फोर्ट सेंट जॉर्ज में 10 मई 2026 को नई सरकार के शपथ लेने के 100 दिन पूरे हो चुके हैं. इस मौके पर तमिलनाडु की नई सरकार ने "100 डेज ऑफ गवर्नेंस - ए गवर्नमेंट फॉर जनरेशन्स" नाम से अपनी 100 दिनों की उपलब्धियों का एक रिपोर्ट कार्ड जारी किया है.
पिछले 60 सालों से तमिलनाडु की राजनीति मुख्य रूप से दो ही बड़ी पार्टियों द्रमुक (DMK) और अन्नाद्रमुक (AIADMK) के इर्द-गिर्द घूमती रही है. दोनों भले ही एक-दूसरे की विरोधी थीं, लेकिन दोनों की सोच द्रविड़ राजनीति, लोक-कल्याणकारी योजनाओं और राज्य के अधिकारों पर ही आधारित थी. 2026 के चुनाव नतीजों ने इस पुरानी परंपरा को पूरी तरह खत्म तो नहीं किया, लेकिन दशकों से चले आ रहे इस दबदबे को तोड़ जरूर दिया है.
एक नाज़ुक गठबंधन की अगुवाई करते हुए 107 सीटें हासिल करने वाले एक बागी अभिनेता-राजनेता ने उस किले में सेंध लगा दी, जो कभी 'दो पत्तियों' और 'उगते सूरज' (द्रमुक) के झंडों की निजी संपत्ति माना जाता था. उस बाहरी व्यक्ति ने औपचारिक रूप से फोर्ट सेंट जॉर्ज में प्रवेश कर लिया है.
हालांकि, इससे भी गहरा और परिणामी सवाल यह है कि क्या फोर्ट सेंट जॉर्ज ने चुपके से उस बाहरी व्यक्ति में प्रवेश कर लिया है? मुख्यमंत्री के कोने वाले कार्यालय में चेहरा तो निश्चित रूप से बदल गया है, लेकिन क्या इसके साथ तमिलनाडु के शासन का बुनियादी ढांचा भी बदला है, या फिर हमने केवल सत्ता का एक दिखावटी बदलाव देखा है?
शिष्टाचार, एमजीआर की यादें और समीक्षा की परीक्षा
तमिलनाडु विधानसभा के पवित्र कक्ष के भीतर कदम रखते ही यह दृश्य परिवर्तन तुरंत ध्यान खींचता है. कड़ाई से देखें तो यह आधी सदी में पहली बार नहीं है जब सदन सी. एन. अन्नादुराई, एमजीआर, एम. करुणानिधि या जे. जयललिता के बिना मिल रहा हो, उनकी भौतिक अनुपस्थिति तो लंबे समय से जीवन का एक स्थापित सच बन चुकी है. फिर भी, पिछले कुछ दशकों में अतीत केवल विनम्र, धीरे-धीरे घटने वाले चरणों में धुंधला हुआ था.
मई 2026 के जनादेश के बाद सत्ता पक्ष की बेंचों से एम. के. स्टालिन के अचानक हटने के साथ जहां उन्हें पार्टी के वरिष्ठ सलाहकार की शांत भूमिका में भेज दिया गया है, जबकि उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन विपक्ष के नेता की कुर्सी संभाल रहे हैं, पीढ़ीगत बदलाव पूरी तरह से और अपरिवर्तनीय महसूस होता है. विधानसभा के प्रतिद्वंद्विता के परिचित मंच ने अपने पारंपरिक योद्धाओं को खो दिया है, जिससे एक अजीब, गूंजता हुआ सन्नाटा बाकी रह गया है जहां कभी विशाल व्यक्तिगत दुश्मनी अंतहीन राजनीतिक गर्मी पैदा करती थी.
सत्ता पक्ष की कमान अब शांत स्वभाव के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के हाथों में है, उनके ठीक बगल में अनुभवी नेता के. ए. संगोट्टायन मौजूद हैं, जिन्हें विधानसभा के नियमों की बहुत गहरी समझ है. उनकी यह समझ पहली बार विधायक बने नेताओं से भरी सरकार के लिए एक मजबूत सहारा साबित हो रही है. दूसरी तरफ, विपक्ष में आक्रामक उदयनिधि स्टालिन हैं, जो एक मजबूत विपक्षी नेता के रूप में खुद को स्थापित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पाडी के. पलानीस्वामी अपनी कमजोर और बिखरती हुई अन्नाद्रमुक (AIADMK) पार्टी पर अपना प्रभाव बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं.
