे अब तक सत्ता और विरोध दोनों की सियासत साधती आई थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि महिलाओं को देश की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री से मोहभंग हो गया? ये वो वोटर था, जिसने पिछले चुनाव में पुरुषों की तुलना में ज्यादा वोट दिए थे. 

असम में हिमंत बिस्व सरमा और बीजेपी के लिए महिलाओं के लिए चलाई गई 'अरुणोदयी' योजना ने खूब काम किया. लेकिन, बंगाल में ममता बनर्जी की 'लक्ष्मीर भंडार योजना' वोटिंग के लिहाज से कुछ खास नहीं कर पाई. ममता का उद्देश्य बंगाल की आधी आबादी को आर्थिक रूप से जोड़कर सत्ता की चाबी अपने पास रखना था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. क्योंकि, महिलाओं के लिए आर्थिक मदद से बड़ा उनकी अस्मिता का सवाल. केवल 1500 रुपए उस बुनियादी भरोसे कीमत नहीं हो सकते थे, जो एक महिला अपनी सरकार से सुरक्षा के रूप में चाहती है. बंगाल की सड़कों पर सुरक्षा और न्याय की मांग उठने लगी, तो बैंक खातों में आने वाली राशि उस आक्रोश को शांत करने में नाकाम रही.

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आरजी कार कांड: सुरक्षा के दावों की कलई

आरजी कार मेडिकल कॉलेज की घटना ने केवल कोलकाता को ही नहीं, बल्कि समूचे बंगाल को झकझोरकर रख दिया. यह महज एक आपराधिक मामला नहीं था, बल्कि इसने उस व्यवस्था पर चोट की जिसके केंद्र में 'दीदी' की ममतामयी छवि थी. बंगाल की महिलाओं, विशेषकर युवा पीढ़ी ने महसूस किया कि जिस सरकार को वे अपनी रक्षक मानती थीं, वही प्रशासन दोषियों को बचाने या कम से कम मामले को रफा-दफा करने की कोशिश करता नजर आया. जब मुख्यमंत्री खुद पुलिस की कार्रवाई का बचाव करने उतरीं, तो इसने 'कवर फायर' जैसी धारणा को जन्म दिया. युवा-युवतियों के बीच यह संदेश गया कि अगर एक सुरक्षित संस्थान के भीतर डॉक्टर सुरक्षित नहीं है, तो लक्ष्मीर भंडार से मिलने वाली राशि का कोई मोल नहीं है. इस घटना ने एक ऐसे जनआंदोलन का रूप ले लिया जिसने आर्थिक लाभ को पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया.

गंभीर घटनाओं को राजनीतिक चश्मे से देखने की परिपाटी

ममता बनर्जी की एक बड़ी राजनीतिक भूल महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा को लगातार राजनीतिक चश्मे से देखना रही. संदेशखाली से लेकर आरजी कार कांड तक, उन्होंने अक्सर इन घटनाओं को विपक्षी दलों की साजिश या राज्य की छवि खराब करने का प्रयास करार दिया. अदालतों ने बार-बार बंगाल की कानून-व्यवस्था और पुलिसिया जांच पर सख्त टिप्पणियां कीं, लेकिन सरकार का रवैया बेपरवाह बना रहा. कई मौकों पर पीड़ितों के बारे में दी गई मुख्यमंत्री की टिप्पणियों ने आग में घी डालने का काम किया. महिलाओं के बीच यह बात घर कर गई कि उनकी अस्मिता को सत्ता की राजनीति के तराजू में तौला जा रहा है. एक महिला मुख्यमंत्री से जिस सहानुभूति और त्वरित न्याय की अपेक्षा थी, उसकी जगह प्रशासनिक अहंकार ने ले ली, जिससे महिलाओं का एक बड़ा वर्ग उनसे दूर होता चला गया.

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बाहुबलियों का संरक्षण और टीएमसी की छवि

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के प्रति यह धारणा और भी गहरी होती गई कि पार्टी स्थानीय स्तर पर बाहुबलियों और अपराधियों को संरक्षण देती है. जमीनी स्तर पर टीएमसी के 'सिंडिकेट' और दबंग नेताओं के प्रति जनता का गुस्सा बढ़ता रहा. संदेशखाली जैसी घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि कई इलाकों में महिलाएं अपनी मर्यादा और जमीन की सुरक्षा के लिए इन्हीं बाहुबलियों पर निर्भर थीं, जिन्हें सत्ता का मौन समर्थन प्राप्त था. इसने न केवल महिलाओं बल्कि कई अन्य वर्गों के वोटरों के मन में भी ममता बनर्जी के प्रति नजरिया बदल दिया. लोग यह सोचने पर मजबूर हो गए कि क्या वे अपनी सुरक्षा की कीमत पर नकद लाभ स्वीकार करना चाहेंगे. जब सत्ता का चेहरा बाहुबलियों के साथ खड़ा दिखाई देने लगा, तो 'लक्ष्मीर भंडार' की चमक फीकी पड़ गई.

सम्मान की कीमत और सत्ता का भविष्य

बंगाल की राजनीति ने देश को यह बड़ा सबक दिया है कि कैश ट्रांसफर स्कीम केवल उसी स्थिति में काम करती हैं जब राज्य का बुनियादी ढांचा और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो. जैसा असम में हिमंता ने कामयाबी के साथ किया. ममता बनर्जी यह समझने और समझाने में विफल रहीं कि 'महिला सशक्तिकरण' केवल आर्थिक रूप से मदद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन्हें एक भयमुक्त वातावरण देने के बारे में भी है. जब महिलाओं की गरिमा पर चोट हुई और न्याय की प्रक्रिया बाधित होती दिखी, तो बंगाल की 'लक्ष्मी' ने सरकार को बचाने के बजाय उससे जवाब मांगना शुरू कर दिया. आरजी कार कांड से उपजा यह विद्रोह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय मतदाता, विशेषकर महिलाएं, अब आर्थिक लाभ से ऊपर अपनी अस्मिता, गरिमा और सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही हैं.

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