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UNGA में ग्लोबल नेता, लोकल भाषण

संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया के युद्धग्रस्त देशों के नेताओं के पास मौका था आपस में मिलकर बैठकर विवाद सुलझाने का. लेकिन, उन्होंने अपनी स्थानीय जनता को आकर्षित करने के लिए आक्रामक धमकियां दीं, किसी ने गाली तो कोई वॉकआउट करके ही मैसेज दे गया.

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संयुक्त राष्ट्र महासभा में बातचीत के बजाय वॉकआउट अब नया हैंड शेक बन गया है. (Photo- ITG)
संयुक्त राष्ट्र महासभा में बातचीत के बजाय वॉकआउट अब नया हैंड शेक बन गया है. (Photo- ITG)

संयुक्त राष्ट्र महासभा का मतलब था कि देश आपस में मिलकर शांति और दोस्ती की बातें करें. लेकिन हमें जो मिल रहा है, वह यह है कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स अपनी टाइमलाइन के लिए रील्स की भाषा में बोल रहे हैं. महासभा अब इंस्टाग्राम रील्स बनाने का मंच बन गई है.

इस हफ्ते न्यूयॉर्क में करीब 190 देशों के नेता दुनिया को संबोधित करने आए थे, लेकिन वे अपनी वोट बैंक की राजनीति साधने में लग गए. टर्टल बे सिर्फ एक सेट था. असली दर्शक तो ओहायो, ब्यूनस आयर्स, अंकारा और लाहौर में बैठे थे. लगभग हर जगह घरेलू राजनीति चरम पर है, और अब किसी बीमारी या जंग रोकने से ज्यादा मायने एक वायरल वीडियो क्लिप रखता है.

शुरुआत डोनाल्ड ट्रंप ने की. आखिरकार हॉल न्यूयॉर्क में ही तो है. उन्होंने दुनिया से कहा कि उनके सामने 'एक बड़ा फैसला लेने का वक्त है'. एक डील जिससे या तो ईरान खुद को संभाल सके, या फिर 'क्या मैं इस्लामिक रिपब्लिक को पूरी तरह से तबाह कर दूं, और वह भी बहुत जल्दी?' उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें चुनाव के बाद डील की उम्मीद है, जिससे साफ पता चलता है कि वे असल में किस असेंबली से बात कर रहे थे. असेंबली से नहीं, बल्कि चुनावी सभा से. चुनाव प्रचार के लिए तो यह ठीक है, लेकिन जिस मंच को अगला विश्व युद्ध रोकने के लिए बनाया गया था, वहां से ऐसी बातें डराने वाली लगती हैं.

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फिर अर्जेंटीना के राष्ट्रपति हाविएर मिलेई आए और उन्होंने इस संस्था को 'एक बेकार ऑर्गेनाइजेशन कहा जिसका इकलौता मकसद घमंडी परजीवियों के एक समूह को पालना है जो खुद को भला ब्यूरोक्रेट दर्शाते हैं'. यह तो वही बात हुई कि बारात में आए, खाना खाया, और दूल्हे को ही गाली दे डाली. कोई आधी दुनिया पार करके सिर्फ इस संस्था को बेकार बताने क्यों आएगा? क्योंकि यह क्लिप वायरल हो गई कि 'इस आदमी ने यूएन के मुंह पर ही उसकी धज्जियां उड़ा दीं'. काम पूरा हुआ, अर्जेंटीना के समर्थक तालियां बजा रहे हैं. मेसी के बाद गोल करने वाला एक और मिल गया.

बेंजामिन नेतन्याहू जब भाषण देने आए, तो कई लोग वॉकआउट कर गए. फिलिस्तीनी प्रतिनिधियों ने इसकी अपील की थी. हॉल इतनी तेजी से खाली हुआ जैसे कोई फ्लॉप टॉक्सिक फिल्म दिखाए जाने पर सिनेमा हॉल खाली होता है. उन्होंने जाने वालों को 'कायर' कहा और बचे हुए लोगों से भी जाने को कह दिया. पिछले साल इजरायल ने खुद गिना था कि 77 देश गायब थे, इस बार किसी ने गिनती करने की जहमत भी नहीं उठाई. वॉकआउट अब हर साल का एक दस्तूर बन गया है. नेतन्याहू अपनी बात पर अड़े रहे. दोनों पक्ष खुश होकर घर लौटे. बाहर जाने वालों को खाली कुर्सी की फोटो मिल गई और उन्होंने खुद को बहादुर बताया, वहीं नेतन्याहू को खाली हॉल में अकेले शेर जैसी फोटो मिल गई. कूटनीति हार गई.

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संयुक्त राष्ट्र महासभा वह जगह है जहां दुश्मनों को आपस में बातचीत करनी चाहिए. इसके बजाय वॉकआउट करना ही अब नया हैंड शेक बन गया है. एक दिन पहले अमेरिकी प्रतिनिधि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के भाषण के दौरान बाहर निकल गए थे. कोई सुनता नहीं, सब बाहर चले जाते हैं, और सबको इस बात पर गर्व होता है. सुरक्षा परिषद में पोलैंड के रादोस्नाव सिकोरस्की ने रूस के सर्गेई लावरोव से कहा- 'आप अभी और लोगों को मार सकते हैं, लेकिन आप जीत नहीं सकते'. जबकि उन्हें इस बात पर चर्चा करनी थी कि लोगों को मारना कैसे बंद किया जाए.