विधानसभा की कार्यवाही को संभालने की जिम्मेदारी स्पीकर जे. सी. डी. प्रभाकर के कंधों पर है, जिनका अंदाज काफी दिलचस्प है. वे खुद को निष्पक्ष बताते हुए कुरान, बाइबिल और भगवद गीता की आयतों और श्लोकों का जिक्र करते हैं, लेकिन कभी-कभी वे मुख्यमंत्री की तारीफ में उन्हें "जिंदा एमजीआर (MGR)" तक कह देते हैं. जब सदन में बहस या हंगामा बढ़ता है, तो माहौल को हल्का करने के लिए वे एमजीआर के पुराने और दार्शनिक गाने गुनगुनाने लगते हैं.
मुख्यमंत्री विजय ने सदन में अपने फिल्मी अंदाज़ को बरकरार रखा है. जब विपक्ष उन पर तीखे सवाल दागता है, तो वे पुरानी द्रविड़ राजनीति के लंबे भाषणों के बजाय अपनी मशहूर 'कुट्टी कधैगल' (छोटी-छोटी नैतिक कहानियों) से जवाब देते हैं. पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की कहानी सुनाने की शैली से मिलती-जुलती इन कहानियों के जरिए वे मीठे अंदाज़ में विपक्ष पर करारा राजनीतिक हमला बोलते हैं, जिससे विपक्षी नेता मुस्कुराते हुए भी कुछ देर के लिए शांत हो जाते हैं.
हालांकि, एक विश्लेषणात्मक समीक्षा के तहत यह कठिन संस्थागत सवाल पूछा जाना चाहिए, क्या विधायी समीक्षा की गुणवत्ता में वाकई सुधार हुआ है, या सिर्फ सदन के व्यवहार में? माइक उखाड़कर फेंकने, नियम-पुस्तिकाएं फाड़ने और हाथापाई जैसी घटनाओं का न होना सार्वभौमिक रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन शालीनता लोकतंत्र का 'ड्रेस कोड' है, उसका रिपोर्ट कार्ड नहीं.
असली लोकतांत्रिक मानदंड तो 'प्रश्नकाल' की गंभीरता, संसदीय समितियों के कामकाज, विपक्ष को दी जाने वाली जगह, मूल फाइलों के साथ मंत्रियों की तैयारी, और इस बात में निहित है कि क्या महत्वपूर्ण विधेयकों पर केवल जल्दबाज़ी में ध्वनि मत कराने के बजाय धारा-दर-धारा गहन बहस की जा रही है या नहीं. सदन में शिष्टाचार निश्चित रूप से आ गया है, लेकिन संस्थागत गहराई अभी भी अपने शुरुआती दौर से गुजर रही है.
नयी व्यवस्था का लैंगिक और सामाजिक गणित भी विरोधाभासों का एक उतना ही दिलचस्प अध्ययन प्रस्तुत करता है. 2026 के चुनाव ने एक बार फिर तमिलनाडु के चुनावी गणित में महिला मतदाताओं की केंद्रीय भूमिका को साबित किया, जिन्होंने जनादेश तय करने के लिए ऐतिहासिक संख्या में मतदान किया. इसके बावजूद, विधानसभा के पटल पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी काफी कम है यह एक ऐसा स्थायी लोकतांत्रिक घाटा है जिसे केवल भारी मतदान से पूरा नहीं किया जा सकता.
हालांकि, राज्य मंत्रिमंडल का विस्तार करके उसमें चार महिला मंत्रियों और सात अनुसूचित जाति (SC) के मंत्रियों को शामिल करना इसका एक सार्थक पहलू प्रस्तुत करता है. प्रतिनिधित्व को वहां दर्ज किया जाना चाहिए जहां वह आगे बढ़ता है, और वहां उस पर सवाल उठाया जाना चाहिए जहां वह रुकता है. सदन के बाहर और दूसरी तरफ मौजूद पार्टी नेताओं की मुखर उपस्थिति सार्वजनिक बहसों को पैनापन देती है, लेकिन सच्चे सामाजिक न्याय को इस बात से मापा जाएगा कि क्या यह कार्यकारी समावेश शीर्ष नीति-निर्माण मंडलों के भीतर संरचनात्मक प्रभाव में बदल पाता है या नहीं.