रेसेप तय्यिप एर्दोगान ने वही किया जो वे हर सितंबर में करते हैं. खिलाफत खत्म होने के एक सदी बाद भी खुद को मुस्लिम दुनिया का नेता दिखाना. उन्होंने कश्मीर का मुद्दा उठाते हुए मांग की कि 'कश्मीर समेत सभी विवादों' को यूएन के प्रस्तावों के तहत सुलझाया जाना चाहिए. यह बात उन्होंने तुर्की द्वारा पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ मक्का डिफेंस पैक्ट पर दस्तखत करने के कुछ ही हफ्तों बाद कही. सब जानते थे कि यह होने वाला है. लेकिन, यह किसके लिए था. न्यूयॉर्क के रास्ते अंकारा और इस्लामाबाद के लिए मैसेज.

शाहबाज शरीफ शुक्रवार को भाषण देने वाले हैं. इस बीच, उनके पिछले साल के भाषण का एक वीडियो फिर से शेयर किया जा रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि पाकिस्तानी पीएम ने चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने आतंकियों को अपने घर में व्यस्त नहीं रखा होता, तो वे न्यूयॉर्क और लंदन को तबाह कर देते. जबकि उन्होंने असल में 2025 में कहा था- 'अगर हमने इन आतंकियों का मुकाबला नहीं किया होता, तो वे न्यूयॉर्क और लंदन की सड़कों पर घूम रहे होते'. गलत दावा ज्यादा फैला क्योंकि वह सुनने में सही लगा. यही तो बात है. शाहबाज और पाकिस्तान के मामले में दुनिया सबसे बुरी बात पर भी यकीन करने को तैयार रहती है. वैसे, पाकिस्तान ने अपनी आर्थिक तंगी की वजह से अपने प्रतिनिधिमंडल का आकार छोटा कर दिया है. पड़ोस में जंग चल रही जंग के कारण इस परफॉर्मेंस का बजट तय है. वैसे पाकिस्तान में जंग कब नहीं होती? सोचने वाली बात है.

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पुराने लोग कहेंगे कि यह असेंबली हमेशा से एक नाटक ही रही है. सही बात है. 1960 में ख्रुश्चेव का जूता निकालना. उसी साल कास्त्रो का साढ़े चार घंटे का भाषण. 2006 में चावेज़ का यह कहना कि यहां दुर्गंध आ रही है क्योंकि 'कल यहां शैतान आया था'. 2009 में गद्दाफी का यूएन चार्टर को हवा में उछालना. 2012 में नेतन्याहू का कार्टून बम दिखाना. और हमारे वी.के. कृष्ण मेनन का कश्मीर पर करीब आठ घंटे तक बोलना. वह सुरक्षा परिषद थी, और कम से कम उन्होंने बेहोश होने की भलमनसाहत तो दिखाई थी.

वे अपवाद थे, इसीलिए वे खबरें बने. और आज ही नॉर्मल है. पूरा कार्यक्रम ही अपवाद बन चुका है. तब कोई नेता पूरे हॉल के लिए अपनी बात रखता था. आज हॉल सिर्फ एक बैकड्रॉप बनकर रह गया है, जिसका इस्तेमाल किसी प्री-वेडिंग शूट की तरह किया जा रहा है.

एंतोनियो गुटेरेस ने इस हफ्ते अपना आखिरी भाषण दिया और बड़ी ताकतों को बताया कि उनकी ताकत उतनी बड़ी नहीं है जितनी वे सोचते हैं. इस सत्र का विषय है 'भरोसा कायम करना, बदलाव को संभालना'. बदलाव तो अच्छे से संभाल लिया गया है- बातचीत की दुकान से इसे युद्ध का मैदान बना दिया गया है. लेकिन भरोसा? वह कम ही हुआ है.

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यूएन की हालत खराब है, उसे वही सदस्य देश दबा रहे हैं जो उसे भाषण देते हैं. महासचिव का कार्यकाल खत्म हो रहा है. इस डूबते हुए जहाज की कमान संभालने के लिए सात उम्मीदवार कतार में हैं. फिलिस्तीन के राष्ट्रपति ने वीडियो के जरिए अपनी बात रखी क्योंकि मेजबान देश ने उन्हें वीजा देने से मना कर दिया. इजरायल के प्रधानमंत्री को न्यूयॉर्क के मेयर की धमकी के बावजूद गिरफ्तार नहीं किया गया, और इसके लिए वे ट्रंप का शुक्रिया अदा कर सकते हैं.

दो विश्व युद्धों के बाद शांति की बात करने के लिए जो जगह बनाई गई थी, वह अब तबाही की धमकियों, गालियों और वॉकआउट के लिए मंच किराए पर दे रही है.

कभी कूटनीति सबसे कड़वी बात को सबसे मीठे शब्दों में कहने की कला हुआ करती थी. लेकिन 81वीं महासभा में यह कला बदलकर अपने देश की जनता के लिए सबसे कड़वे शब्दों में चिल्ला-चिल्लाकर कुछ भी न कहने की कला बन गई है. चुनावी रैलियों की भाषा ने इस हॉल की मर्यादा को निगल लिया है.

इस साल फिर से, महासभा बस नाम के लिए इकट्ठा हुई और नतीजा कुछ नहीं निकला. इसलिए नहीं कि मिलेई ने इसे बेकार कहा था. बल्कि इसलिए कि इस हफ्ते ने उनकी बात को सही साबित कर दिया. मिलेई सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा.

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