उथल-पुथल भरी दलीय व्यवस्था और अवसरवाद का चक्र
विधानसभा के भीतर की तात्कालिक बहसों से परे, अगर राज्य के पूरे राजनीतिक परिदृश्य को देखा जाए, तो वहां एक बड़ा प्रणालीगत फेरबदल हुआ है. नए मुख्यमंत्री विजय ने केवल पुरानी सरकार को बेदखल नहीं किया है, बल्कि तमिलनाडु की दलीय व्यवस्था के पूरे ढांचे को झकझोर कर रख दिया है.
इसका ऐतिहासिक महत्व किसी मामूली गुटबाज़ी या अंदरूनी खींचतान से कहीं बड़ा है, जहां द्रमुक (DMK) अब मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में आ गई है, अन्नाद्रमुक (AIADMK) अपने वजूद और प्रासंगिकता को बचाए रखने का संघर्ष कर रही है, और छोटे दल अपनी राजनीति बचाए रखने के लिए नए रास्ते तलाश रहे हैं.
तमिलनाडु की राजनीति में इस समय बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. एम. आर. विजयभास्कर और सी. विजयभास्कर जैसे 6 प्रमुख अन्नाद्रमुक (AIADMK) विधायकों के इस्तीफे के बाद जहां पार्टी कानूनी लड़ाई लड़ रही है और दल-बदल के नियमों को लेकर सवाल उठा रही है, वहीं उपचुनाव न होने से ये नेता असमंजस में फंसे हुए हैं.
दूसरी तरफ, 'वैको एंड कंपनी' जैसे पुराने सहयोगी दल हवा का रुख देखकर नई सरकार की तारीफों में जुट गए हैं. इस बीच, के. अन्नामलाई के इस्तीफे के बाद राज्य में बीजेपी की मौजूदगी कमजोर पड़ी है, जिसके कारण अब दिल्ली स्थानीय बयानबाजी को दरकिनार कर तमिलनाडु सरकार के साथ सीधे प्रशासनिक स्तर पर तालमेल बिठाकर काम कर रही है.
गठबंधन का समीकरण
TVK) ने 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटें हासिल की हैं, जो बहुमत के 118 के आंकड़े से 10 सीटें कम है. इस वजह से मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार कांग्रेस, वीसीके (VCK) और अन्य क्षेत्रीय दलों के सहयोग पर टिकी हुई है. हालांकि सरकार का 100 दिनों का शुरुआती दौर शांतिपूर्ण रहा, लेकिन इसकी असली परीक्षा बजट सत्र के दौरान वोटिंग, स्थानीय निकाय चुनावों में सीटों के बंटवारे और मंत्रालयों के बीच हितों के टकराव के समय होगी. सरकार का स्थायित्व इस बात पर निर्भर करेगा कि गठबंधन के सहयोगियों को नीति निर्माण में कितनी हिस्सेदारी और सम्मान मिलता है.
कल्याणकारी योजनाएं: वित्तीय बोझ और जनकल्याण
सत्ता में आते ही नई सरकार ने राज्य की कल्याणकारी योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया है. सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने की घोषणा की, जिससे राज्य बिजली बोर्ड (TANGEDCO) पर सालाना लगभग ₹1,730 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा है. इसके साथ ही, सरकारी अस्पतालों में नवजात शिशुओं के लिए 1 ग्राम सोने की अंगूठी देने वाली 'थाईमामन थंगा मोथिरम' योजना और जरूरतमंद दुल्हनों के लिए 8 ग्राम सोना व रेशमी साड़ी देने वाली 'अन्नन्स सीर' योजना लागू की गई है.
नई सरकार ने कृषि आधार को मजबूत करने के लिए ₹6,220 करोड़ के सहकारी कृषि ऋण माफ किए हैं, साथ ही महिला सुरक्षा के लिए 'सिंगापेन्न' टास्क फोर्स, 65 'STING' एंटी-नारकोटिक्स इकाइयां, ₹710 करोड़ का विस्तारित कामराजर ब्रेकफास्ट प्लेटफॉर्म और कॉलेज छात्रों के लिए लैपटॉप सहायता योजना शुरू की है. हालांकि, किसी भी कल्याणकारी योजना को तीन स्तरों पर परखा जाना चाहिए क्या वह वास्तविक संरचनात्मक अभाव को दूर करती है, मानव क्षमता का निर्माण करती है और वित्तीय रूप से टिकाऊ है. स्कूली बच्चों के लिए मुफ्त नाश्ते जैसी योजनाएं मानव क्षमता को बढ़ाती हैं और गरीबी से लड़ती हैं, जबकि सोने का वितरण या बार-बार मिलने वाली बिजली सब्सिडी केवल राजनीतिक लाभ वाली योजनाएं हैं जो राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालती हैं.
बजट का गणित: बड़ा राजस्व घाटा और बढ़ता कर्ज
तमिलनाडु सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए संशोधित बजट अनुमान पेश किया है, जिसमें कुल राजस्व प्राप्ति ₹3.50 लाख करोड़ और खर्च ₹4.06 लाख करोड़ रहने का अनुमान है. इससे राज्य पर ₹55,775 करोड़ का बड़ा राजस्व घाटा हो गया है, जिसका मतलब है कि सरकार को अपने रोजमर्रा के प्रशासनिक खर्चे चलाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है. राज्य का कुल राजकोषीय घाटा ₹1.21 लाख करोड़ (GSDP का 3%) और कुल बकाया देनदारियां ₹10.98 लाख करोड़ (GSDP का 27.01%) तक पहुंच गई हैं. राज्य की अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज चुकाने में ही चला जाता है, जिससे नए विकास कार्यों के लिए बहुत कम पैसा बचता है.
आर्थिक चुनौतियां: कागजी वादों से धरातल पर काम की जरूरत
वित्तीय तंगी के बीच सरकार का 2036 तक राज्य को $1.5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य एक बड़ी चुनौती बन गया है. हालांकि सरकार ने 'वेट्री तमिलनाडु कॉन्क्लेव' में ₹1 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने का दावा किया है, लेकिन केवल समझौते (MoU) करने से सीधे नौकरियां या फैक्ट्रियां नहीं बन जातीं. सरकार को पारदर्शी सिस्टम बनाकर यह सुनिश्चित करना होगा कि ये निवेश जमीनी स्तर पर मंजूर हों, जमीन आवंटित हो और निर्माण शुरू हो. साथ ही, विकास का फायदा केवल चेन्नई-होसुर-कोयंबटूर जैसे औद्योगिक इलाकों तक सीमित न रहकर दक्षिणी और डेल्टा जिलों तक भी पहुंचे, जहां युवाओं में बेरोजगारी अधिक है.
राजनीतिक सुधारों और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना किसी भी नई सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होता है. जनहित में 717 TASMAC शराब दुकानों को बंद करने के फैसले से सामाजिक समूहों ने तो तारीफ की, लेकिन इससे आबकारी विभाग से होने वाले ₹45,000 करोड़ से अधिक के सालाना राजस्व पर सीधा असर पड़ा, जो राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का मुख्य आधार रहा है.
ऐसी स्थिति में ऑफ-बजट उधारी के बजाय टैक्स अनुपालन और गैर-टैक्स संसाधनों को जुटाने की एक पारदर्शी रणनीति की आवश्यकता है. वहीं दूसरी ओर, नौकरशाही में राजनीतिक बदले की भावना से बड़ा फेरबदल करने के बजाय संस्थागत निरंतरता को चुनना, वरिष्ठ अधिकारियों को बनाए रखना और विरोधियों के खिलाफ प्रतिशोध की राजनीति से बचना इस नई सरकार की परिपक्वता और प्रशासनिक सूझबूझ को दर्शाता है.
प्रशासनिक जवाबदेही और पुलिस सुधार
गवर्नेंस की असली पहचान भाषणों या शपथ ग्रहण से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जमीनी अनुभवों से तय होती है. पलानी में कस्टडी में हुई मौत के मामले ने नई सरकार के सामने बड़ी नैतिक और प्रशासनिक चुनौती खड़ी की, जिस पर मुख्यमंत्री ने तुरंत सस्पेंशन, न्यायिक जांच और मुआवजे की कार्रवाई की. हालांकि, ऐसे संकटों से निपटने के लिए केवल तात्कालिक कदम काफी नहीं हैं. असली परीक्षा यह है कि क्या मीडिया का ध्यान हटने के बाद भी कस्टडी में मौतों को रोकने के लिए संस्थागत सुरक्षा उपाय, सुपरवाइजरी अनुशासन और पुलिस की जवाबदेही पारदर्शी तरीके से कायम रहती है.
भ्रष्टाचार-विरोधी कदम और व्यवस्थागत सुधार
चुनाव प्रचार के दौरान विजय ने दावा किया था कि पिछली सरकार के भ्रष्टाचार के कारण 20 से 30 प्रतिशत सरकारी फंड का नुकसान हुआ था. अब मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें इन दावों को साबित करना होगा. केवल राजनीतिक बयानबाजी के बजाय सरकार को इंफ्रास्ट्रक्चर टेंडर, सरकारी खरीद और विभागीय कॉन्ट्रैक्ट्स का कड़ा ऑडिट कराना होगा. भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जब तक ठोस संस्थागत जांच, संरचनात्मक सुधार और वित्तीय वसूली जैसे कड़े कदम नहीं उठाए जाते, तब तक प्रशासनिक आधुनिकीकरण के दावे अधूरे रहेंगे.
सोशल जस्टिस और जमीनी चुनौतियां
द्रविड़ राजनीति के बाद के इस नए दौर को केवल भाषणों और बयानबाजी से नहीं, बल्कि बुनियादी असमानताओं पर सरकार के रुख से परखा जाएगा, जहां राज्य की तरक्की का असली पैमाना जातिगत भेदभाव को खत्म करने, दलितों को ज़मीन व रोजगार के अधिकार देने, सिर पर मैला ढोने की प्रथा पर पूरी तरह रोक लगाने, अंतर-जातीय हिंसा को थामने और सरकारी स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार करके हाशिए पर पड़े समुदायों को सुरक्षा देने में निहित है.
वहीं दूसरी ओर, केंद्र-राज्य संबंधों के मोर्चे पर TVK सरकार ने अनावश्यक टकराव को छोड़कर एक व्यावहारिक कूटनीति अपनाई है, जिसके तहत उसने अपनी मूल मांगों जैसे तमिल और अंग्रेजी की सख्त दो-भाषा नीति को बनाए रखना, नई शिक्षा नीति के तीन-भाषा फॉर्मूले को खारिज करना, ग्रामीण समानता के आधार पर NEET से छूट मांगना, और दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नुकसान पहुंचाने वाले संसदीय परिसीमन का विरोध करना पर कायम रहते हुए संवाद का तरीका बदला है.
इसके साथ ही सरकार ने समग्र शिक्षा अभियान का बकाया ₹3,284 करोड़ का फंड, होगेनक्कल पेयजल योजना के ₹2,283 करोड़, कुलसेकरपट्टिनम को नेशनल स्पेस हब का दर्जा देने और कोयंबटूर में दूसरे AIIMS जैसी लंबित मांगों को ठोस तरीके से केंद्र के समक्ष रखा है.
शुरुआती सौ दिनों में मुख्यमंत्री विजय ने बिना किसी फिल्मी बयानबाज़ी के व्यक्तिगत गरिमा और संस्थागत विशेषज्ञता का सम्मान करते हुए सत्ता के लहज़े और प्रशासनिक तौर-तरीकों को पूरी तरह बदला है, और हालांकि यह समय किसी बड़े व्यवस्थागत बदलाव को साबित करने के लिए काफी नहीं है, फिर भी आने वाले दिनों में इस सरकार की सफलता इस बात से तय होगी कि केंद्र के साथ इस व्यावहारिक तालमेल से राज्य को कितना वित्तीय व प्रोजेक्ट-संबंधित लाभ मिलता है और जनकल्याणकारी योजनाएं किस हद तक ढांचागत सुधारों में बदल पाती हैं.